खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होने से पहले भारत सरकार ने किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध कराने के लिए बड़ा कदम उठाया है। देश में प्राकृतिक गैस आपूर्ति पर बढ़ते दबाव और वैश्विक उर्वरक बाजार में अनिश्चितता के बीच भारत ने 17 लाख टन यूरिया आयात करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकारी कंपनी नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) ने इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टेंडर जारी किया है। सरकार का उद्देश्य खरीफ सीजन के दौरान किसी भी प्रकार की खाद कमी की स्थिति से बचना और किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध कराना है।
यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब जून से देशभर में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, बाजरा और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई का कार्य तेजी पकड़ने वाला है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ सीजन में यूरिया की मांग सबसे अधिक रहती है और यदि समय रहते आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की गई तो किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
मध्य पूर्व संकट ने बढ़ाई वैश्विक चिंता
वर्तमान में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक उर्वरक उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। मध्य पूर्व दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस उत्पादक क्षेत्रों में से एक है और उर्वरक उद्योग विशेष रूप से प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है।
भारत में यूरिया उत्पादन के लिए अमोनिया की आवश्यकता होती है, जिसे प्राकृतिक गैस की मदद से तैयार किया जाता है। भारत अपनी कुल गैस आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा एलएनजी (LNG) आयात के माध्यम से पूरा करता है और इस आयात का प्रमुख स्रोत मध्य पूर्व के देश हैं। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर भारतीय उर्वरक उद्योग पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ते तनाव और समुद्री परिवहन जोखिमों के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है। यही कारण है कि हाल के महीनों में दक्षिण एशिया के कई उर्वरक संयंत्रों को उत्पादन घटाना पड़ा या अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। इससे वैश्विक बाजार में यूरिया की उपलब्धता प्रभावित हुई और कीमतों में तेजी देखने को मिली।
20 जुलाई तक भारत पहुंचाने की तैयारी
नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड द्वारा जारी अंतरराष्ट्रीय निविदा के अनुसार कुल 17 लाख टन यूरिया की खरीद की जाएगी। इसमें से लगभग 9 लाख टन यूरिया भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर पहुंचेगा, जबकि शेष मात्रा पूर्वी तट के माध्यम से देश में लाई जाएगी।
टेंडर की शर्तों में स्पष्ट किया गया है कि सभी खेपों को 20 जुलाई तक लोडिंग पोर्ट से रवाना करना अनिवार्य होगा। सरकार चाहती है कि खरीफ सीजन के चरम समय में किसानों को यूरिया की आपूर्ति प्रभावित न हो। समय पर आयात होने से विभिन्न राज्यों में खाद वितरण प्रणाली को भी सुचारू बनाए रखने में मदद मिलेगी।
उर्वरक मंत्रालय और संबंधित एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। सरकार का मानना है कि यदि अभी से पर्याप्त स्टॉक तैयार रखा जाए तो भविष्य में संभावित आपूर्ति संकट का प्रभाव कम किया जा सकता है।
दोगुनी हुई कीमतों ने बढ़ाई चिंता
वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में पिछले कुछ महीनों के दौरान तेज उछाल देखा गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया की लगभग 45 प्रतिशत यूरिया आपूर्ति फारस की खाड़ी क्षेत्र से प्रभावित होती है। ऐसे में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने पर सप्लाई चेन बाधित होती है और कीमतें तेजी से ऊपर जाती हैं।
भारत ने हाल ही में हुए पिछले आयात टेंडर में लगभग 25 लाख टन यूरिया खरीदा था। उस समय भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई थी। कई रिपोर्टों के अनुसार संघर्ष शुरू होने से पहले की तुलना में यूरिया की कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं।
इस स्थिति का सीधा असर भारत सरकार की उर्वरक सब्सिडी पर पड़ सकता है। भारत में किसानों को नियंत्रित मूल्य पर यूरिया उपलब्ध कराया जाता है और बाजार मूल्य तथा बिक्री मूल्य के बीच का अंतर सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो सरकार का सब्सिडी बिल भी काफी बढ़ सकता है।
खरीफ सीजन में कितनी होती है खाद की मांग?
उर्वरक मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जून से सितंबर के बीच खरीफ सीजन में देश को लगभग 3.9 करोड़ टन विभिन्न प्रकार के उर्वरकों की आवश्यकता होती है। इसमें यूरिया की मांग सबसे अधिक रहती है क्योंकि धान, मक्का और अन्य प्रमुख खरीफ फसलों में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का व्यापक उपयोग किया जाता है।
सरकार का कहना है कि वर्तमान में देश के पास लगभग 2 करोड़ टन उर्वरकों का स्टॉक उपलब्ध है, जिससे तत्काल किसी संकट की आशंका नहीं है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ सीजन में मांग बहुत तेजी से बढ़ती है और यदि आयात समय पर नहीं पहुंचा तो स्थानीय स्तर पर कुछ क्षेत्रों में अस्थायी कमी देखने को मिल सकती है।
यही वजह है कि सरकार ने अग्रिम तैयारी करते हुए आयात प्रक्रिया को गति दी है। इससे राज्यों में उर्वरक उपलब्धता बनाए रखने और किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी।
किसानों पर क्या होगा असर?
यूरिया आयात बढ़ाने का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिलेगा क्योंकि इससे खरीफ सीजन के दौरान खाद की उपलब्धता बनी रहने की संभावना बढ़ेगी। सरकार फिलहाल यूरिया की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं करना चाहती, इसलिए किसानों पर तत्काल मूल्य वृद्धि का बोझ पड़ने की संभावना कम है।
हालांकि यदि वैश्विक बाजार में लंबे समय तक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो सरकार की सब्सिडी लागत बढ़ेगी, जिसका असर भविष्य की नीतियों और कृषि बजट पर पड़ सकता है। किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि उन्हें समय पर पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध हो सके।
आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ाने होंगे कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार आने वाले वैश्विक संकट भारत को उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की आवश्यकता का संकेत देते हैं। देश को प्राकृतिक गैस के वैकल्पिक स्रोत विकसित करने, घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और जैविक तथा वैकल्पिक उर्वरकों को प्रोत्साहित करने की दिशा में तेजी से काम करना होगा।
इसके अलावा नैनो यूरिया, जैव उर्वरक और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन जैसी तकनीकों को बढ़ावा देकर पारंपरिक यूरिया पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे न केवल आयात खर्च कम होगा बल्कि कृषि क्षेत्र को लंबे समय तक स्थिर और टिकाऊ बनाने में भी मदद मिलेगी।
खरीफ सीजन 2026 के मद्देनजर सरकार की यह पहल किसानों के लिए राहत भरी खबर मानी जा रही है। हालांकि मध्य पूर्व में जारी तनाव और वैश्विक बाजार की स्थिति आने वाले महीनों में उर्वरक क्षेत्र की दिशा तय करेगी। फिलहाल सरकार का पूरा ध्यान किसानों तक समय पर खाद पहुंचाने और संभावित आपूर्ति संकट को टालने पर केंद्रित है।


