पंजाब और हरियाणा की तरह अब मध्य प्रदेश में भी पराली जलाने की समस्या तेजी से गंभीर होती जा रही है। रायसेन जिले समेत प्रदेश के कई हिस्सों में पराली जलाने की बढ़ती घटनाएं पर्यावरण और कृषि दोनों के लिए चुनौती बन रही हैं। इससे न केवल वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी घट रही है और लोगों के स्वास्थ्य पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है।
इसी समस्या के समाधान के रूप में “जीरो टिलेज और मल्च आधारित आलू उत्पादन तकनीक (PZTM)” किसानों के लिए एक कारगर और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है। यह तकनीक किसानों को पराली जलाने के बजाय उसका उपयोग खेत में ही मल्च के रूप में करने के लिए प्रेरित करती है, जिससे कई तरह के फायदे मिलते हैं।
कैसे काम करती है PZTM तकनीक
इस तकनीक को International Potato Center के तहत संचालित CIP-साउथ एशिया रीजनल सेंटर बढ़ावा दे रहा है। संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अंशुल शर्मा के अनुसार, PZTM तकनीक में किसान धान की पराली को खेत में बिछाकर उसी में आलू की खेती करते हैं। इससे मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे सिंचाई की जरूरत कम हो जाती है। साथ ही पराली की परत खरपतवार को उगने से रोकती है और धीरे-धीरे सड़कर मिट्टी को पोषक तत्व भी प्रदान करती है।
कृषि महोत्सव में दिखा किसानों का उत्साह
रायसेन में आयोजित उन्नत कृषि महोत्सव-2026 में इस तकनीक को लेकर किसानों में खासा उत्साह देखने को मिला। तीन दिनों तक चले इस आयोजन में बड़ी संख्या में किसान CIP-CSARC के स्टॉल पर पहुंचे और PZTM तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी ली। कई किसानों ने इसे अपनाने में रुचि भी दिखाई।
उन्नत किस्मों ने भी खींचा ध्यान
महोत्सव में प्रदर्शित आलू की उन्नत किस्मों ने भी किसानों का ध्यान आकर्षित किया। खासतौर पर ‘कुफरी उदय’ किस्म चर्चा का केंद्र रही। यह लाल छिलके वाली, जल्दी तैयार होने वाली और पोषक तत्वों से भरपूर किस्म है, जो बाजार में अच्छी कीमत दिलाने की क्षमता रखती है।
मंत्री ने भी सराहा नवाचार
कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के उद्यानिकी मंत्री नारायण सिंह कुशवाह ने भी CIP-साउथ एशिया रीजनल सेंटर के स्टॉल का दौरा किया और इस तकनीक में गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने इसे पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया।
किसानों के लिए वरदान साबित हो रही तकनीक
PZTM तकनीक न केवल पराली जलाने की समस्या का समाधान देती है, बल्कि कम लागत में अधिक उत्पादन का रास्ता भी खोलती है। इससे किसानों की आय में बढ़ोतरी हो रही है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचता। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो यह प्रदेश में सतत कृषि की दिशा में एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
कुल मिलाकर, रायसेन से शुरू हुई यह पहल अब किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनती नजर आ रही है, जो खेती को लाभकारी और पर्यावरण को सुरक्षित बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

