देश में खेती की लागत और फसल उत्पादन को लेकर चर्चा के बीच मिट्टी की सेहत भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनती जा रही है। किसानों के लिए यूरिया सबसे आसानी से उपलब्ध और प्रमुख नाइट्रोजन उर्वरकों में से एक है। फसल में तेजी से हरियाली और बढ़वार दिखने के कारण किसान इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जब यूरिया का प्रयोग फसल की वास्तविक जरूरत से अधिक या दूसरे पोषक तत्वों के संतुलन के बिना किया जाता है, तो लंबे समय में मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो सकती है।
यह समझना जरूरी है कि यूरिया अपने आप में खराब उर्वरक नहीं है। पौधों की बढ़वार के लिए नाइट्रोजन जरूरी पोषक तत्व है और सही मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल फसल की उत्पादकता बढ़ाने में मदद करता है। समस्या तब पैदा होती है, जब किसान मिट्टी की जरूरत और फसल की अवस्था को जाने बिना बार-बार अधिक मात्रा में यूरिया डालता है।
यूरिया की जरूरत क्यों पड़ती है?
नाइट्रोजन पौधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। यह पत्तियों और तनों की वृद्धि तथा पौधे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खेत में नाइट्रोजन की कमी होने पर पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है और पत्तियों में पीलापन दिखाई दे सकता है।
इसी वजह से किसान फसल में यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। खासकर गेहूं और दूसरी अनाज वाली फसलों में नाइट्रोजन की जरूरत अधिक होती है।
समस्या तब होती है, जब किसान यह मान लेता है कि ज्यादा यूरिया डालने से उत्पादन भी उसी अनुपात में बढ़ेगा। वास्तव में ऐसा जरूरी नहीं है। फसल की जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने पर अतिरिक्त पोषक तत्व का पूरा उपयोग पौधा नहीं कर पाता।
ज्यादा यूरिया से मिट्टी पर क्या असर पड़ता है?
यूरिया मिट्टी में पहुंचने के बाद नाइट्रोजन के विभिन्न रूपों में बदलता है। पौधे इसका कुछ हिस्सा उपयोग करते हैं, जबकि अतिरिक्त नाइट्रोजन का एक हिस्सा मिट्टी और पानी की व्यवस्था में चला जाता है।
लगातार असंतुलित उर्वरक इस्तेमाल से मिट्टी के रासायनिक संतुलन पर असर पड़ सकता है। खासकर जब किसान नाइट्रोजन पर अधिक निर्भर रहता है और फास्फोरस, पोटाश, सल्फर तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत को नजरअंदाज करता है।
मिट्टी की सेहत केवल नाइट्रोजन से तय नहीं होती। पौधों को कई पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इसलिए एक ही पोषक तत्व पर अत्यधिक निर्भरता मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को बिगाड़ सकती है।
मिट्टी की उर्वरता केवल खाद की मात्रा से नहीं बढ़ती
अक्सर किसान मानता है कि जितनी ज्यादा खाद डाली जाएगी, उतनी ही मिट्टी उपजाऊ होगी। लेकिन मिट्टी की वास्तविक उर्वरता कई चीजों पर निर्भर करती है।
मिट्टी में जैविक पदार्थ, सूक्ष्मजीव, नमी, पीएच, पोषक तत्व और उसकी भौतिक संरचना सभी महत्वपूर्ण होते हैं। यदि खेत में लगातार रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित इस्तेमाल होता है और जैविक पदार्थ की पूर्ति नहीं होती, तो मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय में प्रभावित हो सकती है।
इसलिए मिट्टी को स्वस्थ रखने के लिए केवल यूरिया की मात्रा बढ़ाना समाधान नहीं है।
नाइट्रोजन की अधिकता से क्या समस्या हो सकती है?
जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने पर पौधे में अत्यधिक शाकीय वृद्धि हो सकती है। इसका मतलब है कि पौधे की पत्तियों और तने की वृद्धि ज्यादा हो सकती है, जबकि फसल के दूसरे विकास चरण अपेक्षित रूप से मजबूत नहीं हों।
कुछ फसलों में अत्यधिक नाइट्रोजन से पौधे कमजोर होकर गिरने यानी लॉजिंग की समस्या का सामना कर सकते हैं। इसके अलावा पौधे की वृद्धि और पोषक तत्वों के संतुलन में भी बदलाव आ सकता है।
इसलिए फसल की अवस्था और मिट्टी की वास्तविक जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन देना अधिक प्रभावी तरीका है।
केवल यूरिया पर निर्भरता क्यों खतरनाक?
