वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और कच्चे माल की कीमतों में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव के बीच संसद की रसायन एवं उर्वरक संबंधी स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Chemicals and Fertilizers) ने भारत की उर्वरक सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। समिति का मानना है कि यदि भारत को भविष्य में उर्वरकों की स्थिर और किफायती आपूर्ति सुनिश्चित करनी है तो केवल आयात पर निर्भर रहने के बजाय कच्चे माल के स्रोतों पर रणनीतिक नियंत्रण स्थापित करना होगा।
लोकसभा में सोमवार को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में समिति ने सरकार को फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से समृद्ध देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते (Long-Term Agreements) करने, संयुक्त उद्यम (Joint Ventures) स्थापित करने और विदेशों में उत्पादन इकाइयों के विकास पर विशेष ध्यान देने की सिफारिश की है।
वैश्विक संकटों से बढ़ रही भारत की चुनौती
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की उर्वरक उत्पादन प्रणाली अब भी बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे माल पर निर्भर है। इस कारण देश को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की अस्थिरता, विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में बदलाव तथा भू-राजनीतिक तनावों का सीधा असर झेलना पड़ता है।
समिति ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब भी किसी क्षेत्र में युद्ध, व्यापारिक प्रतिबंध, समुद्री मार्गों में बाधा या प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, तो उर्वरकों के कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित होती है। इसका असर भारतीय उर्वरक संयंत्रों की उत्पादन क्षमता और किसानों तक समय पर खाद की उपलब्धता पर पड़ता है।
रिपोर्ट के अनुसार, केवल घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कच्चे माल की सुरक्षित और दीर्घकालिक उपलब्धता भी उतनी ही आवश्यक है।
फॉस्फेट और पोटाश के लिए रणनीतिक साझेदारी पर जोर
संसदीय समिति ने सुझाव दिया कि भारत को उन देशों के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी विकसित करनी चाहिए जो फॉस्फेट रॉक, पोटाश और अन्य आवश्यक उर्वरक कच्चे माल के बड़े उत्पादक हैं। इससे भारत को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
समिति ने विशेष रूप से जॉर्डन, मोरक्को और दक्षिण अफ्रीकी देशों में फॉस्फेट खदानों के अधिग्रहण अथवा उनमें निवेश की आवश्यकता पर बल दिया। समिति का मानना है कि यदि भारत इन देशों में खनन परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी प्राप्त करता है तो भविष्य में वैश्विक आपूर्ति संकट का असर काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
इसके अलावा, समिति ने विदेशी देशों में बायबैक व्यवस्था (Buyback Arrangement) के साथ उर्वरक उत्पादन इकाइयों की स्थापना का भी सुझाव दिया है। इस मॉडल में भारत निवेश करेगा और उत्पादन का एक निश्चित हिस्सा पूर्व निर्धारित शर्तों के अनुसार भारत को उपलब्ध कराया जाएगा।
आयात पर अत्यधिक निर्भरता चिंता का विषय
रिपोर्ट में भारत की वर्तमान आयात निर्भरता को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में देश की कुल उर्वरक खपत 70 मिलियन टन (MT) से अधिक रही, जबकि लगभग 28 मिलियन टन उर्वरकों का आयात करना पड़ा।
यूरिया के क्षेत्र में भारत ने उत्पादन क्षमता बढ़ाकर लगभग 80 प्रतिशत आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। इसके बावजूद यूरिया उत्पादन के लिए आवश्यक प्राकृतिक गैस या एलएनजी (LNG) की लगभग 90 प्रतिशत आवश्यकता आयात से पूरी होती है। इसका अर्थ यह है कि घरेलू उत्पादन होने के बावजूद उसकी लागत अंतरराष्ट्रीय गैस बाजार पर निर्भर बनी रहती है।
डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) के मामले में स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण है। देश की कुल आवश्यकता का लगभग 50 से 60 प्रतिशत आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। वहीं पोटाश के मामले में भारत लगभग पूरी तरह विदेशी आपूर्ति पर निर्भर है।
इस प्रकार फॉस्फोरस, पोटाश और प्राकृतिक गैस जैसी प्रमुख सामग्रियों के लिए आयात पर निर्भरता भारत की उर्वरक सुरक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
घरेलू उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग जरूरी
समिति ने यह भी कहा कि देश के कई उर्वरक संयंत्र अपनी स्थापित क्षमता (Installed Capacity) के अनुरूप उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण कच्चे माल की अनियमित उपलब्धता और आयात आधारित आपूर्ति प्रणाली है।
यदि कच्चे माल की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित हो जाए तो मौजूदा संयंत्रों से ही उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। इससे आयात में कमी आएगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराया जा सकेगा।
समिति का मानना है कि घरेलू उत्पादन क्षमता के अधिकतम उपयोग के साथ-साथ विदेशी स्रोतों का रणनीतिक विकास भारत की दीर्घकालिक उर्वरक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी में यूरिया शामिल करने का विरोध
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यूरिया सब्सिडी व्यवस्था से जुड़ा है। समिति ने यूरिया को न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) प्रणाली के अंतर्गत लाने का विरोध किया है।
वर्तमान में यूरिया का अधिकतम खुदरा मूल्य सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है और किसानों को 45 किलोग्राम का एक बैग ₹242 में उपलब्ध कराया जाता है।
यदि यूरिया को एनबीएस प्रणाली में शामिल किया जाता है, तो इसकी कीमत बाजार आधारित हो सकती है, जहां निर्माता मांग और आपूर्ति के आधार पर मूल्य निर्धारित करेंगे। समिति का मानना है कि ऐसी स्थिति में यूरिया की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि किसानों को मिलने वाला यूरिया महंगा हो जाता है तो खेती की लागत बढ़ेगी और इसका प्रतिकूल प्रभाव कृषि उत्पादन तथा किसानों की आय दोनों पर पड़ेगा।
इसी कारण समिति ने सरकार से वर्तमान मूल्य नियंत्रण प्रणाली को बनाए रखने और किसानों के हितों की रक्षा करने की सिफारिश की है।
उर्वरक सुरक्षा को राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बनाने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों में उत्पन्न बाधाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उर्वरक केवल कृषि का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
यदि भारत भविष्य में खाद्य उत्पादन को स्थिर रखना चाहता है तो उर्वरकों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा। इसके लिए केवल आयात बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कच्चे माल के स्रोतों पर दीर्घकालिक नियंत्रण, विदेशी निवेश, संयुक्त उद्यम, खनन अधिकारों में हिस्सेदारी और घरेलू उत्पादन क्षमता के विस्तार जैसी बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी।
किसानों और उद्योग दोनों को होगा लाभ
समिति की सिफारिशें लागू होने पर भारत को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है। एक ओर कच्चे माल की नियमित उपलब्धता से उर्वरक उद्योग को स्थिरता मिलेगी, वहीं दूसरी ओर आयात लागत और वैश्विक कीमतों के उतार-चढ़ाव का प्रभाव कम होगा।
इससे सरकार पर सब्सिडी का दबाव नियंत्रित रखने में भी सहायता मिल सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि किसानों को समय पर और उचित कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराना आसान होगा, जिससे कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा दोनों को मजबूती मिलेगी।
कुल मिलाकर, संसदीय समिति की यह रिपोर्ट भारत की दीर्घकालिक उर्वरक नीति को अधिक आत्मनिर्भर, सुरक्षित और वैश्विक जोखिमों के प्रति सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जा रही है। यदि इन सिफारिशों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाता है, तो आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक उर्वरक बाजार की अनिश्चितताओं से काफी हद तक स्वयं को सुरक्षित रखने में सफल हो सकता है।

