भारतीय कृषि में बढ़ती उत्पादकता, बेहतर गुणवत्ता और मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने एक बार फिर संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन (Balanced Nutrient Management) को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल यूरिया पर निर्भर रहकर अधिक उत्पादन प्राप्त करना अब संभव नहीं है। फसलों की वास्तविक पोषण आवश्यकता को पूरा करने के लिए नाइट्रोजन के साथ-साथ फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर तथा जिंक, बोरॉन, आयरन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग आवश्यक है।
हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि कई क्षेत्रों में किसान अपेक्षाकृत सस्ते होने के कारण यूरिया का अधिक उपयोग करते हैं, जबकि अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की अनदेखी कर देते हैं। इससे अल्पकाल में फसल हरी-भरी दिखाई देती है, लेकिन लंबे समय में मिट्टी की उर्वरता घटने लगती है, उत्पादन स्थिर हो जाता है और फसल की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
केवल यूरिया पर्याप्त क्यों नहीं?
यूरिया फसलों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है, जो पत्तियों की वृद्धि और हरियाली के लिए आवश्यक है। लेकिन पौधों को स्वस्थ विकास और अधिक उपज के लिए केवल नाइट्रोजन ही नहीं, बल्कि फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम तथा कई सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है।
यदि किसी एक पोषक तत्व की कमी हो जाए, तो अन्य पोषक तत्वों का पूरा लाभ भी फसल नहीं उठा पाती। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक संतुलित पोषण को अधिक उत्पादन की सबसे महत्वपूर्ण शर्त मानते हैं।
मिट्टी की उर्वरता पर पड़ता है असर
लगातार असंतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है। कई राज्यों में मिट्टी परीक्षण से यह सामने आया है कि जिंक, बोरॉन और सल्फर जैसे पोषक तत्वों की कमी तेजी से बढ़ रही है। इनकी कमी के कारण फसलों की वृद्धि रुक सकती है, दानों का विकास प्रभावित हो सकता है और उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो भविष्य में अधिक उर्वरक डालने के बावजूद उत्पादन बढ़ाना कठिन हो जाएगा।
संतुलित पोषण से बढ़ती है उत्पादकता
फसल को उसकी आवश्यकता के अनुसार सभी आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने से पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं, प्रकाश संश्लेषण बेहतर होता है और पौधे रोगों तथा प्रतिकूल मौसम का सामना अधिक प्रभावी ढंग से कर पाते हैं।
संतुलित पोषण अपनाने वाले किसानों को सामान्यतः अधिक उपज, बेहतर गुणवत्ता, दानों का अच्छा भराव, फलों का बेहतर आकार तथा बाजार में अधिक मूल्य मिलने की संभावना रहती है।
सूक्ष्म पोषक तत्वों की बढ़ती अहमियत
पहले कृषि में मुख्य रूप से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश पर ध्यान दिया जाता था, लेकिन अब सूक्ष्म पोषक तत्वों का महत्व तेजी से बढ़ा है। जिंक, बोरॉन, आयरन, कॉपर, मैंगनीज और मोलिब्डेनम जैसे तत्व बहुत कम मात्रा में आवश्यक होते हैं, लेकिन इनकी कमी का असर उत्पादन पर काफी बड़ा हो सकता है।
आज कई राज्यों में जिंक और बोरॉन की कमी व्यापक रूप से देखी जा रही है। इसलिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर इन पोषक तत्वों का उपयोग करने की सलाह दी जा रही है।
न्यूट्रिएंट यूज़ एफिशिएंसी (NUE) बढ़ाने पर जोर
सम्मेलनों और कृषि विशेषज्ञों द्वारा अब केवल उर्वरक की मात्रा बढ़ाने के बजाय Nutrient Use Efficiency (NUE) यानी पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने पर विशेष बल दिया जा रहा है। इसका अर्थ है कि पौधे द्वारा डाले गए उर्वरकों का अधिकतम उपयोग हो और पोषक तत्वों की बर्बादी कम से कम हो।
यदि उर्वरकों का सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही विधि से उपयोग किया जाए, तो कम मात्रा में भी बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे लागत घटती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
नई तकनीकें बदल रही हैं खेती
आज कृषि क्षेत्र में कई आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं जो पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ाने में मदद करती हैं। इनमें नैनो उर्वरक, नियंत्रित विमोचन (Controlled Release) उर्वरक, जल-घुलनशील उर्वरक, फर्टिगेशन, ड्रोन आधारित छिड़काव, सेंसर आधारित पोषण प्रबंधन और प्रिसिजन फार्मिंग जैसी तकनीकें शामिल हैं।
इन तकनीकों के माध्यम से पौधों को आवश्यक पोषक तत्व सही समय पर और सही मात्रा में उपलब्ध कराए जा सकते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ उर्वरकों की बर्बादी भी कम होती है।
मिट्टी परीक्षण की भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि बिना मिट्टी परीक्षण के उर्वरकों का उपयोग करना अनुमान के आधार पर इलाज करने जैसा है। हर खेत की मिट्टी अलग होती है और उसकी पोषक तत्वों की स्थिति भी अलग होती है।
मिट्टी परीक्षण के आधार पर तैयार पोषण योजना किसानों को यह बताती है कि किस खेत में कौन-सा पोषक तत्व कम है और किस उर्वरक की कितनी मात्रा आवश्यक है। इससे अनावश्यक खर्च बचता है और फसल को संतुलित पोषण मिलता है।
किसानों के लिए क्या है सलाह?
कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि वे केवल यूरिया के उपयोग पर निर्भर न रहें। प्रत्येक फसल की अनुशंसित उर्वरक मात्रा का पालन करें, मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड का उपयोग करें, समय-समय पर मिट्टी परीक्षण कराएं और आवश्यकता के अनुसार फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करें।
इसके साथ ही जैव उर्वरकों, कार्बनिक खाद, हरी खाद और फसल अवशेष प्रबंधन को भी पोषण प्रबंधन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे मिट्टी का जैविक कार्बन बढ़ता है और भूमि की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहती है।
भविष्य की टिकाऊ खेती का आधार
जलवायु परिवर्तन, सीमित कृषि भूमि और बढ़ती खाद्यान्न आवश्यकता को देखते हुए अब ऐसी कृषि प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है जो कम संसाधनों में अधिक उत्पादन दे। संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन इसी दिशा में एक प्रभावी समाधान माना जा रहा है।
यह न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक है, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य, जल संरक्षण, उर्वरक उपयोग दक्षता और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
निष्कर्ष
भारतीय कृषि को अधिक उत्पादक, लाभकारी और टिकाऊ बनाने के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को व्यापक स्तर पर अपनाना समय की आवश्यकता है। केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों का वैज्ञानिक एवं संतुलित उपयोग फसल उत्पादन बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और किसानों की आय में सुधार का मजबूत आधार बन सकता है। नई तकनीकों, मिट्टी परीक्षण, पोषण प्रबंधन और जागरूकता के माध्यम से भारत भविष्य में अधिक दक्ष, पर्यावरण-अनुकूल और आत्मनिर्भर कृषि प्रणाली की ओर तेजी से आगे बढ़ सकता है।
