लखनऊ में आयोजित उत्तर क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन के दौरान केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देश की कृषि नीति को लेकर व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने स्पष्ट किया कि अब कृषि विकास “एक जैसी नीति” से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय जरूरतों, जलवायु, जल उपलब्धता और स्थानीय फसली परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाएगा। इस सम्मेलन को उत्तर भारत की खेती-किसानी के लिए नई दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि देश को पांच हिस्सों में विभाजित कर क्षेत्रीय कृषि सम्मेलनों की श्रृंखला शुरू की गई है, जिसमें लखनऊ में आयोजित यह दूसरा सम्मेलन है। इसका उद्देश्य राज्यों के साथ मिलकर खरीफ और रबी फसलों की रणनीति तैयार करना और उन समस्याओं पर चर्चा करना है जिनका सीधा असर किसानों की आय और उत्पादन पर पड़ता है।
श्री चौहान ने कहा कि भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। गेहूं और धान उत्पादन में वृद्धि के साथ देश वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति में पहुंचा है, यहां तक कि 50 लाख मीट्रिक टन गेहूं निर्यात की अनुमति भी दी गई है। लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता अभी भी बड़ी चुनौती है। सरकार का लक्ष्य खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ किसानों की आय बढ़ाना और देशवासियों को पोषणयुक्त आहार उपलब्ध कराना है।
कृषि विकास के लिए सरकार ने छह प्रमुख आधार तय किए हैं—उत्पादन बढ़ाना, लागत कम करना, किसानों को उचित मूल्य दिलाना, नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करना, कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देना और बाजार से बेहतर जुड़ाव स्थापित करना। उन्होंने कहा कि केवल गेहूं-धान आधारित खेती भविष्य के लिए पर्याप्त नहीं है, इसलिए बागवानी, फल-सब्जी, प्रसंस्करण और वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देना जरूरी है।
छोटे किसानों की स्थिति पर विशेष ध्यान देते हुए मंत्री ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल को समाधान बताया। उन्होंने कहा कि इंटरक्रॉपिंग, पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन और वृक्ष आधारित खेती जैसे मॉडल कम जमीन में अधिक आय देने में सहायक हो सकते हैं। केंद्र सरकार इन मॉडलों को राज्यों के साथ साझा कर रही है ताकि स्थानीय स्तर पर इन्हें लागू किया जा सके।
किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) को लेकर उन्होंने कहा कि अभी भी कई किसानों को सस्ते ऋण की पहुंच नहीं है। सरकार विशेष अभियान चलाकर हर पात्र किसान तक KCC पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इससे किसान बेहतर बीज, उर्वरक और तकनीक का उपयोग कर सकेंगे।
फार्मर आईडी को कृषि क्षेत्र में बड़ा सुधार बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे किसानों की जमीन, पशुधन और अन्य जानकारी एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी। इससे योजनाओं का लाभ पारदर्शी और तेजी से मिलेगा। उन्होंने बताया कि करोड़ों किसानों की फार्मर आईडी पहले ही बनाई जा चुकी है।
‘लैब टू लैंड’ पहल के तहत वैज्ञानिकों को गांवों तक पहुंचाने की योजना भी साझा की गई। इसके जरिए किसानों को नई तकनीक, बेहतर बीज और वैज्ञानिक खेती के तरीकों की जानकारी दी जाएगी, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा।
उत्तर प्रदेश के संदर्भ में मंत्री ने बताया कि आलू किसानों को राहत देने के लिए 20 लाख मीट्रिक टन आलू की खरीद को मंजूरी दी गई है। साथ ही राज्य में एक अंतरराष्ट्रीय प्रोसेसिंग सेंटर स्थापित करने की योजना है, जिससे किसानों को बेहतर बाजार और मूल्य मिलेगा।
उर्वरक कीमतों पर उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय महंगाई का बोझ किसानों पर नहीं पड़ने दिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में सरकार ने 41,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी स्वीकृत की है, जिससे यूरिया और डीएपी सस्ती दरों पर उपलब्ध रहेंगे।
मंत्री ने नकली बीज और कीटनाशकों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि सरकार सीड एक्ट और पेस्टिसाइड एक्ट में कड़े प्रावधान लाने की तैयारी कर रही है, ताकि किसानों को धोखा देने वालों पर सख्त कार्रवाई हो सके।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हुए उन्होंने बताया कि सरकार किसानों को संक्रमण काल में आर्थिक सहायता दे रही है। उनका मानना है कि यह न केवल मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है बल्कि मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
इस सम्मेलन को उत्तर भारत की कृषि के लिए नीतिगत और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर अहम माना जा रहा है। इससे निकलने वाले सुझाव आने वाले समय में खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और किसानोन्मुख बनाने की दिशा तय करेंगे।

