देश में वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों के सतत विकास, जल संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले की क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) और राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) ने राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देश (एनटीजी) तैयार करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। इसी उद्देश्य से विश्व बैंक समर्थित ‘रिजुवेनेटिंग वाटरशेड्स फॉर एग्रीकल्चरल रेजिलिएंस थ्रू इनोवेटिव डेवलपमेंट (REWARD)’ कार्यक्रम के अंतर्गत 17 और 18 जून को नई दिल्ली के पूसा स्थित नास्क कॉम्प्लेक्स में दूसरी राष्ट्रीय स्तरीय परामर्श बैठक आयोजित की गई।
इस महत्वपूर्ण बैठक में देशभर के जलागम विकास, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं तथा विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य जलागम प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक, तकनीक आधारित और टिकाऊ बनाना है, ताकि वर्षा आधारित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आय और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
‘मेरी मिट्टी, मेरा फर्ज’ फिल्म का हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में भूमि संसाधन विभाग के सचिव नरेंद्र भूषण, राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्रशेखर कुमार तथा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस के अवसर पर सचिव नरेंद्र भूषण ने “मेरी मिट्टी, मेरा फर्ज” नामक एक लघु फिल्म का भी शुभारंभ किया। यह फिल्म मिट्टी संरक्षण, क्षतिग्रस्त भूमि के पुनरुद्धार, वर्षा आधारित क्षेत्रों के विकास और जलागम प्रबंधन के माध्यम से टिकाऊ भविष्य निर्माण का संदेश देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी और जल संसाधनों का संरक्षण देश की खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और कृषि विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
किसान केंद्रित और विज्ञान आधारित जलागम प्रबंधन पर जोर
अपने संबोधन में सचिव नरेंद्र भूषण ने कहा कि भविष्य का जलागम प्रबंधन विज्ञान, सामुदायिक भागीदारी और प्रशासनिक सरलता पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जलागम विकास कार्यक्रमों का केंद्र किसान और स्थानीय जलागम संस्थाएं होनी चाहिए।
उन्होंने राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देश तैयार करते समय वर्षा आधारित क्षेत्रों के विकास, कृषि उत्पादकता में वृद्धि, फसल सघनता बढ़ाने, जल सुरक्षा मजबूत करने, भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को ध्यान में रखने की आवश्यकता बताई।
सचिव ने यह भी कहा कि दिशानिर्देशों में शामिल उपाय ऐसे होने चाहिए जिन्हें देशभर में बड़े स्तर पर लागू किया जा सके, ताकि सभी राज्यों को समान रूप से लाभ मिल सके।
तकनीक आधारित निगरानी और डिजिटल प्लेटफॉर्म की वकालत
एनआरएए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्रशेखर कुमार ने पहली राष्ट्रीय परामर्श बैठक में प्राप्त सुझावों का उल्लेख करते हुए कहा कि निजी क्षेत्र की भागीदारी, डेटा आधारित निर्णय प्रणाली, विभिन्न योजनाओं का अभिसरण, पंचायत राज संस्थाओं की भूमिका और परियोजनाओं की दीर्घकालिक स्थिरता जैसे विषय भविष्य के जलागम कार्यक्रमों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चैटबॉट, तकनीक संचालित निगरानी एवं मूल्यांकन प्रणाली, मजबूत डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) और राष्ट्रीय वेब पोर्टल विकसित करने पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार आधुनिक तकनीकों के उपयोग से परियोजनाओं की योजना, क्रियान्वयन और निगरानी अधिक प्रभावी और पारदर्शी बन सकेगी।
ड्रोन तकनीक और GIS से होगा बेहतर नियोजन
भूमि संसाधन विभाग के संयुक्त सचिव (वाटरशेड मैनेजमेंट) ने जलागम विकास कार्यक्रमों में ड्रोन तकनीक के उपयोग पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि उच्च गुणवत्ता वाली भू-स्थानिक जानकारी प्राप्त करने के लिए ड्रोन आधारित सर्वेक्षण अत्यंत उपयोगी साबित हो सकते हैं।
इसके साथ ही भूमि संसाधन सूचीकरण (LRI), हाइड्रोलॉजी-लाइट दृष्टिकोण, रिमोट सेंसिंग और जीआईएस आधारित वेब पोर्टल विकास जैसे विषयों पर भी विस्तृत चर्चा की गई। इन तकनीकों की मदद से जलागम क्षेत्रों की बेहतर योजना बनाना, संसाधनों का आकलन करना और परियोजनाओं की निगरानी करना अधिक आसान होगा।
स्थिरता और रखरखाव पर विशेष फोकस
बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि जलागम परियोजनाओं का लाभ केवल निर्माण कार्यों तक सीमित न रहे, बल्कि उनकी दीर्घकालिक स्थिरता भी सुनिश्चित की जाए।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि परियोजना पूर्ण होने के बाद जल संरचनाओं और अन्य परिसंपत्तियों के रखरखाव के लिए तकनीकी सेवा प्रदाताओं, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाई जाए। इससे परिसंपत्तियों की उपयोगिता लंबे समय तक बनी रहेगी और निवेश का बेहतर परिणाम मिलेगा।
वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों को मिलेगा नया बल
भारत का एक बड़ा कृषि क्षेत्र आज भी वर्षा पर निर्भर है। इन क्षेत्रों में अनियमित मानसून, सूखा, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और जल संकट जैसी समस्याएं किसानों के सामने गंभीर चुनौतियां पैदा करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रभावी जलागम प्रबंधन इन समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकता है। नई तकनीकी दिशानिर्देशों के माध्यम से वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, मिट्टी संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
100 से अधिक विशेषज्ञों ने साझा किए सुझाव
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम में विश्व बैंक, नाबार्ड, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), कर्नाटक और ओडिशा जैसे REWARD राज्यों, विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तथा अन्य संगठनों के लगभग 100 विशेषज्ञों और क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
कार्यक्रम के दौरान भूमि संसाधन सूचीकरण, हाइड्रोलॉजी, डिसीजन सपोर्ट सिस्टम, तकनीक आधारित निगरानी एवं मूल्यांकन, सामुदायिक भागीदारी, सामाजिक जागरूकता, आजीविका संवर्धन, जलागम परिसंपत्तियों की स्थिरता और रिमोट सेंसिंग आधारित वेब पोर्टल जैसे विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।
जलवायु अनुकूल कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देशों का अंतिम स्वरूप देश में जलागम प्रबंधन की गुणवत्ता और प्रभावशीलता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा। इससे वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ेगा, जल संसाधनों का बेहतर संरक्षण होगा और किसानों की जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने की क्षमता मजबूत होगी।
REWARD कार्यक्रम के तहत शुरू की गई यह पहल न केवल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को नई दिशा देगी, बल्कि ग्रामीण आजीविका, कृषि विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण बदलाव लाने का आधार बनेगी। इससे देश के लाखों किसानों को दीर्घकालिक लाभ मिलने की उम्मीद है।
