देश की उर्वरक सुरक्षा, किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने और सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियों (PSUs) की भूमिका को लेकर संसद की एक स्थायी समिति ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। समिति ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि उर्वरक क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनियों के विनिवेश (Disinvestment), आधुनिकीकरण और क्षमता विस्तार से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार द्वारा अपेक्षित स्तर पर कार्रवाई नहीं की गई है। समिति ने इन विषयों की दोबारा समीक्षा करने और सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक इकाइयों को अधिक सक्षम बनाने के लिए ठोस कदम उठाने की सिफारिश की है।
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां उर्वरक सुरक्षा की रीढ़
संसदीय समिति ने अपने अवलोकन में कहा कि देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन को बनाए रखने में सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये कंपनियां केवल उर्वरकों का उत्पादन ही नहीं करतीं, बल्कि संकट के समय आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने और किसानों तक समय पर उर्वरक पहुंचाने में भी अहम योगदान देती हैं।
समिति का मानना है कि यदि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को पर्याप्त निवेश, आधुनिक तकनीक और दीर्घकालिक नीति समर्थन मिले, तो भारत उर्वरक उत्पादन में और अधिक आत्मनिर्भर बन सकता है तथा आयात पर निर्भरता भी कम की जा सकती है।
विनिवेश की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
समिति ने कहा कि पहले भी उसने सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियों के विनिवेश से जुड़े मामलों पर सावधानी बरतने की सलाह दी थी। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार इन सिफारिशों पर अपेक्षित कार्रवाई स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती।
समिति का कहना है कि उर्वरक क्षेत्र केवल एक व्यावसायिक उद्योग नहीं, बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से जुड़ा रणनीतिक क्षेत्र है। इसलिए किसी भी प्रकार के विनिवेश या हिस्सेदारी में कमी के निर्णय से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया कि जिन कंपनियों के पास उत्पादन क्षमता, प्रशिक्षित मानव संसाधन और मजबूत वितरण नेटवर्क मौजूद है, उन्हें कमजोर करने के बजाय प्रतिस्पर्धी और आधुनिक बनाया जाना अधिक लाभकारी होगा।
आधुनिकीकरण में तेजी लाने की जरूरत
समिति ने कहा कि देश की कई सार्वजनिक उर्वरक इकाइयों में तकनीकी उन्नयन और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है। आधुनिक मशीनरी, ऊर्जा दक्ष तकनीकों और डिजिटल संचालन प्रणाली को अपनाकर उत्पादन लागत कम की जा सकती है तथा उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
इसके अलावा प्राकृतिक गैस की बेहतर उपलब्धता, ऊर्जा दक्ष संयंत्रों और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन प्रक्रियाओं पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई है।
समिति का मानना है कि यदि समय पर आधुनिकीकरण नहीं किया गया, तो भविष्य में उत्पादन लागत बढ़ सकती है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारतीय कंपनियों की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
आयात निर्भरता कम करने पर जोर
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। हालांकि घरेलू उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, फिर भी यूरिया, डीएपी और कई कच्चे माल के लिए देश अभी भी आयात पर काफी हद तक निर्भर है।
समिति ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने से आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनावों का प्रभाव भी सीमित किया जा सकेगा।
हाल के वर्षों में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, प्राकृतिक गैस की कीमतों में वृद्धि और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों ने उर्वरक बाजार को प्रभावित किया है। ऐसे समय में मजबूत घरेलू उत्पादन क्षमता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित होती है।
किसानों के हितों को प्राथमिकता देने की सलाह
रिपोर्ट में कहा गया है कि उर्वरक क्षेत्र से जुड़ी सभी नीतियों का अंतिम उद्देश्य किसानों को समय पर और उचित मूल्य पर उर्वरक उपलब्ध कराना होना चाहिए।
यदि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां मजबूत रहेंगी, तो सरकार जरूरत पड़ने पर उत्पादन और वितरण व्यवस्था को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित कर सकेगी। इससे बुवाई के मौसम में खाद की उपलब्धता बनाए रखने में भी सहायता मिलेगी।
समिति ने यह भी सुझाव दिया कि उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स, गोदाम व्यवस्था और डिजिटल निगरानी प्रणाली को भी मजबूत किया जाए ताकि किसी क्षेत्र में कृत्रिम कमी या आपूर्ति बाधा की स्थिति उत्पन्न न हो।
सरकार से मांगी गई विस्तृत कार्ययोजना
समिति ने सरकार से आग्रह किया है कि वह सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियों के भविष्य को लेकर स्पष्ट और दीर्घकालिक रणनीति प्रस्तुत करे। इसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान देने की सिफारिश की गई है—
- सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक इकाइयों के आधुनिकीकरण की समयबद्ध योजना।
- उत्पादन क्षमता विस्तार के लिए आवश्यक निवेश।
- विनिवेश से संबंधित नीतियों की व्यापक समीक्षा।
- ऊर्जा दक्ष और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाने की रणनीति।
- घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात निर्भरता कम करने की कार्ययोजना।
- अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने के लिए उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग।
विशेषज्ञों की राय
कृषि और उर्वरक क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में उर्वरक क्षेत्र केवल औद्योगिक गतिविधि नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा का आधार है। इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को प्रतिस्पर्धी, आधुनिक और वित्तीय रूप से मजबूत बनाना आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि उत्पादन क्षमता, ऊर्जा दक्षता और अनुसंधान पर निवेश बढ़ाया जाए, तो भारत न केवल अपनी घरेलू आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा कर सकेगा, बल्कि भविष्य में उर्वरक क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ा सकेगा।
आगे की राह
संसदीय समिति की टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब भारत कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, उर्वरक उत्पादन क्षमता विस्तार और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियों का आधुनिकीकरण, बेहतर प्रबंधन और संतुलित नीति समर्थन देश की उर्वरक सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार समिति की सिफारिशों पर किस प्रकार की कार्रवाई करती है और सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियों के भविष्य को लेकर क्या नई रणनीति सामने लाती है। यदि इन सुझावों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे न केवल उर्वरक उद्योग को मजबूती मिलेगी, बल्कि किसानों को भी दीर्घकालिक लाभ प्राप्त हो सकता है।

