नई दिल्ली- खरीफ 2026 सीजन की तैयारियों के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में आई गिरावट के चलते देश को अब यूरिया आयात लगभग आधी कीमत पर मिल सकता है। इससे न केवल किसानों के लिए उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी, बल्कि केंद्र सरकार के बढ़ते उर्वरक सब्सिडी बिल पर भी दबाव कम होने की उम्मीद है।
जानकारी के अनुसार, नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) ने 27 मई को 17 लाख टन यूरिया की खरीद के लिए वैश्विक निविदा जारी की थी। इस टेंडर में दुनिया भर की 36 से अधिक कंपनियों ने भाग लिया और 444 डॉलर से 605 डॉलर प्रति टन के बीच बोलियां जमा कीं। यह कीमत उस स्तर से काफी कम है जिस पर भारत ने पश्चिम एशिया संकट के दौरान यूरिया खरीदा था। उस समय कुछ खरीद लगभग 959 डॉलर प्रति टन की दर से हुई थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा बोलियां यह संकेत देती हैं कि वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतें धीरे-धीरे सामान्य हो रही हैं। इससे भारत को अपनी आगामी आयात आवश्यकताओं को कम लागत पर पूरा करने का अवसर मिलेगा।
दरअसल, फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों के बाद अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार में भारी उथल-पुथल देखी गई थी। यूरिया और अन्य नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की कीमतों में अचानक तेज उछाल आया था। कई देशों ने ऊंची कीमतों के कारण खरीद टाल दी थी या वैकल्पिक उर्वरकों की ओर रुख किया था। इससे वैश्विक मांग में कुछ कमी आई और बाजार धीरे-धीरे संतुलन की ओर बढ़ने लगा।
इस बीच चीन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले कुछ समय से चीन ने उर्वरक निर्यात पर कई प्रतिबंध लगाए हुए थे, जिससे वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई थी। हालांकि हाल के सप्ताहों में चीन ने सीमित मात्रा में निर्यात कोटा जारी करना शुरू किया है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की उपलब्धता बढ़ी है और कीमतों पर दबाव कम हुआ है।
भारत के लिए यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि देश दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक है। घरेलू उत्पादन के बावजूद भारत अपनी कुल आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। यूरिया देश में सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला उर्वरक है और कुल उर्वरक खपत में इसकी हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत है।
खरीफ सीजन के दौरान यूरिया की मांग विशेष रूप से बढ़ जाती है। धान, मक्का, कपास और अन्य प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई के बाद किसानों को बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता होती है। ऐसे में समय पर पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत आने वाले महीनों में कम कीमत पर यूरिया खरीदने में सफल रहता है, तो इसका सीधा लाभ सरकारी वित्त पर पड़ेगा। वर्तमान में केंद्र सरकार किसानों को भारी सब्सिडी पर यूरिया उपलब्ध कराती है। किसान निर्धारित नियंत्रित मूल्य पर यूरिया खरीदते हैं, जबकि वास्तविक लागत का बड़ा हिस्सा सरकार वहन करती है।
इसी वजह से जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार का सब्सिडी बोझ भी तेजी से बढ़ जाता है। अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी का खर्च बजट में निर्धारित 1.77 लाख करोड़ रुपये के स्तर से अधिक जा सकता है। ऐसे में सस्ता आयात सरकार के लिए राहत लेकर आ सकता है।
पश्चिम एशिया संकट का असर केवल आयात कीमतों तक सीमित नहीं रहा। इस दौरान तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति भी प्रभावित हुई थी, जो घरेलू यूरिया उत्पादन का एक प्रमुख कच्चा माल है। गैस आपूर्ति में रुकावट के कारण मार्च महीने में कुछ उत्पादन इकाइयों पर दबाव बढ़ा था। यह समय खरीफ सीजन की तैयारियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि सरकार ने स्थिति की समीक्षा करते हुए उर्वरकों की मांग का पुनर्मूल्यांकन किया है। खरीफ 2026 के लिए यूरिया की अनुमानित आवश्यकता को 19.4 मिलियन टन से घटाकर 19 मिलियन टन किया गया है। इसी प्रकार डीएपी की आवश्यकता भी 6.6 मिलियन टन से घटाकर 6 मिलियन टन निर्धारित की गई है।
कृषि मंत्रालय भी उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय हो गया है। जून से देशभर में एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जिसके तहत किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से बचने और जैविक तथा वैकल्पिक पोषक स्रोतों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई अवसरों पर किसानों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की अपील कर चुके हैं। उनका कहना है कि मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाए रखने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए उर्वरकों का संतुलित उपयोग आवश्यक है।
कुल मिलाकर, वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में आई गिरावट भारत के लिए सकारात्मक संकेत है। यदि यह रुझान जारी रहता है तो सरकार का सब्सिडी बोझ कम हो सकता है, किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध हो सकते हैं और खरीफ सीजन की तैयारियां भी अधिक सुचारु रूप से पूरी की जा सकेंगी। ऐसे समय में जब दुनिया भर में उर्वरक बाजार अनिश्चितताओं से जूझ रहा है, भारत के लिए यह राहत की खबर मानी जा रही है।

