“अंत्योदय का संकल्प, अमृत काल का प्रतिबिंब – विकसित भारत @2047” थीम पर आयोजित राष्ट्रीय चिंतन शिविर के दूसरे दिन केंद्र और राज्यों के बीच गहन मंथन के साथ सामाजिक न्याय के क्षेत्र में ठोस कदम उठाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिली। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आयोजित इस तीन दिवसीय शिविर का फोकस ‘विजन से एक्शन’ की ओर बढ़ते हुए योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर रहा।
दूसरे दिन की शुरुआत केंद्रीय राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा के नेतृत्व में आयोजित योग सत्र से हुई, जिसमें विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस पहल ने न केवल स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश दिया, बल्कि सामाजिक न्याय सेवाओं के प्रति समग्र दृष्टिकोण को भी रेखांकित किया।
दिनभर चली चर्चाओं में सामुदायिक भागीदारी और सार्वजनिक-निजी-जन भागीदारी (PPPP) मॉडल को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों और अधिकारियों ने इस बात पर विचार किया कि कैसे नागरिक समाज, निजी क्षेत्र और स्थानीय समुदाय मिलकर छात्रवृत्ति, नशामुक्ति, वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और दिव्यांगजनों के पुनर्वास जैसे क्षेत्रों में सरकारी प्रयासों को और प्रभावी बना सकते हैं।
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने सत्रों में भाग लेते हुए कहा कि ‘विकसित भारत @2047’ का लक्ष्य तभी साकार होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ सम्मानपूर्वक और समयबद्ध तरीके से पहुंचे। उन्होंने ‘कल्याण से सशक्तिकरण’ की ओर बढ़ने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि नीतियों को जमीनी स्तर पर उपयोगकर्ता के अनुकूल बनाना आवश्यक है।
शिविर में प्रतिभागियों को पांच विषय-आधारित समूहों में विभाजित किया गया, जिन्होंने विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। पहला समूह छात्रवृत्ति वितरण और शैक्षिक पहुंच को मजबूत करने पर केंद्रित रहा, जिसमें समयबद्ध भुगतान, पारदर्शिता और शिकायत निवारण सुधार पर जोर दिया गया।
दूसरे समूह ने ‘नशामुक्त भारत’ के तहत नशा मुक्ति और पुनर्वास व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर विचार किया। इसमें डिजिटल निगरानी, उपचार सुविधाओं का विस्तार और विभागीय समन्वय बढ़ाने जैसे उपायों पर चर्चा हुई। तीसरे समूह ने ‘श्रम की गरिमा’ विषय पर काम करते हुए मैनुअल सफाई के स्थान पर मशीन आधारित व्यवस्था अपनाने और स्वच्छता कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर बल दिया।
चौथे समूह की चर्चा ‘सम्मानजनक वृद्धावस्था’ पर केंद्रित रही, जिसमें वरिष्ठ नागरिकों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी संरक्षण की आवश्यकता पर विचार किया गया। वहीं, पांचवें समूह ने दिव्यांग बच्चों की प्रारंभिक पहचान और सहायता पर जोर देते हुए सामुदायिक स्तर पर सेवाओं के एकीकरण की जरूरत बताई।
चर्चाओं के दौरान राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने अनुभव साझा किए और कई नवाचारों को प्रस्तुत किया। इनमें छात्रवृत्ति वितरण की डिजिटल प्रणालियां, एकीकृत नशामुक्ति प्लेटफॉर्म और वरिष्ठ नागरिकों के लिए देखभाल मॉडल शामिल रहे। इन अनुभवों के आधार पर ठोस और समयबद्ध कार्ययोजनाएं तैयार करने पर सहमति बनी।
दिन के अंत में श्री बी.एल. वर्मा ने इन चर्चाओं को “सार्थक और व्यावहारिक” बताते हुए कहा कि यह शिविर केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करने का सामूहिक प्रयास है। उन्होंने विश्वास जताया कि यहां से निकले सुझाव केंद्र और राज्यों को नीतियों को जमीनी स्तर पर लागू करने में मदद करेंगे।
शिविर के तीसरे दिन इन सुझावों को और परिष्कृत किया जाएगा और आत्मनिर्भरता, समावेशन तथा दिव्यांगजनों की सुलभता जैसे विषयों पर आगे की रणनीति तय की जाएगी। यह पहल वर्ष 2047 तक एक समावेशी और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
