तेजी से बढ़ती रासायनिक उर्वरकों की खपत और मिट्टी की गिरती गुणवत्ता के बीच किसानों को टिकाऊ एवं वैज्ञानिक खेती की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से ICAR-Central Research Institute for Dryland Agriculture (भाकृअनुप-केन्द्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान) ने तेलंगाना के संगारेड्डी जिले में “उर्वरकों का संतुलित उपयोग” विषय पर एक विशेष किसान गोष्ठी का आयोजन किया। यह कार्यक्रम “मेरा गाँव मेरा गौरव” अभियान के अंतर्गत आयोजित किया गया, जिसमें किसानों को वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और सतत कृषि पद्धतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
यह गोष्ठी कोंडापुर मंडल के हरिदासपुर गांव में आयोजित की गई, जहां बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लेकर कृषि वैज्ञानिकों से सीधे संवाद किया। कार्यक्रम का आयोजन Professor Jayashankar Telangana State Agricultural University के सहयोग से किया गया। इस दौरान वैज्ञानिकों की टीम ने किसानों को बताया कि केवल अधिक मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करने से उत्पादन बढ़ाना संभव नहीं है, बल्कि इससे मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए खेती में संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने किसानों को समझाया कि मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करने से लागत कम होती है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। वैज्ञानिकों ने कहा कि कई किसान बिना मिट्टी की जांच कराए अत्यधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते हैं, जिससे मिट्टी की संरचना खराब हो जाती है और लंबे समय में उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। इस समस्या के समाधान के लिए किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड का उपयोग करने और उसी के अनुसार पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने की सलाह दी गई।
गोष्ठी के दौरान समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) की अवधारणा पर विशेष जोर दिया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि जैविक खाद, हरी खाद, फसल अवशेषों के पुनर्चक्रण और सीमित रासायनिक उर्वरकों के संयोजन से खेती अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाई जा सकती है। किसानों को यह भी बताया गया कि रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी पैदा कर सकती है, जिससे भविष्य में फसलों की उत्पादकता प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों ने किसानों को फसल विविधीकरण और फसल चक्र अपनाने के लाभ भी समझाए। उन्होंने बताया कि लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी की गुणवत्ता पर असर पड़ता है, जबकि फसल चक्र अपनाने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है। किसानों को दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने की सलाह दी गई, क्योंकि ये फसलें मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ाने में मदद करती हैं।
कार्यक्रम में जल संरक्षण और जल संचयन तकनीकों पर भी चर्चा हुई। वैज्ञानिकों ने कहा कि शुष्क भूमि क्षेत्रों में खेती को टिकाऊ बनाने के लिए वर्षा जल संचयन और माइक्रो इरिगेशन जैसी तकनीकों को अपनाना जरूरी है। उन्होंने किसानों को कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली कृषि पद्धतियों की जानकारी भी दी।
गोष्ठी के दौरान किसानों ने उर्वरकों की बढ़ती कीमत, मिट्टी की घटती उर्वरता और उत्पादन लागत से जुड़ी समस्याओं को वैज्ञानिकों के सामने रखा। विशेषज्ञों ने किसानों के सवालों का समाधान करते हुए उन्हें स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उर्वरकों के उपयोग की वैज्ञानिक सलाह दी। किसानों को जैविक आदानों के उपयोग और प्राकृतिक खेती की ओर धीरे-धीरे बढ़ने के लिए भी प्रेरित किया गया।
इस कार्यक्रम में स्थानीय कृषि अधिकारियों और अन्य हितधारकों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। कुल 42 किसानों ने इस किसान गोष्ठी में भाग लेकर तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त किया। किसानों ने कार्यक्रम को बेहद उपयोगी बताते हुए कहा कि इस प्रकार की गोष्ठियां उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक खेती अपनाने में मदद करती हैं।
कार्यक्रम के बाद भाकृअनुप-सीआरआईडीए की टीम ने संगारेड्डी के जिला कलेक्टर से मुलाकात कर इस पहल के उद्देश्यों और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की। टीम ने बताया कि जिले के अन्य गांवों में भी इसी प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे ताकि अत्यधिक उर्वरक उपयोग की समस्या को कम किया जा सके और किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों से जोड़ा जा सके।
जिला कलेक्टर ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि किसानों को वैज्ञानिक खेती के प्रति जागरूक करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने जिला प्रशासन की ओर से ऐसे कार्यक्रमों को पूरा सहयोग देने का आश्वासन भी दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि खेती में संतुलित उर्वरक उपयोग केवल उत्पादन बढ़ाने का माध्यम नहीं बल्कि मिट्टी, जल और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। भाकृअनुप-सीआरआईडीए और उसके सहयोगी संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे ऐसे कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ और संसाधन-कुशल कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आने वाले समय में यदि किसान वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन और जैविक उपायों को अपनाते हैं तो इससे खेती अधिक लाभकारी, पर्यावरण अनुकूल और दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बन सकेगी।

