देश में सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को सशक्त बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती देने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (पीएमएफएमई) अब ग्रामीण उद्यमिता की नई पहचान बनती जा रही है। Ministry of Food Processing Industries के संयुक्त सचिव देवेश देवल ने नई दिल्ली स्थित पंचशील भवन में आयोजित मीडिया संवाद के दौरान योजना की उपलब्धियों, प्रभाव और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पीएमएफएमई योजना न केवल सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ रही है, बल्कि महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत शुरू हुई थी योजना
केंद्र सरकार ने वर्ष 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत पीएमएफएमई योजना की शुरुआत की थी। योजना का उद्देश्य देश के असंगठित सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान करना था। भारत में लगभग 25 लाख सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां हैं, जिनमें से अधिकांश अपंजीकृत और असंगठित क्षेत्र में कार्य करती हैं। इन इकाइयों को पहले वित्तीय सहायता, आधुनिक तकनीक, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, गुणवत्ता मानकों और बाजार तक पहुंच जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता था।
सरकार ने महसूस किया कि यदि इन छोटे उद्यमों को उचित समर्थन मिले, तो वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं। इसी सोच के साथ केंद्र प्रायोजित पीएमएफएमई योजना को लागू किया गया। इस योजना को वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक 10,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई थी, जिसे अब सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया गया है।
‘एक जिला एक उत्पाद’ मॉडल बना योजना की ताकत
पीएमएफएमई योजना की सबसे बड़ी विशेषता इसका “वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट” यानी “एक जिला एक उत्पाद” दृष्टिकोण है। इस मॉडल के तहत प्रत्येक जिले की पारंपरिक और विशेष खाद्य उत्पाद पहचान को बढ़ावा दिया जाता है। योजना के अंतर्गत अब तक 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 726 जिलों में 137 विशिष्ट उत्पादों की पहचान की जा चुकी है।
इस पहल से स्थानीय उत्पादों को नई बाजार पहचान मिल रही है। मखाना, बाजरा उत्पाद, मसाले, अचार, डेयरी उत्पाद, बेकरी आइटम और जीआई टैग वाले उत्पादों को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इससे स्थानीय किसानों, महिला समूहों और छोटे उद्यमियों को अपने पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने में मदद मिल रही है।
सूक्ष्म उद्यमों को मिल रही वित्तीय सहायता
योजना के तहत सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। व्यक्तिगत सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को इकाई स्थापना या उन्नयन के लिए 35 प्रतिशत तक ऋण सब्सिडी दी जाती है, जिसकी अधिकतम सीमा 10 लाख रुपये है।
इसके अलावा किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), किसान उत्पादक कंपनियां (एफपीसी), स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) और सहकारी समितियों को साझा अवसंरचना विकसित करने के लिए 35 प्रतिशत तक ऋण सब्सिडी प्रदान की जाती है, जिसकी सीमा 3 करोड़ रुपये तक है।
खाद्य प्रसंस्करण गतिविधियों से जुड़े स्वयं सहायता समूहों के प्रत्येक सदस्य को 40 हजार रुपये तक की बीज पूंजी भी उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि वे छोटे स्तर पर अपना व्यवसाय शुरू कर सकें।
लाखों उद्यमियों को मिला योजना का लाभ
मंत्रालय के अनुसार अब तक योजना के तहत 1,96,270 व्यक्तिगत सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को सहायता प्रदान की जा चुकी है। इनमें 40 प्रतिशत से अधिक लाभार्थी महिला उद्यमी हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि योजना महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में प्रभावी भूमिका निभा रही है।
इसके अतिरिक्त 4 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह सदस्यों को बीज पूंजी सहायता स्वीकृत की गई है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की संख्या तेजी से बढ़ी है और स्थानीय रोजगार के अवसर भी मजबूत हुए हैं।
क्षमता विकास और प्रशिक्षण पर विशेष जोर
पीएमएफएमई योजना के तहत केवल वित्तीय सहायता ही नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और क्षमता विकास पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। योजना के अंतर्गत 1,72,870 लाभार्थियों और हितधारकों को प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़ा गया है।
