मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता ने वैश्विक उर्वरक बाजार को हिला दिया है। हालांकि हालात सामान्य होने और होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से पूरी तरह खुलने की संभावना जताई जा रही है, लेकिन भारत जैसे बड़े कृषि देश के लिए उर्वरकों की आपूर्ति में तत्काल राहत मिलना आसान नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही समुद्री मार्ग सामान्य हो जाए, लेकिन सप्लाई चेन को पूरी तरह पटरी पर लौटने में कई महीने लग सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल, गैस और कई औद्योगिक उत्पादों की सप्लाई का प्रमुख रास्ता है। उर्वरक उद्योग के लिए भी इसका महत्व बहुत अधिक है क्योंकि सऊदी अरब, कतर, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश फॉस्फेट, अमोनिया और यूरिया जैसे उत्पादों के बड़े निर्यातक हैं।
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। विशेष रूप से डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया और अन्य कच्चे माल के लिए देश विदेशों पर निर्भर है। ऐसे में होर्मुज क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव सीधे भारतीय कृषि क्षेत्र को प्रभावित करता है।
सप्लाई बहाल होने में क्यों लगेगा समय?
कई लोगों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य खुल जाता है तो उर्वरकों की आपूर्ति तुरंत सामान्य हो जाएगी। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
सबसे पहले, समुद्री परिवहन कंपनियों को अपने जहाजों के शेड्यूल दोबारा व्यवस्थित करने पड़ेंगे। संघर्ष के दौरान कई जहाजों को वैकल्पिक मार्गों पर भेजा गया या उनकी यात्रा स्थगित कर दी गई। इसके कारण बंदरगाहों पर माल की आवाजाही प्रभावित हुई।
दूसरा, बीमा लागत में बढ़ोतरी हुई है। किसी भी संघर्ष क्षेत्र में जहाज भेजने से पहले कंपनियां अतिरिक्त सुरक्षा और बीमा व्यवस्था करती हैं। इससे परिवहन लागत बढ़ती है और सप्लाई की गति धीमी पड़ जाती है।
तीसरा, उर्वरक उत्पादक कंपनियों को भी उत्पादन और निर्यात शेड्यूल दोबारा संतुलित करना होगा। जिन ऑर्डरों में देरी हुई है, उन्हें पूरा करने में समय लगेगा। इसलिए भारत तक पर्याप्त मात्रा में माल पहुंचने में कई सप्ताह या महीने लग सकते हैं।
खरीफ सीजन पर असर
भारत में खरीफ सीजन की बुआई जून से अक्टूबर के बीच होती है। इसी अवधि में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी प्रमुख फसलों की खेती की जाती है। इन फसलों के लिए यूरिया और डीएपी की मांग सबसे अधिक रहती है।
यदि उर्वरकों की आपूर्ति समय पर नहीं पहुंचती, तो किसानों को बुवाई और पोषण प्रबंधन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। कई राज्यों से पहले ही किसानों द्वारा अतिरिक्त उर्वरक खरीदने और भंडारण करने की खबरें सामने आ चुकी हैं।
हालांकि सरकार लगातार यह आश्वासन दे रही है कि देश में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है, लेकिन बाजार में फैली अफवाहें और वैश्विक अनिश्चितता किसानों की चिंताओं को बढ़ा रही हैं।
DAP पर सबसे ज्यादा दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में डीएपी की उपलब्धता सबसे बड़ी चिंता का विषय बन सकती है। भारत अपनी डीएपी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए आवश्यक कच्चा माल भी बड़े पैमाने पर विदेशों से आता है।
यदि वैश्विक सप्लाई प्रभावित रहती है तो डीएपी की उपलब्धता और कीमत दोनों पर असर पड़ सकता है। इसके विपरीत यूरिया के मामले में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है क्योंकि देश ने पिछले कुछ वर्षों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाई है।
सरकार की तैयारी
केंद्र सरकार ने संभावित संकट को देखते हुए पहले ही कई कदम उठाए हैं। विभिन्न बंदरगाहों पर उर्वरकों का स्टॉक बढ़ाया गया है। आयात अनुबंधों की निगरानी की जा रही है और राज्यों के साथ समन्वय स्थापित किया गया है ताकि किसानों तक समय पर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
इसके अलावा सरकार संतुलित उर्वरक उपयोग और वैकल्पिक पोषक तत्व स्रोतों को भी बढ़ावा दे रही है। जैव उर्वरक, ऑर्गेनिक खाद और नैनो यूरिया जैसे उत्पादों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सके।
किसानों के लिए क्या है संदेश?
विशेषज्ञ किसानों को घबराकर उर्वरकों का अनावश्यक भंडारण न करने की सलाह दे रहे हैं। अत्यधिक खरीदारी से कृत्रिम कमी की स्थिति बन सकती है, जिससे अन्य किसानों को परेशानी हो सकती है।
किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए और संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाना चाहिए। जैव उर्वरकों और जैविक खादों का उपयोग बढ़ाकर भी रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को आंशिक रूप से कम किया जा सकता है।
आगे की राह
होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना निश्चित रूप से वैश्विक व्यापार और उर्वरक आपूर्ति के लिए सकारात्मक संकेत होगा। लेकिन केवल समुद्री मार्ग खुल जाना ही समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है। सप्लाई चेन को सामान्य होने, लंबित ऑर्डरों की डिलीवरी और बाजार में स्थिरता लौटने में समय लगेगा।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, आयात स्रोतों में विविधता लाने और वैकल्पिक कृषि पोषण समाधानों को प्रोत्साहित करने की दिशा में अपने प्रयास जारी रखे। इससे भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का प्रभाव किसानों पर कम पड़ेगा।
फिलहाल किसानों और कृषि क्षेत्र को धैर्य रखने की आवश्यकता है। होर्मुज के खुलने से राहत की उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन उर्वरकों की स्थिति पूरी तरह सामान्य होने में अभी कुछ महीने लग सकते हैं।

