Indian Sugar Market : भारत के चीनी निर्यात की कहानी इस सीजन में उम्मीद से अलग नजर आ रही है। सरकार ने 2025–26 सीजन के लिए 20 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी, लेकिन इसके बावजूद निर्यात की रफ्तार काफी धीमी रही है। फरवरी 2026 के अंत तक भारत सिर्फ करीब 3.15 लाख टन चीनी ही निर्यात कर पाया, जो तय सीमा का बहुत छोटा हिस्सा है।
दिलचस्प बात यह है कि इस बार उद्योग ने खुद अधिक निर्यात कोटा की मांग की थी। मिलें विदेशी बाजार में ज्यादा चीनी बेचने के लिए उत्सुक थीं, लेकिन वैश्विक बाजार की परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहीं। अंतरराष्ट्रीय कीमतें भारत के घरेलू दामों के मुकाबले कम होने के कारण भारतीय चीनी की प्रतिस्पर्धा घट गई। इसके अलावा, अतिरिक्त कोटा को मिलों के बीच अदला-बदली न कर पाने की शर्त ने भी निर्यात की गति को प्रभावित किया।
सरकार ने नवंबर 2025 में पहले 15 लाख टन निर्यात की अनुमति दी थी, जिसे फरवरी 2026 में बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया गया। यह पिछले सीजन के 10 लाख टन के मुकाबले दोगुना है। हालांकि, इसके बावजूद निर्यात उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ पाया।
निर्यात के आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक सबसे ज्यादा करीब 2.58 लाख टन सफेद चीनी भेजी गई है। इसके बाद लगभग 53,664 टन रिफाइंड चीनी और सिर्फ 1,620 टन कच्ची चीनी का निर्यात हुआ है। इसके अलावा कुछ हजार टन चीनी अभी लोडिंग या शिपमेंट के इंतजार में है।
जहां तक निर्यात के गंतव्यों की बात है, भारत की चीनी मुख्य रूप से आसपास के देशों और पश्चिम एशिया में गई है। संयुक्त अरब अमीरात सबसे बड़ा आयातक रहा है, जिसने कुल निर्यात का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा खरीदा। इसके बाद अफगानिस्तान और जिबूती का स्थान रहा।
इसी बीच घरेलू स्तर पर चीनी उत्पादन को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। नए अनुमानों के मुताबिक 2025–26 सीजन में भारत का कुल उत्पादन घटकर करीब 290 लाख टन रह सकता है, जो पहले के अनुमान से लगभग 26 लाख टन कम है। शुरुआत में उद्योग ने कुल उत्पादन 349 लाख टन और एथेनॉल में डायवर्जन के बाद शुद्ध उत्पादन करीब 316 लाख टन रहने का अनुमान लगाया था।
सबसे ज्यादा असर प्रमुख उत्पादक राज्यों में देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है, वहां उत्पादन करीब 95 लाख टन रहने की उम्मीद है, जो पहले के 110 लाख टन के अनुमान से काफी कम है। वहीं महाराष्ट्र में गन्ने की कम उत्पादकता और जल्दी फूल आने जैसी समस्याओं ने भी उत्पादन को प्रभावित किया है।
ऐसे में एक तरफ जहां कमजोर वैश्विक कीमतों के कारण निर्यात धीमा है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन में गिरावट ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। कुल मिलाकर, इस सीजन में भारत का चीनी उद्योग कई चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

