भारत में कृषि को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाने के उद्देश्य से आयोजित SOMS 2026 (Specialty Fertilizer Summit & B2B Expo) में स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर उद्योग को आत्मनिर्भर बनाने पर विशेष जोर दिया गया। सम्मेलन में देश-विदेश के कृषि वैज्ञानिकों, उर्वरक उद्योग के प्रतिनिधियों, नीति निर्माताओं, शोध संस्थानों और कृषि विशेषज्ञों ने भाग लिया तथा स्पेशियलिटी उर्वरकों, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और जल-घुलनशील (Water Soluble) उर्वरकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इन उन्नत उर्वरकों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनता है, तो न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद उचित कीमत पर उपलब्ध होंगे। इससे कृषि उत्पादन, फसल गुणवत्ता और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
क्या हैं स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर?
स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर ऐसे उन्नत उर्वरक होते हैं जिन्हें विशेष फसलों, विशेष मिट्टी की स्थितियों या विशेष पोषक तत्वों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर विकसित किया जाता है। इनमें जल-घुलनशील उर्वरक, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स, नियंत्रित विमोचन (Controlled Release) उर्वरक, धीमी गति से पोषक तत्व छोड़ने वाले उर्वरक, फर्टिगेशन ग्रेड उर्वरक और फोलियर स्प्रे के लिए तैयार विशेष पोषक उत्पाद शामिल होते हैं।
इन उर्वरकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये पौधों को आवश्यक पोषक तत्व अधिक दक्षता से उपलब्ध कराते हैं, जिससे पोषक तत्वों की हानि कम होती है और उत्पादन क्षमता बढ़ती है।
आत्मनिर्भरता क्यों है जरूरी?
भारत आज भी कई स्पेशियलिटी उर्वरकों और उनके कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और भू-राजनीतिक तनाव कई बार किसानों तक समय पर उत्पाद पहुंचाने में चुनौती पैदा करते हैं।
SOMS 2026 में विशेषज्ञों ने कहा कि यदि देश में इन उर्वरकों का घरेलू उत्पादन बढ़ाया जाए, तो आयात पर निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों को स्थिर कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध कराए जा सकेंगे।
नीति और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत
सम्मेलन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर उद्योग के विकास के लिए सरकार, उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि नई तकनीकों के पंजीकरण की प्रक्रिया को वैज्ञानिक मानकों के साथ तेज किया जाए, अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहन दिया जाए तथा घरेलू विनिर्माण इकाइयों के लिए निवेश और नवाचार को बढ़ावा देने वाली नीतियां बनाई जाएं।
माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की बढ़ती भूमिका
भारतीय कृषि में जिंक, बोरॉन, आयरन, मैंगनीज, कॉपर और मोलिब्डेनम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी कई राज्यों में लगातार सामने आ रही है। इनकी कमी के कारण फसल उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं।
सम्मेलन में बताया गया कि माइक्रोन्यूट्रिएंट आधारित उर्वरकों का संतुलित उपयोग केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे फसलों की गुणवत्ता, पोषण मूल्य और बाजार में उनकी स्वीकार्यता भी बेहतर होती है। इसलिए इनके घरेलू उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
जल-घुलनशील उर्वरकों की बढ़ती मांग
ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई और फर्टिगेशन जैसी आधुनिक कृषि तकनीकों के विस्तार के साथ जल-घुलनशील उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ रही है। ये उर्वरक पानी में पूरी तरह घुल जाते हैं और सीधे पौधों की जड़ों तक पोषक तत्व पहुंचाते हैं।
इससे उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ती है, पानी की बचत होती है और पोषक तत्वों का नुकसान कम होता है। विशेष रूप से बागवानी, सब्जी, फूल और उच्च मूल्य वाली फसलों में इनका उपयोग लगातार बढ़ रहा है।
किसानों तक नई तकनीक पहुंचाने पर जोर
SOMS 2026 में केवल उत्पादन बढ़ाने की बात नहीं हुई, बल्कि इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया कि आधुनिक स्पेशियलिटी उर्वरकों की जानकारी किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे।
विशेषज्ञों ने कहा कि किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम, डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म, कृषि विज्ञान केंद्रों, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और कृषि विस्तार सेवाओं के माध्यम से नई तकनीकों का प्रसार तेज किया जाना चाहिए। यदि किसान सही उत्पाद, सही मात्रा और सही समय पर उपयोग करना सीखेंगे, तभी इन उर्वरकों का वास्तविक लाभ मिलेगा।
नवाचार और अनुसंधान की अहम भूमिका
सम्मेलन में अनुसंधान एवं विकास को उद्योग की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया गया। नई पीढ़ी के स्पेशियलिटी उर्वरकों के विकास के लिए विश्वविद्यालयों, निजी कंपनियों और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने पर बल दिया गया।
सटीक कृषि (Precision Agriculture), डिजिटल पोषण प्रबंधन, नैनो तकनीक और स्मार्ट उर्वरक जैसे क्षेत्रों में भारत के पास वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने की क्षमता है। इसके लिए निरंतर निवेश और वैज्ञानिक सहयोग आवश्यक होगा।
पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका
विशेषज्ञों ने बताया कि स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर केवल उत्पादन बढ़ाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में इनसे पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता अधिक होती है, जिससे नाइट्रोजन का अपव्यय कम होता है और मिट्टी तथा जल प्रदूषण को भी नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।
संतुलित पोषण प्रबंधन के साथ इन उर्वरकों का उपयोग कृषि को अधिक टिकाऊ और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने में सहायक हो सकता है।
भारत के लिए सुनहरा अवसर
भारत विश्व के सबसे बड़े कृषि देशों में शामिल है और स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर बाजार भी तेजी से विस्तार कर रहा है। यदि घरेलू उत्पादन, अनुसंधान, नीति समर्थन और किसान जागरूकता पर समान रूप से ध्यान दिया जाए, तो भारत न केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि वैश्विक बाजार में भी एक प्रमुख उत्पादक और निर्यातक के रूप में उभर सकता है।
निष्कर्ष
SOMS 2026 में स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर उद्योग को आत्मनिर्भर बनाने पर दिया गया जोर भारतीय कृषि के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। स्पेशियलिटी उर्वरकों, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और जल-घुलनशील उर्वरकों का घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम होगी, किसानों को आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध होंगे तथा कृषि क्षेत्र में नवाचार को नई गति मिलेगी। यदि सरकार, उद्योग, वैज्ञानिक संस्थान और किसान मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो भारत आत्मनिर्भर कृषि इनपुट प्रणाली विकसित करने के साथ-साथ वैश्विक स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर बाजार में भी अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर सकता है।

