प्लास्टिक प्रदूषण आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक बन चुका है। पारंपरिक पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक पूरी तरह नष्ट नहीं होते, बल्कि धीरे-धीरे छोटे कणों यानी माइक्रोप्लास्टिक्स में बदलकर मिट्टी और पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं। इसी बीच भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन प्लास्टिक और पेट्रोकेमिकल्स क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने वाली एक प्रमुख सरकारी संस्था द्वारा किए गए नए वैज्ञानिक अध्ययन ने राहत भरी जानकारी दी है।
अध्ययन में पाया गया कि पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA) आधारित माइक्रोप्लास्टिक्स भारतीय मिट्टी में प्राकृतिक रूप से सुरक्षित तरीके से टूटकर समाप्त हो जाते हैं और हानिकारक अवशेष नहीं छोड़ते। यह शोध पारंपरिक प्लास्टिक की तुलना में PLA को अधिक पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है।
शोध के अनुसार भारतीय मिट्टी में 30, 60, 90, 120 और 180 दिनों तक PLA माइक्रोप्लास्टिक्स के व्यवहार का परीक्षण किया गया। परिणामों में पाया गया कि 180 दिनों के भीतर माइक्रोप्लास्टिक कणों की संख्या 287 पार्टिकल प्रति किलोग्राम से घटकर केवल 18 पार्टिकल प्रति किलोग्राम रह गई। यह प्राकृतिक परिस्थितियों में लगभग पूर्ण जैविक विघटन (Biodegradation) को दर्शाता है।
वहीं दूसरी ओर पारंपरिक फॉसिल-आधारित प्लास्टिक में छह महीने बाद भी माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा में लगभग कोई कमी नहीं देखी गई। इससे स्पष्ट हुआ कि सामान्य प्लास्टिक मिट्टी में लंबे समय तक बने रहते हैं और पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंचाते हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि PLA के विघटन के बाद मिट्टी में भारी धातुओं (Heavy Metals) का स्तर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के भीतर रहा, जिससे यह कृषि और मिट्टी के लिए सुरक्षित माना गया। शोध के दौरान केंचुओं पर भी परीक्षण किया गया, जिसमें पाया गया कि केंचुओं ने PLA को जैविक रूप से संसाधित किया और उनकी सामान्य जैविक गतिविधियां प्रभावित नहीं हुईं। इसके विपरीत पारंपरिक प्लास्टिक मिट्टी के जीवों के लिए हानिकारक साबित हुए।
Central Institute of Petrochemicals Engineering & Technology के पूर्व महानिदेशक एस. के. नायक ने अध्ययन के वैज्ञानिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पारंपरिक प्लास्टिक पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं, जबकि PLA सूर्य के प्रकाश और मिट्टी की परिस्थितियों में तेजी से टूटता है और 180 दिनों के भीतर साधारण जैव-अनुकूल यौगिकों में परिवर्तित हो जाता है। उन्होंने कहा कि यह अध्ययन वैज्ञानिक रूप से साबित करता है कि PLA दीर्घकालिक माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का कारण नहीं बनता और टिकाऊ विकल्प के रूप में उपयोगी है।
Indian Compostable Polymer Association के अध्यक्ष विक्रम भानुशाली ने कहा कि यह अध्ययन भारत में प्रमाणित कंपोस्टेबल सामग्री के महत्व को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि PLA आधारित सामग्री ऐसे उपयोगों के लिए महत्वपूर्ण समाधान साबित हो सकती है, जहां प्लास्टिक कचरे को सुरक्षित रूप से प्रकृति में वापस लौटाना आवश्यक है। उनके अनुसार यह अध्ययन भारत की पर्यावरण और सर्कुलर इकोनॉमी नीतियों को मजबूत करने के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
Balrampur Chini Mills Limited की कार्यकारी निदेशक अवंतिका सराओगी ने कहा कि यह शोध भारतीय बायोप्लास्टिक उद्योग के लिए मील का पत्थर है। उन्होंने कहा कि अब यह केवल धारणा नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रमाण है कि PLA जैसे पदार्थ बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए प्रकृति में वापस समाहित हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि भारत में जल्द ही सख्त पर्यावरणीय नियम लागू होने की संभावना है, ऐसे में जैव-अवक्रमणीय (Biodegradable) उत्पादों का महत्व और बढ़ जाएगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि PLA के वास्तविक परिस्थितियों में सूर्य के प्रकाश और मिट्टी के संपर्क में आने पर उसके विघटन का अध्ययन किया गया। परीक्षणों ने पुष्टि की कि PLA वास्तव में जैविक रूप से विघटित होता है, जबकि पारंपरिक प्लास्टिक लंबे समय तक प्रदूषण फैलाते रहते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि कृषि और प्राकृतिक वातावरण में दीर्घकालिक प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए PLA एक व्यावहारिक और सुरक्षित समाधान हो सकता है।
CIPET Official Website के अनुसार, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी देश में प्लास्टिक इंजीनियरिंग, कौशल विकास, तकनीकी सहायता और अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी संस्था है, जो टिकाऊ और नवाचार आधारित समाधानों पर विशेष ध्यान दे रही है।

