देश में मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चलाया जा रहा ‘खेत बचाओ अभियान’ अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेता दिखाई दे रहा है। Indian Council of Agricultural Research (आईसीएआर) द्वारा संचालित इस राष्ट्रव्यापी अभियान ने अब तक 2.712 करोड़ नागरिकों तक अपनी पहुंच बनाई है, जबकि 7.17 लाख किसानों को सीधे तौर पर उर्वरकों के संतुलित उपयोग और वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन के प्रति जागरूक किया गया है।
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के अंतर्गत चलाए जा रहे इस अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करना और मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देना है। सरकार और कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मृदा स्वास्थ्य को समय रहते संरक्षित नहीं किया गया, तो भविष्य में कृषि उत्पादन, भूमि की उर्वरता और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी सोच के साथ देशभर में बड़े स्तर पर जागरूकता गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं।
अभियान के अंतर्गत अब तक कुल 12,979 जागरूकता शिविर और सेमिनार आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता, पोषक तत्वों की कमी, संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक विकल्पों तथा टिकाऊ खेती की आधुनिक तकनीकों के बारे में जानकारी दी गई। कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने किसानों को यह समझाने का प्रयास किया कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने से मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता धीरे-धीरे कम हो जाती है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है और भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
अभियान के तहत किसानों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने पर भी विशेष ध्यान दिया गया। इसके लिए देशभर में 3,145 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें 1,11,509 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग, मृदा परीक्षण तकनीक, जैव उर्वरकों के उपयोग, हरी खाद के महत्व तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित जानकारी दी गई। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरक उपयोग करने से न केवल लागत कम होती है, बल्कि उत्पादन क्षमता और फसल गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
‘खेत बचाओ अभियान’ के दौरान व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए 7,928 क्षेत्रीय प्रदर्शन भी आयोजित किए गए। इन प्रदर्शनों में किसानों को हरी खाद, जैव उर्वरक और अन्य जैविक स्रोतों के प्रयोग की तकनीक समझाई गई। खेतों में सीधे प्रदर्शन के माध्यम से किसानों को यह दिखाया गया कि प्राकृतिक और संतुलित खेती अपनाकर मिट्टी की सेहत को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देना नहीं, बल्कि उन्हें व्यवहारिक स्तर पर नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करना भी था।
अभियान में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी भी देखने को मिली। पंचायत प्रतिनिधियों, सरपंचों और जिला परिषद सदस्यों के सहयोग से 4,916 जनप्रतिनिधि सम्मेलन आयोजित किए गए। इन सम्मेलनों के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर किसानों तक अभियान का संदेश पहुंचाने की कोशिश की गई। सरकार का मानना है कि जब स्थानीय नेतृत्व किसी अभियान से जुड़ता है, तो उसका प्रभाव गांव-गांव तक अधिक तेजी से पहुंचता है।
उर्वरक डीलरों को भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भागीदार बनाया गया। संतुलित उर्वरक उपयोग के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए उर्वरक विक्रेताओं और डीलरों के साथ 9,609 संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए। कृषि विशेषज्ञों ने डीलरों को समझाया कि किसानों को केवल अधिक उर्वरक बेचने के बजाय सही और संतुलित उपयोग की जानकारी देना अधिक जरूरी है। इस पहल का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में जिम्मेदार उर्वरक वितरण प्रणाली को बढ़ावा देना भी है।
अभियान में किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और किसान समूहों (एफआईजी) की भागीदारी को भी बढ़ावा दिया गया। इसके माध्यम से 8,383 किसान सदस्यों को सीधे जोड़ा गया। इन संगठनों के जरिए किसानों तक सामूहिक रूप से जानकारी पहुंचाई गई, जिससे जागरूकता कार्यक्रमों का प्रभाव और अधिक व्यापक हुआ।
व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए देशभर में 53,616 स्थानों पर बैनर, पोस्टर और होर्डिंग्स लगाए गए। इसके साथ ही रेडियो, टेलीविजन और डिजिटल मीडिया का भी प्रभावी उपयोग किया गया। अभियान के तहत 944 रेडियो वार्ताएं और 200 टीवी एवं डिजिटल कार्यक्रम आयोजित किए गए। कुल मिलाकर 1,144 मीडिया प्रसारणों के जरिए किसानों और आम नागरिकों तक मृदा संरक्षण का संदेश पहुंचाया गया।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान दिलाई। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए अभियान का संदेश 2.712 करोड़ लोगों तक पहुंचा। सोशल मीडिया पर छोटे वीडियो, ग्राफिक्स, किसान अनुभव और जागरूकता सामग्री के माध्यम से लोगों को संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा संरक्षण के महत्व के बारे में बताया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में मृदा स्वास्थ्य कृषि क्षेत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। लगातार रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। कई क्षेत्रों में भूमि की उर्वरता कम होने, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और उत्पादन लागत बढ़ने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे में ‘खेत बचाओ अभियान’ किसानों को वैज्ञानिक खेती की दिशा में प्रेरित करने का महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
अभियान का मुख्य लक्ष्य किसानों को यह समझाना है कि मिट्टी केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि कृषि की आधारशिला है। यदि मिट्टी स्वस्थ रहेगी, तभी कृषि उत्पादन लंबे समय तक स्थिर और लाभकारी बना रहेगा। संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक स्रोतों का समावेश, हरी खाद और मृदा परीक्षण आधारित खेती को अपनाकर किसान न केवल अपनी लागत कम कर सकते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे सकते हैं।
‘खेत बचाओ अभियान’ की बढ़ती सफलता यह संकेत देती है कि देश में अब टिकाऊ और वैज्ञानिक कृषि की दिशा में जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। सरकार और कृषि वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में यह अभियान किसानों को मृदा संरक्षण और संतुलित खेती की ओर प्रेरित कर भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


