देश के कई हिस्सों में लगातार बढ़ती गर्मी और बदलते मौसम का असर अब खेती पर भी साफ दिखाई देने लगा है। विशेष रूप से खरीफ सीजन में धान की फसल अत्यधिक तापमान, देर से आने वाले मानसून और सूखे जैसी परिस्थितियों से प्रभावित हो रही है। मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते उचित प्रबंधन नहीं किया गया, तो इससे धान की उपज में भारी गिरावट आ सकती है।
भारत सरकार और कृषि विशेषज्ञों द्वारा किसानों को गर्मी और सूखे के प्रभाव से बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण सलाह जारी की गई हैं। इन उपायों को अपनाकर किसान अपनी फसल को नुकसान से बचा सकते हैं और उत्पादन बनाए रख सकते हैं।
धान की फसल पर गर्मी का असर
खरीफ सीजन के दौरान मई से अक्टूबर तक कई राज्यों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है। वहीं रात का तापमान भी 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक बना रहता है। ऐसी परिस्थितियों में धान की फसल को गंभीर नुकसान हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक गर्मी के कारण बीजों का अंकुरण कमजोर हो जाता है, पौधों की बढ़वार रुक जाती है और फूल बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। सबसे अधिक नुकसान फूल आने के समय होता है। यदि इस दौरान तापमान बहुत अधिक हो जाए, तो दानों का विकास सही तरीके से नहीं हो पाता और पैदावार कम हो जाती है। कई बार स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि पूरी फसल खराब होने का खतरा पैदा हो जाता है।
मौसम आधारित सलाह पर ध्यान जरूरी
कृषि वैज्ञानिक किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे भारतीय मौसम विभाग (IMD) की हीटवेव चेतावनियों और कृषि मौसम सलाह का नियमित रूप से पालन करें।
गर्मी की लहर के दौरान खेतों में बुवाई, खाद डालने और कीटनाशकों के छिड़काव से बचना चाहिए। अत्यधिक तापमान में किए गए कृषि कार्य फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और कृषि विभाग द्वारा जारी स्थानीय सलाह किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। समय पर मिली जानकारी से किसान अपनी खेती की योजना बेहतर तरीके से बना सकते हैं।
सही किस्मों का चयन बेहद महत्वपूर्ण
विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को कम अवधि वाली और गर्मी एवं सूखा सहन करने वाली धान की किस्मों का चयन करना चाहिए।
ऐसी किस्में जल्दी तैयार हो जाती हैं और अधिक तापमान के प्रभाव से बच सकती हैं। इससे फूल आने के समय गर्मी का असर कम पड़ता है और उत्पादन सुरक्षित रहता है।
हाइब्रिड और उन्नत किस्मों का चयन करते समय स्थानीय कृषि वैज्ञानिकों की सलाह लेना भी जरूरी है।
बुवाई की तकनीक में बदलाव जरूरी
गर्मी से बचाव के लिए किसानों को पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाने की जरूरत है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 42 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के दौरान बुवाई नहीं करनी चाहिए। इसके अलावा एक साथ पूरी बुवाई करने के बजाय 7 से 10 दिनों के अंतराल में चरणबद्ध बुवाई करना अधिक सुरक्षित माना जाता है। इससे मौसम जोखिम कम होता है।
“स्टेल सीडबेड तकनीक” अपनाने से खेत में खरपतवार कम होते हैं और मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इससे पौधों पर गर्मी का असर कम पड़ता है।
डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीक फायदेमंद
विशेषज्ञ डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक को भी बढ़ावा दे रहे हैं। इस तकनीक में कम पानी की आवश्यकता होती है और पौधों को गर्मी का झटका कम लगता है।
बीजों की बुवाई से पहले सीड प्राइमिंग और उचित बीज उपचार करने से अंकुरण बेहतर होता है और पौधे मजबूत बनते हैं। इससे फसल की शुरुआती वृद्धि अच्छी होती है।
मिट्टी और नमी का सही प्रबंधन जरूरी
धान की फसल में मिट्टी की नमी बनाए रखना बेहद जरूरी है। खेत में पर्याप्त नमी रहने से पौधों पर गर्मी का असर कम होता है।
कृषि विशेषज्ञ खेतों में फसल अवशेष प्रबंधन, हरी खाद और गोबर की खाद या कम्पोस्ट के उपयोग की सलाह दे रहे हैं। इससे मिट्टी का तापमान कम रहता है और पानी को रोकने की क्षमता बढ़ती है।
लेजर लैंड लेवलिंग तकनीक अपनाने से खेत में पानी समान रूप से फैलता है और नमी की कमी वाले हिस्से नहीं बनते। इससे पौधों की वृद्धि समान रहती है।
सिंचाई का सही तरीका अपनाएं
गर्मी के समय हल्की लेकिन बार-बार सिंचाई करना अधिक लाभकारी माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार सुबह जल्दी या शाम के समय सिंचाई करना सबसे बेहतर रहता है, क्योंकि इस समय पानी का वाष्पीकरण कम होता है।
धान के खेतों में लगातार अधिक पानी भरकर रखने के बजाय 2 से 3 सेंटीमीटर तक उथला पानी बनाए रखना चाहिए। “अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग” (AWD) तकनीक अपनाने से पानी की बचत होती है और पौधों पर तनाव कम पड़ता है।
संतुलित पोषण से बढ़ेगी सहनशीलता
फसल को गर्मी से बचाने में संतुलित पोषण की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
कृषि वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग एक साथ अधिक मात्रा में करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से करना चाहिए। इसके साथ ही पोटाश की पर्याप्त मात्रा देने से पौधों की गर्मी सहन करने की क्षमता बढ़ती है।
2 प्रतिशत पोटेशियम नाइट्रेट (KNO₃) या 1 प्रतिशत पोटेशियम सल्फेट (K₂SO₄) का छिड़काव पौधों को अतिरिक्त मजबूती देता है। समुद्री शैवाल अर्क और अमीनो एसिड जैसे बायोस्टिमुलेंट्स भी फसल को तनाव से बचाने में मदद करते हैं।
हालांकि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी प्रकार का छिड़काव सुबह या शाम के ठंडे समय में ही करना चाहिए।
किसानों के लिए जागरूकता जरूरी
बदलते मौसम के दौर में किसानों को नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों के प्रति जागरूक होना बेहद जरूरी है। समय पर सही जानकारी और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर गर्मी और सूखे से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान मौसम आधारित कृषि सलाह का पालन करें और पानी तथा पोषण का सही प्रबंधन करें, तो खरीफ धान की फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे न केवल उत्पादन में सुधार होगा बल्कि किसानों की आय भी सुरक्षित रह सकेगी।


