Urad Farming: दलहनी फसलों की खेती करने वाले किसानों के लिए उड़द एक महत्वपूर्ण फसल है। इसे कम अवधि में तैयार होने वाली दलहनी फसलों में गिना जाता है। सही किस्म के बीज, समय पर बुवाई, खेत में उचित नमी और कीट-रोग प्रबंधन पर ध्यान देकर किसान उड़द की बेहतर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।
उड़द को अंग्रेजी में Black Gram कहा जाता है। देश के कई राज्यों में इसकी खेती खरीफ के मौसम में बड़े स्तर पर की जाती है। कुछ क्षेत्रों में किसान दूसरी ऋतुओं में भी इसकी खेती करते हैं। खास बात यह है कि दलहनी फसल होने के कारण उड़द मिट्टी की सेहत के लिए भी उपयोगी मानी जाती है। ऐसे में अगर किसान Black Gram Cultivation करने की तैयारी कर रहे हैं, तो उन्हें बुवाई से लेकर फसल तैयार होने तक कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए।
उड़द की खेती के लिए कौन सी मिट्टी है बेहतर?
उड़द की अच्छी फसल के लिए खेत का चुनाव महत्वपूर्ण है। इसकी खेती अच्छी जल निकासी वाली दोमट से मध्यम काली मिट्टी में की जा सकती है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहना उड़द की फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए ऐसे खेत का चुनाव करें, जहां बारिश या सिंचाई का अतिरिक्त पानी आसानी से निकल सके।
बुवाई से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार कर मिट्टी को भुरभुरा कर लेना चाहिए। किसानों के पास सुविधा हो तो मिट्टी की जांच जरूर करवाएं। Soil Test के आधार पर खाद और उर्वरक देने से पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल करने में मदद मिलती है।
इन राज्यों में होती है उड़द की खेती
भारत के कई राज्यों में Urad Crop की खेती की जाती है। इनमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य शामिल हैं।
हालांकि हर राज्य की जलवायु और मिट्टी एक जैसी नहीं होती। इस वजह से बुवाई के समय और उड़द की किस्म के चुनाव में अंतर हो सकता है। किसानों को अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र यानी KVK या कृषि विभाग से स्थानीय जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
उड़द की बुवाई कब करनी चाहिए?
उड़द की खेती में सही समय पर बुवाई करना बेहद जरूरी है। खरीफ मौसम की उड़द के लिए सामान्य तौर पर मानसून आने के बाद खेत में पर्याप्त नमी होने पर बुवाई की जाती है। कई कृषि सिफारिशों के अनुसार खरीफ उड़द की बुवाई जून के दूसरे पखवाड़े से जुलाई के दूसरे पखवाड़े के बीच की जा सकती है। हालांकि वास्तविक समय क्षेत्र में मानसून आने और मिट्टी में पर्याप्त नमी होने पर निर्भर करता है। किसानों को केवल तारीख देखकर बुवाई नहीं करनी चाहिए। खेत में पर्याप्त नमी होना भी जरूरी है। बहुत देर से बुवाई करने पर फसल की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
उड़द की बुवाई में कितना बीज लगेगा?
उड़द की खेती में बीज की मात्रा किस्म, मौसम और बुवाई की विधि के अनुसार बदल सकती है। खरीफ उड़द के लिए करीब 18 से 20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर कई कृषि सिफारिशों में बताई जाती है।किसानों को प्रमाणित और अच्छी अंकुरण क्षमता वाला बीज इस्तेमाल करना चाहिए। खराब गुणवत्ता के बीज से पौधों की संख्या कम हो सकती है और इसका असर उत्पादन पर पड़ सकता है। अपने जिले के लिए कौन सी उड़द की किस्म बेहतर है, इसकी जानकारी नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से ली जा सकती है।
बुवाई से पहले बीज उपचार पर दें ध्यान
Black Gram Cultivation में बीज उपचार महत्वपूर्ण है। इससे शुरुआती अवस्था में फसल को कुछ बीज और मिट्टी जनित रोगों से बचाने में मदद मिल सकती है। किसानों को बीज उपचार के लिए अपने क्षेत्र में कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित जैविक या रासायनिक विकल्पों का इस्तेमाल करना चाहिए। दवा की मात्रा और इस्तेमाल का तरीका उत्पाद के लेबल तथा कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही रखें।
उड़द की फसल में सिंचाई कैसे करें?
