पश्चिमी एशिया में जारी युद्ध और तनाव का असर अब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर साफ दिखाई देने लगा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। पेट्रोल-डीजल और गैस की बढ़ती कीमतों के बाद अब सबसे ज्यादा चिंता उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों को लेकर जताई जा रही है। खासकर खरीफ सीजन शुरू होने से पहले किसानों के सामने खाद की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए वैश्विक बाजार से 17 लाख टन यूरिया खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, लेकिन इसके बावजूद किसानों और कृषि विशेषज्ञों की चिंता कम नहीं हुई है।
खरीफ सीजन से पहले बढ़ी चिंता
भारत में जून से सितंबर के बीच खरीफ सीजन चलता है। इस दौरान धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई होती है। इन फसलों के लिए बड़ी मात्रा में उर्वरकों की जरूरत पड़ती है। हर साल इस समय किसानों की सबसे बड़ी चिंता खाद की समय पर उपलब्धता होती है। पिछले साल कई राज्यों में किसानों को खाद लेने के लिए लंबी-लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ा था। कई जगहों पर खाद की कमी के कारण किसानों को महंगे दामों पर यूरिया खरीदना पड़ा था।
इस बार भी हालात आसान नहीं दिखाई दे रहे हैं। पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन को प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर उर्वरकों के आयात पर पड़ रहा है। यही वजह है कि भारत सरकार ने समय रहते यूरिया आयात की प्रक्रिया तेज कर दी है।
17 लाख टन यूरिया आयात करेगी सरकार
सरकारी कंपनी नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) ने हाल ही में अपनी वेबसाइट पर एक नोटिस जारी कर बताया कि भारत 17 लाख टन यूरिया आयात करेगा। इसमें से लगभग 9 लाख टन यूरिया देश के पश्चिमी तट यानी वेस्ट कोस्ट के जरिए आएगा, जबकि बाकी यूरिया पूर्वी तट के बंदरगाहों के माध्यम से भारत पहुंचेगा।
सरकार के अनुसार यह खेप 20 जुलाई तक लोडिंग पोर्ट से रवाना हो सकती है। माना जा रहा है कि खरीफ सीजन में किसानों को खाद की कमी से बचाने के लिए यह कदम उठाया गया है। हालांकि वैश्विक हालात को देखते हुए सप्लाई में देरी या लागत बढ़ने की आशंका भी बनी हुई है।
गैस संकट से घटा यूरिया उत्पादन
भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया उत्पादक देशों में शामिल है। लेकिन यूरिया उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की आवश्यकता होती है। अमोनिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल होती है और अमोनिया से ही यूरिया तैयार किया जाता है।
भारत अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिमी एशियाई देशों से आयात करता है। लेकिन ईरान की ओर से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को बंद करने जैसी घटनाओं ने वैश्विक LNG सप्लाई को प्रभावित किया है। इससे गैस की उपलब्धता कम हुई और कीमतें तेजी से बढ़ गईं।
गैस संकट का असर सिर्फ भारत पर नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ा है। कई देशों में गैस की कमी के कारण उर्वरक कारखानों को उत्पादन कम करना पड़ा या अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। परिणामस्वरूप वैश्विक बाजार में यूरिया की उपलब्धता घट गई और कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला।
दोगुनी कीमत पर खरीदना पड़ रहा यूरिया
भारत ने पिछले टेंडर में करीब 25 लाख टन यूरिया खरीदा था। विशेषज्ञों के अनुसार उस समय यूरिया की कीमतें युद्ध और तनाव से पहले के मुकाबले लगभग दोगुनी हो चुकी थीं। अब नए 17 लाख टन के टेंडर में भी सरकार को अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पश्चिमी एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो आने वाले महीनों में उर्वरकों की कीमतें और बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर सरकार की सब्सिडी पर पड़ेगा, क्योंकि भारत में किसानों को यूरिया काफी कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है और बाकी खर्च सरकार वहन करती है।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया महंगा होता है तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ और बढ़ेगा। इससे देश के वित्तीय प्रबंधन पर भी दबाव पड़ सकता है।
किसानों पर क्या पड़ेगा असर?
उर्वरकों की कमी या महंगाई का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ता है। खरीफ सीजन में समय पर खाद नहीं मिलने से बुवाई प्रभावित हो सकती है। कई बार किसान मजबूरी में ब्लैक मार्केट से महंगे दामों पर खाद खरीदते हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है।
यूरिया, DAP और पोटाश जैसे उर्वरक फसल उत्पादन के लिए बेहद जरूरी हैं। यदि इनकी उपलब्धता समय पर नहीं होती तो उत्पादन प्रभावित होता है और किसानों की आय पर असर पड़ता है। इसके अलावा खाद की कमी से फसल की गुणवत्ता भी कमजोर हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि उर्वरक संकट गहराया तो इसका असर खाद्यान्न उत्पादन पर भी पड़ सकता है। इससे आने वाले समय में खाद्य महंगाई बढ़ने की संभावना भी बनी रहेगी।
देश में कितना है खाद का स्टॉक?
उर्वरक मंत्रालय के अनुसार खरीफ सीजन में देश को लगभग 3.9 करोड़ टन उर्वरकों की आवश्यकता होती है। फिलहाल देश में करीब 2 करोड़ टन उर्वरकों का स्टॉक मौजूद है। इसके अलावा 17 लाख टन यूरिया की नई खेप भी जुलाई तक आने की उम्मीद है।
सरकार का दावा है कि देश में फिलहाल खाद की पर्याप्त उपलब्धता है और किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वैश्विक हालात और बिगड़ते हैं तो आने वाले महीनों में नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराई जाए और कीमतों को नियंत्रण में रखा जाए। इसके लिए केंद्र सरकार लगातार आयात बढ़ाने, घरेलू उत्पादन को मजबूत करने और सब्सिडी व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश कर रही है।
इसके अलावा सरकार वैकल्पिक उर्वरकों और जैविक खेती को भी बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है ताकि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सके। हालांकि वर्तमान समय में देश की कृषि व्यवस्था पूरी तरह से रासायनिक उर्वरकों पर आधारित है, इसलिए अचानक बदलाव आसान नहीं है।
आगे क्या हो सकता है?
पश्चिमी एशिया का संकट यदि लंबा चलता है तो इसका असर लंबे समय तक वैश्विक उर्वरक बाजार पर बना रह सकता है। गैस की कीमतें बढ़ने से यूरिया उत्पादन महंगा रहेगा और आयात लागत बढ़ती जाएगी।
भारत जैसे बड़े कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है। आने वाले महीनों में सरकार को खाद आपूर्ति, सब्सिडी और किसानों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। साथ ही घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और वैकल्पिक संसाधनों को मजबूत करने की दिशा में तेजी से काम करना पड़ेगा।
कुल मिलाकर पश्चिमी एशिया में जारी युद्ध का असर अब सीधे भारतीय खेतों तक पहुंच चुका है। किसान, सरकार और उर्वरक कंपनियां सभी इस संकट के प्रभाव को महसूस कर रही हैं। यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले समय में खाद संकट और गहरा सकता है।


