गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय की पीएचडी शोधार्थी डॉ. तुषाद्री सिंह ने भारतीय कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा जगत में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए देशभर में विश्वविद्यालय का नाम रोशन किया है। उन्हें भारतीय कृषि विश्वविद्यालय संघ यानी Indian Agricultural Universities Association (IAUA) द्वारा फसल विज्ञान श्रेणी में “उत्कृष्ट पीएचडी शोध” पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें उनकी शोध थीसिस “एडवांसिंग हीट स्ट्रेस टॉलरेंस वाया इंट्रोग्रेशन एंड जीन इंटरैक्शन स्टडीज इन ब्रेड व्हीट” के लिए प्रदान किया गया।
यह उपलब्धि केवल एक छात्रा की सफलता नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि अनुसंधान में तेजी से बढ़ती वैज्ञानिक क्षमता और आधुनिक तकनीकों के उपयोग का भी प्रतीक मानी जा रही है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण गेहूं उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में तापीय तनाव सहनशील गेहूं किस्मों का विकास देश की खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है। डॉ. तुषाद्री सिंह का शोध इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में महत्वपूर्ण शोध
डॉ. तुषाद्री सिंह का शोधकार्य मुख्य रूप से ब्रेड व्हीट यानी सामान्य गेहूं में हीट स्ट्रेस टॉलरेंस विकसित करने पर आधारित था। बढ़ते तापमान के कारण गेहूं की पैदावार में लगातार गिरावट देखी जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यदि तापमान में इसी प्रकार वृद्धि होती रही तो गेहूं उत्पादन पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए शोध में पारंपरिक पादप प्रजनन तकनीकों, जीन अंतःक्रिया अध्ययन तथा आधुनिक CRISPR/Cas9 आधारित जीनोम संपादन तकनीकों का उपयोग किया गया। इस शोध का उद्देश्य ऐसी गेहूं किस्मों का विकास करना था, जो उच्च तापमान की परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हों।
यह शोधकार्य विश्वविद्यालय के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष तथा प्रधान गेहूं एवं जौ प्रजनक डॉ. जे.पी. जायसवाल के निर्देशन में पूरा किया गया। उन्होंने बताया कि यह शोध आधुनिक आणविक प्रजनन तकनीकों और पारंपरिक कृषि विज्ञान का उत्कृष्ट समन्वय है।
तापीय तनाव सहनशील गेहूं की दिशा में बड़ी उपलब्धि
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने विभिन्न गेहूं किस्मों का अध्ययन किया और पाया कि तापीय तनाव की परिस्थितियों में उत्पादन एवं उत्पादन संबंधी लक्षणों में महत्वपूर्ण आनुवंशिक विविधता मौजूद है। इस अध्ययन के आधार पर ऐसी उन्नत इंट्रोग्रेस्ड लाइनों का विकास किया गया, जिनमें अधिक तापमान के बावजूद बेहतर अनुकूलन क्षमता और स्थिर उत्पादन क्षमता देखने को मिली।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह उपलब्धि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में काफी मददगार साबित हो सकती है। यदि किसान ऐसी उन्नत गेहूं किस्मों का उपयोग करेंगे, तो बदलते मौसम के बावजूद उत्पादन को स्थिर बनाए रखना संभव होगा।
CRISPR तकनीक का सफल उपयोग
इस शोध की सबसे बड़ी विशेषताओं में आधुनिक CRISPR/Cas9 जीनोम संपादन तकनीक का उपयोग शामिल रहा। यह तकनीक वर्तमान समय में विश्वभर में कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
शोध के दौरान तापीय तनाव सहनशीलता से संबंधित गेहूं जीनों के लिए SDN1-CRISPR/Cas9 जीनोम संपादन हेतु gRNA डिजाइन रणनीतियों का सफल अनुकूलन किया गया। वैज्ञानिकों ने जटिल षट्गुणित गेहूं जीनोम से जुड़ी चुनौतियों का समाधान व्यापक इन-सिलिको विश्लेषण, लक्ष्य विशिष्टता मूल्यांकन, द्वितीयक संरचना परीक्षण और ऑफ-टार्गेट पूर्वानुमान के माध्यम से किया।
इस प्रक्रिया के जरिए अत्यधिक प्रभावी एवं विशिष्ट गाइड आरएनए की पहचान संभव हो सकी, जो सटीक जीनोम संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिक समुदाय इसे भारतीय गेहूं अनुसंधान के लिए एक बड़ी उपलब्धि मान रहा है।
सहयोगात्मक अनुसंधान का उत्कृष्ट उदाहरण
डॉ. जे.पी. जायसवाल ने बताया कि जीनोम संपादन आणविक प्रजनन की अत्याधुनिक विधा है, जिसके लिए उच्च स्तरीय प्रयोगशाला सुविधाओं और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। यह शोधकार्य Indian Institute of Wheat and Barley Research के सहयोग से सम्पन्न हुआ, जहां वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मुरमुथा एच.एम. ने महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि यह शोध संस्थानों के बीच सहयोगात्मक अनुसंधान का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसी प्रकार के संयुक्त प्रयास कृषि अनुसंधान को नई दिशा देने में सहायक सिद्ध होते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इस शोध को मिला सम्मान यह दर्शाता है कि भारतीय वैज्ञानिक वैश्विक स्तर की चुनौतियों का समाधान खोजने में सक्षम हैं।
विश्वविद्यालय के लिए गर्व का क्षण
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एस.के. कश्यप ने डॉ. तुषाद्री सिंह को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि उनकी मेहनत, समर्पण और शैक्षणिक उत्कृष्टता का परिणाम है। उन्होंने कहा कि यह सफलता विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय है और इससे अन्य विद्यार्थियों को भी शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि कृषि क्षेत्र में नई चुनौतियों का समाधान केवल आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से ही संभव है। ऐसे शोधकार्य देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाएंगे।
भविष्य के लिए उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच खाद्यान्न उत्पादन को सुरक्षित बनाए रखना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती होगी। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गेहूं करोड़ों लोगों के भोजन का प्रमुख आधार है। इसलिए ऐसी किस्मों का विकास अत्यंत जरूरी है, जो अधिक तापमान और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन दे सकें।
डॉ. तुषाद्री सिंह का यह शोध भविष्य में अगली पीढ़ी के गेहूं सुधार कार्यक्रमों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे न केवल कृषि वैज्ञानिकों को नई दिशा मिलेगी, बल्कि किसानों को भी जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से मुकाबला करने में मदद मिलेगी।


