भारत में खेती लंबे समय से उर्वरकों, खासकर यूरिया, पर अत्यधिक निर्भर रही है। हरित क्रांति के दौर में रासायनिक उर्वरकों ने उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ इनके असंतुलित उपयोग ने मिट्टी की सेहत, जल गुणवत्ता और खेती की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अब केंद्र सरकार तकनीक के सहारे इस समस्या का समाधान खोजने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। सरकार एग्रीस्टैक जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से खेती, भूमि और उर्वरक उपयोग को आपस में जोड़कर एक ऐसा मॉडल तैयार कर रही है, जिससे यह तय किया जा सके कि किसी फसल के लिए कितनी मात्रा में पोषक तत्व वास्तव में आवश्यक हैं।
मंगलवार को आयोजित एक महत्वपूर्ण गोलमेज सम्मेलन में केंद्रीय कृषि सचिव Rajat Kumar Mishra ने इस दिशा में सरकार की रणनीति और चल रहे प्रयोगों की जानकारी दी। आईसीआरआईईआर द्वारा आयोजित ‘भारत में मिट्टी का उपचार’ विषयक इस कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि सरकार फिलहाल चार राज्यों में सात पायलट प्रोजेक्ट चला रही है। इन परियोजनाओं के तहत भूमि रिकॉर्ड, फसल पैटर्न और उर्वरक उपयोग के आंकड़ों को एकीकृत किया जा रहा है।
मिश्रा ने कहा कि इन परियोजनाओं में अब तक लगभग 60 प्रतिशत तक डेटा मिलान हासिल किया जा चुका है। सरकार का लक्ष्य इसे 80 प्रतिशत तक पहुंचाना है। इसके बाद ऐसे महत्वपूर्ण डेटा का उपयोग किया जाएगा, जिससे यह समझा जा सके कि किन क्षेत्रों में यूरिया का जरूरत से ज्यादा उपयोग हो रहा है और उसे कैसे कम किया जा सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पहल केवल उर्वरकों की निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य खेती को वैज्ञानिक और टिकाऊ बनाना है। एग्रीस्टैक जैसे प्लेटफॉर्म किसानों, भूमि रिकॉर्ड, फसल विवरण और उर्वरक खरीद की जानकारी को एक साथ जोड़कर कृषि प्रबंधन का नया ढांचा तैयार कर सकते हैं। इससे किसानों को यह सलाह देना संभव होगा कि उन्हें किस फसल के लिए कौन-सा पोषक तत्व और कितनी मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए।
कृषि सचिव ने हरियाणा में किए गए एक प्रयोग का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एग्रीस्टैक आधारित मॉडल ने बेहद सकारात्मक परिणाम दिए। उन्होंने बताया कि केवल चार महीनों के भीतर पिछले वर्ष की तुलना में 1.02 लाख टन यूरिया की बचत दर्ज की गई। इसी अवधि में डीएपी की खपत में भी 72 हजार टन से अधिक की कमी आई। यह आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि यदि तकनीक आधारित निगरानी और सलाह प्रणाली को व्यापक स्तर पर लागू किया जाए, तो देश में उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
भारत में यूरिया का अत्यधिक उपयोग लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। सरकार द्वारा भारी सब्सिडी दिए जाने के कारण यूरिया किसानों के लिए सबसे सस्ता उर्वरक बन जाता है। परिणामस्वरूप किसान अक्सर संतुलित पोषण प्रबंधन के बजाय अधिक मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। इससे फसलों को तात्कालिक हरियाली तो मिलती है, लेकिन मिट्टी की गुणवत्ता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ती है और उत्पादन लागत भी समय के साथ बढ़ने लगती है।
मिश्रा ने कहा कि सरकारी विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2024-25 में लगभग 65 प्रतिशत किसानों ने सालभर में पांच से सात बोरी यूरिया खरीदी, जिसे सामान्य स्तर माना जा सकता है। लेकिन बाकी 35 प्रतिशत किसानों द्वारा अत्यधिक मात्रा में यूरिया का उपयोग किया गया। उन्होंने कहा कि यह केवल जागरूकता की कमी का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे किसानों की आर्थिक मजबूरियां भी जुड़ी हुई हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में अधिकांश किसानों के पास बहुत छोटी जोतें हैं। सीमित जमीन और बढ़ती लागत के बीच किसान ऐसी फसल उत्पादन रणनीति अपनाते हैं, जिससे कम खर्च में अधिक उत्पादन मिल सके। जब किसान बाजार में पोषक तत्व खरीदने जाते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से सबसे सस्ते विकल्प की ओर आकर्षित होते हैं और यही वजह है कि यूरिया का उपयोग बढ़ जाता है।
कृषि सचिव ने यह भी माना कि सह-किरायेदारों यानी उन किसानों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है, जिनके नाम पर जमीन नहीं होती, लेकिन वे खेती करते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 60 प्रतिशत उर्वरक उपयोग ऐसे किसानों द्वारा किया जाता है, जिनके पास जमीन का स्वामित्व नहीं है। ऐसे में यदि किसी तकनीकी प्रणाली को सफल बनाना है, तो इन किसानों को भी व्यवस्था में शामिल करना जरूरी होगा। उन्होंने कहा कि सरकार इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए मॉडल तैयार कर रही है, ताकि किसी प्रकार का टकराव या भेदभाव न हो।
इसके अलावा सरकार ने उन जिलों पर विशेष फोकस करना शुरू किया है, जहां उर्वरकों की खपत बहुत अधिक है। देश के 730 जिलों में से 163 जिलों की पहचान की गई है, जहां यूरिया का उपयोग औसत से कहीं अधिक है। इन जिलों में हर साल लगभग एक लाख टन यूरिया की खपत होती है। मिश्रा ने कहा कि इसका अर्थ है कि इन क्षेत्रों में हर वर्ष करीब 22 लाख बोरी यूरिया इस्तेमाल की जाती है, जबकि किसान खुद भी जानते हैं कि यह संतुलित उपयोग नहीं है।
उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने ‘धरती माता निगरानी समितियां’ नामक पहल भी शुरू की है। देशभर में अब तक लगभग 1.56 लाख समितियां गठित की जा चुकी हैं। इन समितियों का उद्देश्य किसानों को मिट्टी की सेहत, संतुलित पोषण और रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना है।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए नीति आयोग के सदस्य Ramesh Chand ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि देश को आदर्श एनपीके अनुपात 4:2:1 पर दोबारा गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। उनका कहना था कि जब यह अनुपात तय किया गया था, तब और आज की कृषि परिस्थितियों में बड़ा अंतर आ चुका है। फसलों की पैदावार कई गुना बढ़ चुकी है और मिट्टी की आवश्यकताएं भी बदल गई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एग्रीस्टैक जैसी तकनीकों का सही उपयोग किया गया, तो भारत की खेती अधिक टिकाऊ, वैज्ञानिक और लागत प्रभावी बन सकती है। इससे न केवल उर्वरकों पर होने वाला सरकारी खर्च कम होगा, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारने और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। आने वाले वर्षों में डिजिटल कृषि और डेटा आधारित खेती भारतीय कृषि व्यवस्था की दिशा बदल सकती है।