खरीफ में बोई जाने वाली उड़द काफी हद तक मानसून की बारिश पर निर्भर रहती है। पर्याप्त बारिश होने पर बार-बार सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि लंबे समय तक बारिश न होने और मिट्टी की नमी कम होने पर फसल की अवस्था देखकर सिंचाई की जा सकती है। फूल आने और फलियां बनने के दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी का होना महत्वपूर्ण है। सबसे जरूरी बात यह है कि खेत में पानी जमा न होने दें। जलभराव से पौधों की जड़ों और फसल की बढ़वार पर बुरा असर पड़ सकता है।
उड़द में इन कीटों से रहें सावधान
उड़द की फसल में सफेद मक्खी, माहू, थ्रिप्स और विभिन्न प्रकार की इल्लियों का प्रकोप देखने को मिल सकता है। इसलिए किसानों को नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करना चाहिए। खास तौर पर सफेद मक्खी पर नजर रखना जरूरी है। यह उड़द में पीला मोजेक वायरस फैलाने में भूमिका निभा सकती है।पत्तियों पर पीले और हरे रंग के चितकबरे निशान दिखाई दें तो यह पीला मोजेक रोग का संकेत हो सकता है। संक्रमित पौधों की पहचान होने पर तुरंत स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें।
कीट लगने पर कौन सी दवा डालें?
Urad Farming में किसानों को कीट दिखाई देते ही किसी भी कीटनाशक का छिड़काव नहीं करना चाहिए। सबसे पहले यह पहचानना जरूरी है कि फसल में कौन सा कीट लगा है।अलग-अलग कीटों के लिए अलग सक्रिय तत्व और प्रबंधन की जरूरत हो सकती है। कृषि सिफारिशों में कुछ परिस्थितियों में इमिडाक्लोप्रिड और थायमेथोक्साम जैसे सक्रिय तत्वों का उल्लेख मिलता है, लेकिन कौन सा उत्पाद उड़द और संबंधित कीट के लिए वर्तमान में पंजीकृत है, यह जांचना जरूरी है।
इसलिए किसान कीटनाशक खरीदने या इस्तेमाल करने से पहले KVK, कृषि विभाग या अधिकृत कृषि विशेषज्ञ की सलाह लें। केवल फसल और संबंधित कीट के लिए पंजीकृत उत्पाद का इस्तेमाल करें और उसके लेबल पर दी गई मात्रा, सुरक्षा सावधानियों और प्रतीक्षा अवधि का पालन करें।
पीला मोजेक रोग का ऐसे करें प्रबंधन
पीला मोजेक उड़द की महत्वपूर्ण समस्याओं में से एक है। रोग अधिक फैलने पर फसल की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इस रोग के प्रबंधन में बचाव की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है। किसान अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित रोग प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। सफेद मक्खी इस रोग को फैलाने में भूमिका निभाती है, इसलिए खेत की नियमित निगरानी जरूरी है। रोग या कीट का प्रकोप दिखाई देने पर समय रहते कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें।
खरपतवार से भी बचाएं उड़द की फसल
उड़द की शुरुआती बढ़वार के दौरान खरपतवार फसल के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। ये पौधों के साथ पानी, पोषक तत्व और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। बुवाई के करीब 20 से 25 दिन बाद जरूरत के अनुसार निराई-गुड़ाई की जा सकती है। इसके बाद खेत में दोबारा खरपतवार दिखाई देने पर आवश्यकता के अनुसार दूसरी निराई की जा सकती है। रासायनिक खरपतवारनाशी का इस्तेमाल करना हो तो केवल उड़द के लिए अनुशंसित उत्पाद और मात्रा का इस्तेमाल करें।
कितने दिनों में तैयार होती है उड़द?