किसान के लिए यूरिया अपेक्षाकृत सस्ता और आसानी से उपलब्ध उर्वरक है। यही कारण है कि कई बार किसान दूसरे पोषक तत्वों की तुलना में यूरिया का अधिक इस्तेमाल करता है।
लेकिन फसल को केवल नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती। फास्फोरस जड़ों और पौधे के विकास में महत्वपूर्ण है, पोटाश पौधे की कई जैविक प्रक्रियाओं और मजबूती में भूमिका निभाता है। इसके अलावा सल्फर और कई सूक्ष्म पोषक तत्व भी फसल के लिए जरूरी हो सकते हैं।
यदि खेत में लगातार सिर्फ यूरिया का इस्तेमाल किया जाता है, तो मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है और कुछ पोषक तत्वों की कमी सामने आ सकती है।
मिट्टी जांच से पता चलेगी सही जरूरत
यूरिया की मात्रा तय करने का सबसे बेहतर आधार मिट्टी की जांच है। मिट्टी जांच से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि खेत में कौन से पोषक तत्व पर्याप्त हैं और किनकी कमी है।
यदि मिट्टी में नाइट्रोजन की स्थिति पहले से ठीक है, तो जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने का कोई लाभ नहीं होगा। इसके विपरीत यदि किसी पोषक तत्व की कमी है, तो केवल यूरिया डालने से वह कमी दूर नहीं होगी।
इसलिए किसानों को खाद खरीदने से पहले मिट्टी की जरूरत समझने पर जोर देना चाहिए।
यूरिया की जगह संतुलित पोषण जरूरी
मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि किसान यूरिया का इस्तेमाल बंद कर दें। बल्कि जरूरत के अनुसार यूरिया का इस्तेमाल किया जाए और साथ में फास्फोरस, पोटाश, सल्फर तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की भी पूर्ति की जाए।
फसल की जरूरत, मिट्टी की जांच और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर उर्वरक की मात्रा तय करना अधिक उपयोगी हो सकता है।
इसके साथ जैविक खाद, कम्पोस्ट और फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन से मिट्टी में जैविक पदार्थ बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
यूरिया का सही इस्तेमाल कैसे करें?
यूरिया का इस्तेमाल फसल की जरूरत के अनुसार चरणबद्ध तरीके से करना अधिक प्रभावी हो सकता है। एक साथ बहुत अधिक मात्रा डालने के बजाय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उचित समय पर इस्तेमाल करने से नाइट्रोजन के उपयोग की दक्षता बेहतर हो सकती है।
खेत में पर्याप्त नमी की स्थिति, फसल की अवस्था और मौसम को ध्यान में रखना भी जरूरी है। बहुत अधिक मात्रा में यूरिया डालना न तो हमेशा उत्पादन बढ़ाता है और न ही किसान की लागत कम करता है।
सही मात्रा और सही समय पर उर्वरक का इस्तेमाल किसान के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।
सरकार भी संतुलित खाद इस्तेमाल पर दे रही जोर
भारत में लंबे समय से संतुलित और विवेकपूर्ण उर्वरक इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को यह समझाना है कि फसल की जरूरत के अनुसार सभी जरूरी पोषक तत्वों का इस्तेमाल किया जाए।
नीम-लेपित यूरिया और उर्वरक उपयोग में दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों का उद्देश्य भी नाइट्रोजन के बेहतर इस्तेमाल से जुड़ा है। लेकिन तकनीक के साथ किसान की जागरूकता भी जरूरी है।
यदि किसान बिना मिट्टी की जरूरत जाने केवल फसल को ज्यादा हरा देखने के लिए यूरिया बढ़ाता रहेगा, तो लंबे समय में मिट्टी की सेहत पर दबाव पड़ सकता है।
मिट्टी बचाने के लिए क्या करना चाहिए?
मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए सबसे पहले खेत की वास्तविक स्थिति को समझना जरूरी है। इसके लिए समय-समय पर मिट्टी की जांच करानी चाहिए। जांच के आधार पर ही उर्वरकों की मात्रा तय करनी चाहिए।
फसल चक्र अपनाना, जैविक पदार्थ बढ़ाना, फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन और संतुलित उर्वरक उपयोग भी मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान यूरिया को फसल उत्पादन का अकेला आधार न मानें। नाइट्रोजन जरूरी है, लेकिन संतुलित पोषण उससे भी ज्यादा जरूरी है।
निष्कर्ष
यूरिया खुद मिट्टी का दुश्मन नहीं है। समस्या उसके जरूरत से ज्यादा और असंतुलित इस्तेमाल से पैदा होती है। फसल को नाइट्रोजन की जरूरत होती है और सही मात्रा में यूरिया उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन लगातार जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से पोषक तत्वों का संतुलन प्रभावित हो सकता है और मिट्टी की सेहत पर लंबे समय में दबाव पड़ सकता है।
इसलिए मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए खाद की मात्रा बढ़ाने के बजाय खाद के सही इस्तेमाल पर ध्यान देना जरूरी है। मिट्टी जांच, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, जैविक पदार्थों का उपयोग और फसल की जरूरत के अनुसार पोषण देना ही टिकाऊ खेती की दिशा में बेहतर कदम हो सकता है।
आखिरकार स्वस्थ मिट्टी ही लंबे समय तक अच्छी फसल की सबसे बड़ी बुनियाद है। आज खेत में जरूरत से ज्यादा यूरिया डालकर उत्पादन बढ़ाने की कोशिश अगर मिट्टी की सेहत को कमजोर करती है, तो आने वाले वर्षों में इसकी कीमत किसान को ही चुकानी पड़ सकती है।