इन प्रशिक्षणों में उद्यमिता विकास, खाद्य सुरक्षा मानक, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, गुणवत्ता नियंत्रण, डिजिटल मार्केटिंग और व्यवसाय प्रबंधन जैसे विषय शामिल हैं। सरकार का मानना है कि केवल वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं है, बल्कि उद्यमियों को बाजार के अनुरूप कौशल और तकनीकी ज्ञान भी दिया जाना जरूरी है।
इनक्यूबेशन केंद्रों से बढ़ रहा नवाचार
योजना के अंतर्गत अब तक 80 इनक्यूबेशन केंद्रों को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 31 केंद्र कार्यरत हो चुके हैं। ये केंद्र स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण, परीक्षण, प्रशिक्षण और उद्यमिता विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इन केंद्रों के माध्यम से उद्यमियों को आधुनिक मशीनरी, तकनीकी सहायता और उत्पाद विकास संबंधी जानकारी मिल रही है। इससे छोटे उद्यमी भी बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार कर पा रहे हैं और बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बन रहे हैं।
ब्रांडिंग और मार्केटिंग से बढ़ी बाजार पहुंच
सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाजार तक पहुंच की होती है। इसे ध्यान में रखते हुए योजना में ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता का प्रावधान किया गया है।
अब तक 32 प्रस्तावों और 40 ओडीओपी ब्रांडों को स्वीकृति दी जा चुकी है। इनके माध्यम से 200 से अधिक खाद्य उत्पाद बाजार में उतारे गए हैं। कुल 1,164 सूक्ष्म उद्यमों को ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता का प्रत्यक्ष लाभ मिला है।
सरकार ट्रेडमार्क पंजीकरण, पैकेजिंग डिजाइन, उत्पाद मानकीकरण, ई-कॉमर्स और व्यापार संवर्धन में भी सहायता प्रदान कर रही है। इससे छोटे उद्यमियों को बड़े बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिल रहा है।
जैम पोर्टल से जुड़ रहे उद्यमी
Government e-Marketplace (जैम पोर्टल) के साथ मंत्रालय द्वारा समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसका उद्देश्य पीएमएफएमई समर्थित उद्यमों को डिजिटल बाजार से जोड़ना है।
इस पहल के माध्यम से छोटे उद्यमी सरकारी खरीद प्रणाली और ऑनलाइन बाजार का हिस्सा बन पा रहे हैं। इससे उनके उत्पादों की पहुंच बढ़ रही है और बिक्री के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
महिला उद्यमियों को मिल रही नई पहचान
पीएमएफएमई योजना महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अब छोटे स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित कर रही हैं।
अचार, पापड़, मसाले, मिलेट उत्पाद, बेकरी आइटम और पारंपरिक खाद्य उत्पादों के निर्माण में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की आय बढ़ने के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता भी मजबूत हुई है।
रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती
मंत्रालय के अनुसार योजना के माध्यम से खाद्य प्रसंस्करण मूल्य श्रृंखला में लगभग 5,88,810 लोगों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर पैदा हुए हैं।
स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन अवसंरचना विकसित होने से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल रहा है। साथ ही फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान में भी कमी आई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गांव स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मजबूत होता है, तो किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण पलायन रोकने में बड़ी मदद मिल सकती है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिल रही पहचान
पीएमएफएमई लाभार्थियों ने World Food India 2025, AAHAR और SIAL India जैसी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेकर अपने उत्पादों का प्रदर्शन किया है।
विश्व खाद्य भारत 2025 के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा 26 हजार लाभार्थियों को 778 करोड़ रुपये की ऋण आधारित सब्सिडी जारी की गई थी। इस आयोजन में 100 से अधिक पीएमएफएमई स्टॉल लगाए गए थे और लगभग 250 उत्पाद डिजिटल डिस्प्ले के माध्यम से प्रदर्शित किए गए।
ग्रामीण भारत में उद्यमिता की नई क्रांति
संयुक्त सचिव देवेश देवल ने कहा कि पीएमएफएमई योजना भारत के सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल साबित हो रही है। यह योजना केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण भारत में उद्यमिता, आत्मनिर्भरता और रोजगार की नई क्रांति ला रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी गति से योजना का विस्तार जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में भारत का सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र ग्रामीण विकास और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


