भारत ने अपनी ऊर्जा परिवर्तन यात्रा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। अब देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत हिस्सा गैर-जीवाश्म (नॉन-फॉसिल फ्यूल) स्रोतों से आता है और यह लक्ष्य पांच साल पहले ही हासिल कर लिया गया है। यह सफलता भारत के जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्ध रुख और सतत विकास की दिशा में मजबूत कदम को दर्शाती है।
केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री प्रल्हाद जोशी ने इस अवसर पर कहा, “जब पूरी दुनिया जलवायु समाधान तलाश रही है, भारत राह दिखा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की हरित क्रांति तेज़ी से आगे बढ़ रही है। यह उपलब्धि हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण है।”
नीतिगत पहलों और योजनाओं ने दिखाई दिशा
इस मील के पत्थर के पीछे भारत सरकार की दूरदर्शी योजनाएं और दृढ़ कार्यान्वयन की अहम भूमिका रही। प्रमुख योजनाओं में प्रधानमंत्री कुसुम योजना (PM-KUSUM), प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना, सोलर पार्क विकास, और राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति शामिल हैं।
पीएम-कुसुम योजना ने लाखों किसानों को सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंप देकर ऊर्जा सुरक्षा और सतत कृषि की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। वहीं प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना, जो 2024 में शुरू हुई, ने एक रूफटॉप क्रांति ला दी है, जिससे एक करोड़ परिवारों को घरेलू सौर ऊर्जा के जरिए आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है।
हरित ऊर्जा विस्तार और समावेशी लाभ
देशभर में सोलर पार्क्स ने सस्ती दरों पर बिजली उत्पादन संभव बनाया है, वहीं गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में पवन ऊर्जा ने शाम की पीक डिमांड को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाई है। बायो-एनर्जी क्षेत्र, जो कभी हाशिये पर था, अब गांवों में रोजगार और सर्कुलर इकोनॉमी का महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया है।
इस ऊर्जा क्रांति ने सिर्फ उत्सर्जन में कमी नहीं लाई, बल्कि बिजली पहुंच, स्वास्थ्य, रोजगार, और ग्रामीण आय जैसे क्षेत्रों में भी कई सकारात्मक प्रभाव डाले हैं। भारत की हरित ऊर्जा यात्रा समावेशी विकास और सामाजिक न्याय का उदाहरण बन चुकी है।
वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका और नेतृत्व
भारत ने यह उपलब्धि उस समय हासिल की है जब वह G20 और COP जैसे वैश्विक मंचों पर जलवायु न्याय, टिकाऊ जीवनशैली और कम-कार्बन विकास के लिए जोरदार पैरवी कर रहा है। भारत आज उन कुछ G20 देशों में से एक है जो अपने पेरिस समझौते के लक्ष्यों (NDCs) को न केवल पूरा कर रहे हैं, बल्कि उससे आगे बढ़कर काम कर रहे हैं।
भविष्य की दिशा: डिजिटल, समावेशी और लचीला ऊर्जा तंत्र
अब जब भारत ने यह लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया है, तो अगला चरण और अधिक गुणवत्ता, समानता और लचीलापन लेकर आना होगा। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में क्लीन एनर्जी की पहुंच, ऊर्जा-कुशल उपकरणों का प्रचार, और वितरित नवीकरणीय प्रणालियों को बढ़ावा देना शामिल होगा।
इसके साथ ही, बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पंप हाइड्रो स्टोरेज के प्रसार से 24×7 बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही, सौर पैनल, पवन टर्बाइन और बैटरियों के सतत पुनर्चक्रण को भी बढ़ावा देना जरूरी होगा।
प्रौद्योगिकी: हरित भविष्य की रीढ़
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) भारत के ऊर्जा बुनियादी ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है। AI के माध्यम से डिमांड पूर्वानुमान, पूर्व-रखरखाव, स्वचालित ग्रिड प्रबंधन, और ऊर्जा दक्षता में जबरदस्त सुधार आएगा। इससे उपभोक्ता भी प्रोड्यूसर और कंज्यूमर (Prosumers) की भूमिका में आएंगे।
हालांकि, इसके साथ साइबर सुरक्षा की भी चुनौतियां हैं, जिन्हें प्राथमिकता देना आवश्यक है ताकि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित रखा जा सके।
नया युग, नया संकल्प
भारत का यह मील का पत्थर दर्शाता है कि विकास और डिकार्बोनाइजेशन विरोधाभासी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को सशक्त करने वाले लक्ष्य हैं। अब भारत का अगला लक्ष्य है 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन। भारत ने हरित ऊर्जा का दीप जला दिया है अब समय है उसे और अधिक तेज़ी से जलाने का, देश और दुनिया के उज्ज्वल भविष्य के लिए।

