भारत में धान प्रमुख खाद्यान्न फसल मानी जाती है और देश के करोड़ों किसान इसकी खेती पर निर्भर हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बदलते मौसम, घटते भूजल स्तर और अनियमित बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। धान की खेती को परंपरागत रूप से अधिक पानी वाली फसल माना जाता है, इसलिए पानी की कमी वाले क्षेत्रों में इसकी खेती किसानों के लिए चुनौती बनती जा रही है।
हालांकि अब कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों के जरिए कम पानी में भी धान की अच्छी पैदावार लेना संभव हो गया है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसान आधुनिक खेती पद्धतियों, सही बीजों और संतुलित सिंचाई प्रबंधन को अपनाएं, तो वे कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
बदल रही है धान की खेती की तस्वीर
पहले धान की खेती में खेतों में लगातार पानी भरकर रखना जरूरी माना जाता था। लेकिन अब वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि धान की फसल को हमेशा जलभराव की जरूरत नहीं होती। पौधों को केवल पर्याप्त नमी चाहिए, जिससे उनकी जड़ें मजबूत बन सकें और पौधे बेहतर विकास कर सकें।
इसी सोच के साथ अब किसान पारंपरिक रोपाई पद्धति से हटकर नई तकनीकों की ओर बढ़ रहे हैं। इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय हो रही है धान की सीधी बुवाई यानी डीएसआर (Direct Seeded Rice) तकनीक।
धान की सीधी बुवाई तकनीक क्या है?
डीएसआर तकनीक में धान की नर्सरी तैयार करने और बाद में पौधों की रोपाई करने की आवश्यकता कम हो जाती है। किसान सीधे खेत में बीजों की बुवाई कर सकते हैं।
इस तकनीक के कारण खेत तैयार करने में कम समय लगता है और मजदूरी की आवश्यकता भी कम होती है। इसके अलावा ट्रैक्टर, डीजल और पानी का खर्च भी काफी हद तक घट जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, डीएसआर तकनीक अपनाने से लगभग 25 से 30 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है। यही कारण है कि हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के किसान तेजी से इस पद्धति को अपना रहे हैं।
लगातार पानी भरना नहीं है जरूरी
अक्सर किसानों के बीच यह धारणा होती है कि धान की फसल में हर समय पानी भरा रहना चाहिए। लेकिन कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि अत्यधिक पानी कई बार पौधों को नुकसान भी पहुंचा सकता है।
ज्यादा जलभराव होने से पौधों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं और खेत में कई प्रकार की बीमारियां तथा कीटों का खतरा बढ़ जाता है। वहीं यदि खेत में संतुलित नमी बनी रहे, तो पौधों की जड़ें गहराई तक विकसित होती हैं। इससे पौधे मजबूत बनते हैं और अधिक कल्ले निकलते हैं, जो बेहतर उत्पादन में मदद करते हैं।
पर्यावरण को भी होता है फायदा
धान की पारंपरिक खेती में लगातार पानी भरे रहने के कारण मीथेन जैसी गैसों का उत्सर्जन अधिक होता है, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक मानी जाती हैं।
लेकिन डीएसआर और नियंत्रित सिंचाई तकनीकों के उपयोग से इन गैसों का उत्सर्जन कम होता है। इससे पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है।
कम पानी में अच्छी उपज देने वाली किस्में
धान की खेती में सही किस्म का चयन सफलता की सबसे बड़ी कुंजी माना जाता है। आज कई ऐसी उन्नत किस्में उपलब्ध हैं जो कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं।
कृषि विशेषज्ञ किसानों को ऐसी किस्में अपनाने की सलाह दे रहे हैं जो जल्दी तैयार हो जाएं और कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार दें।
कुछ लोकप्रिय धान किस्में इस प्रकार हैं:
- 1509
- पीबी 1692
- वीएनआर 2111
- अभिनव
- आरएस 100
- सिजेंटा 9001
इन किस्मों की विशेषता यह है कि इनमें पानी की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होती है और उत्पादन अच्छा मिलता है।
वहीं जिन क्षेत्रों में जलभराव की समस्या रहती है, वहां किसान सुधा, वैदेही, जलमग्न और जलहरी जैसी किस्मों का चयन कर सकते हैं। ये किस्में अधिक पानी सहन करने में सक्षम मानी जाती हैं।
मिट्टी परीक्षण से बढ़ेगा फायदा
विशेषज्ञों का कहना है कि धान की बुवाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच करवाना बेहद जरूरी है।
मिट्टी परीक्षण से यह पता चलता है कि खेत में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है। इसके आधार पर किसान संतुलित मात्रा में उर्वरकों और खाद का प्रयोग कर सकते हैं।
इससे फालतू खर्च कम होता है और पौधों को सही पोषण मिलता है। परिणामस्वरूप उत्पादन में सुधार देखने को मिलता है।
गहरी जुताई क्यों है जरूरी?
धान की खेती शुरू करने से पहले खेत की गहरी जुताई करना भी बेहद लाभकारी माना जाता है।
गहरी जुताई करने से मिट्टी में छिपे कीट, उनके अंडे और खरपतवार धूप के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। इससे फसल में रोग और कीटों का खतरा कम होता है।
इसके अलावा मिट्टी भुरभुरी बनती है, जिससे पौधों की जड़ें आसानी से फैलती हैं और पानी का बेहतर उपयोग हो पाता है।
सिंचाई का सही प्रबंधन जरूरी
कम पानी में सफल धान खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि खेत में लगातार पानी भरने की बजाय जरूरत के अनुसार हल्की सिंचाई करनी चाहिए। खेत में केवल नमी बनाए रखना पर्याप्त होता है।
सुबह या शाम के समय सिंचाई करने से पानी की बचत होती है क्योंकि इस समय वाष्पीकरण कम होता है।
इसके अलावा “अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग” (AWD) तकनीक अपनाकर किसान पानी की काफी बचत कर सकते हैं। इस तकनीक में खेत को कुछ समय सूखने दिया जाता है और फिर आवश्यकता अनुसार सिंचाई की जाती है।
खरपतवार नियंत्रण भी जरूरी
डीएसआर तकनीक में खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है। यदि समय पर खरपतवार नियंत्रण नहीं किया जाए, तो वे पौधों के पोषक तत्व और नमी को तेजी से कम कर देते हैं।
इसलिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई और जरूरत पड़ने पर खरपतवारनाशी दवाओं का संतुलित उपयोग करना चाहिए।
किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
- धान की सीधी बुवाई तकनीक अपनाएं
- कम पानी वाली उन्नत किस्मों का चयन करें
- खेत में लगातार पानी भरकर न रखें
- मिट्टी परीक्षण अवश्य करवाएं
- समय पर खरपतवार नियंत्रण करें
- संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें
- सिंचाई का वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाएं
खेती में नई सोच अपनाने का समय
बदलते जलवायु हालात और तेजी से घटते भूजल स्तर को देखते हुए अब खेती में नई सोच अपनाना समय की जरूरत बन गया है।
यदि किसान आधुनिक तकनीकों, वैज्ञानिक सलाह और बेहतर जल प्रबंधन को अपनाते हैं, तो वे कम पानी में भी धान की बेहतरीन पैदावार ले सकते हैं। इससे न केवल लागत कम होगी, बल्कि पानी की बचत के साथ खेती अधिक लाभदायक और टिकाऊ भी बनेगी।