उड़द की फसल तैयार होने में लगने वाला समय इसकी किस्म, मौसम और स्थानीय जलवायु पर निर्भर करता है। कई कम अवधि वाली किस्में लगभग 70 से 90 दिनों में पक सकती हैं जब फलियां पकने लगें और पौधों की पत्तियां पीली होकर गिरने लगें तो फसल की कटाई की तैयारी की जा सकती है। किसानों को कटाई में ज्यादा देरी करने से बचना चाहिए, क्योंकि ज्यादा सूखने पर फलियां चटकने से दाने खेत में गिर सकते हैं। कटाई के बाद उपज को अच्छी तरह सुखाकर ही भंडारण करना चाहिए।
क्या उड़द की खेती पर मिलती है सरकारी सब्सिडी?
केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग कृषि योजनाओं के तहत किसानों को सहायता दी जाती है। इसमें प्रमाणित बीज, प्रदर्शन, कृषि उपकरण और अन्य कृषि इनपुट पर मिलने वाली सहायता शामिल हो सकती है। हालांकि उड़द की खेती के लिए मिलने वाली सब्सिडी हर राज्य में एक जैसी नहीं होती। योजना, सब्सिडी की राशि, पात्रता और आवेदन की अंतिम तारीख राज्य और वित्त वर्ष के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसानों को अपने जिले के कृषि विभाग, ब्लॉक कृषि कार्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र या राज्य सरकार के आधिकारिक कृषि पोर्टल से वर्तमान योजनाओं की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
छोटे किसान इन 5 बातों का रखें खास ध्यान
छोटे किसानों के लिए उड़द की खेती में लागत को नियंत्रित रखते हुए फसल की सही देखभाल करना महत्वपूर्ण है। इसके लिए प्रमाणित और स्थानीय क्षेत्र के अनुकूल बीज चुनें। मानसून और खेत की नमी देखकर समय पर बुवाई करें। खेत में जलभराव न होने दें। शुरुआती दिनों में खरपतवार नियंत्रित रखें और नियमित रूप से पौधों में कीट तथा रोग के लक्षण जांचते रहें। इसके अलावा बिना सही जानकारी के कीटनाशक या फफूंदनाशक का इस्तेमाल करने से बचें। जरूरत पड़ने पर कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारी की सलाह लेना बेहतर विकल्प है।
किसानों के लिए क्यों फायदेमंद हो सकती है उड़द?
उड़द कम अवधि वाली प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है। इस कारण किसान इसे अपनी परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग फसल चक्रों में शामिल कर सकते हैं। दलहनी फसल होने के कारण उड़द मिट्टी में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भी योगदान करती है। इससे फसल चक्र में मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि उड़द की खेती से किसान को कितना फायदा होगा, यह उत्पादन, बाजार भाव, मौसम, बीज की कीमत, मजदूरी और अन्य लागतों पर निर्भर करता है। इसलिए खेती शुरू करने से पहले स्थानीय मंडी में उड़द का भाव और प्रति एकड़ संभावित लागत जरूर जांच लें।
निष्कर्ष
Urad Farming करने की योजना बना रहे किसानों के लिए समय पर बुवाई, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी, प्रमाणित बीज और नियमित फसल निगरानी बेहद जरूरी है। खरीफ में मानसून आने और मिट्टी में पर्याप्त नमी होने पर उड़द की बुवाई की जा सकती है।
फसल में कीट या रोग दिखाई देने पर बिना जानकारी के दवा का छिड़काव करने के बजाय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लें। वहीं उड़द और दूसरी दलहनी फसलों पर मिलने वाली सरकारी सहायता की ताजा जानकारी के लिए किसान अपने राज्य के कृषि विभाग से संपर्क कर सकते हैं।
