खेती में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता, संरचना और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसके कारण आज जैविक खेती और जैव उर्वरकों के उपयोग पर विशेष जोर दिया जा रहा है। जैव उर्वरक ऐसे सूक्ष्म जीवों पर आधारित उत्पाद हैं जो मिट्टी की पोषण क्षमता बढ़ाने, पौधों को आवश्यक तत्व उपलब्ध कराने तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद करते हैं।
जैव उर्वरक मुख्य रूप से जीवाणु, कवक और सायनोबैक्टीरिया जैसे सूक्ष्म जीवों के कल्चर होते हैं, जिन्हें प्रयोगशाला में विकसित किया जाता है। ये जीव मिट्टी में जाकर पोषक तत्वों को पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं और मिट्टी की जैविक सक्रियता को बढ़ाते हैं। इनके उपयोग से न केवल उत्पादन में वृद्धि होती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और मिट्टी की दीर्घकालीन उर्वरता भी बनी रहती है।
जैव उर्वरकों के प्रमुख प्रकार
- राइजोबियम (Rhizobium)
राइजोबियम एक सहजीवी जीवाणु है जो दलहनी फसलों की जड़ों में गांठें बनाकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करता है। यह चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, मटर, सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलों के लिए अत्यंत उपयोगी है। इसके प्रयोग से प्रति हेक्टेयर लगभग 30–40 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी में जुड़ती है तथा उत्पादन में 20–30 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।
- एजोटोबैक्टर (Azotobacter)
यह स्वतंत्र रूप से रहने वाला जीवाणु है जो अदलहनी फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण का कार्य करता है। इसका उपयोग गेहूं, धान, ज्वार, बाजरा, कपास, गन्ना, सब्जियों तथा फलदार पौधों में किया जाता है। एजोटोबैक्टर पौधों को नाइट्रोजन के साथ-साथ वृद्धि हार्मोन, विटामिन तथा कुछ एंटीबायोटिक पदार्थ भी प्रदान करता है, जिससे जड़ों का विकास और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
- एसीटोबैक्टर (Acetobacter)
एसीटोबैक्टर मुख्य रूप से गन्ने की फसल में उपयोग किया जाता है। यह पौधों के आसपास नाइट्रोजन को उपलब्ध कराता है तथा मिट्टी की उर्वरता में सुधार करता है। इसके उपयोग से गन्ने और चुकंदर की उपज तथा उनमें शर्करा की मात्रा बढ़ती है। यह रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता को भी कम करता है।
- एजोस्पाइरिलम (Azospirillum)
यह जीवाणु अदलहनी फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण के साथ-साथ पौध वृद्धि हार्मोन का उत्पादन करता है। धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, गन्ना और पुष्पीय पौधों में इसका उपयोग लाभकारी पाया गया है। यह जड़ों की वृद्धि को बढ़ाता है और पौधों को पोषक तत्वों के बेहतर अवशोषण में सहायता करता है।
- फास्फेट घुलनशील जैव उर्वरक (PSB)
फास्फोरस पौधों के लिए अत्यंत आवश्यक पोषक तत्व है, लेकिन मिट्टी में इसका अधिकांश भाग अघुलनशील रूप में मौजूद रहता है। फास्फेट घुलनशील जीवाणु (PSB) इस अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील बनाकर पौधों तक पहुंचाते हैं। इसके प्रयोग से फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ती है और रासायनिक फास्फेट उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।
- नील-हरित शैवाल (Blue Green Algae)
नील-हरित शैवाल या सायनोबैक्टीरिया प्रकाश संश्लेषण करने वाले सूक्ष्म जीव हैं, जो विशेष रूप से धान की खेती में नाइट्रोजन स्थिरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उत्पादन सुधारने में सहायक होते हैं।
- एजोला (Azolla)
एजोला एक जलीय फर्न है जो धान के खेतों में हरी खाद के रूप में उपयोग किया जाता है। इसमें उपस्थित सूक्ष्म जीव नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं। एजोला मिट्टी की जैविक गुणवत्ता बढ़ाता है तथा धान की फसल के लिए प्राकृतिक पोषण स्रोत का कार्य करता है।
जैव उर्वरकों के प्रयोग की विधियां
- बीज उपचार
यह जैव उर्वरकों के उपयोग की सबसे प्रभावी विधि मानी जाती है। गुड़ या गोंद के घोल में जैव उर्वरक मिलाकर बीजों पर लेप किया जाता है। उपचारित बीजों को छाया में सुखाकर तुरंत बुवाई करनी चाहिए।
- पौध जड़ उपचार
धान, टमाटर, गोभी, प्याज आदि रोपाई वाली फसलों में पौधों की जड़ों को जैव उर्वरक के घोल में 10 मिनट तक डुबोकर रोपाई की जाती है। इससे पौधों की जड़ें तेजी से विकसित होती हैं।
- कंद उपचार
आलू, गन्ना, अदरक और अरबी जैसी फसलों में कंदों को जैव उर्वरक मिश्रित घोल में डुबोकर उपचारित किया जाता है। इससे अंकुरण अच्छा होता है और पौधों की प्रारंभिक वृद्धि तेज होती है।
- मृदा उपचार
जैव उर्वरकों को गोबर की सड़ी खाद और मिट्टी के साथ मिलाकर खेत में अंतिम जुताई के समय समान रूप से बिखेरा जाता है। इससे सूक्ष्म जीव मिट्टी में सक्रिय होकर पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं।
जैव उर्वरकों के लाभ
जैव उर्वरकों का उपयोग किसानों के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से लाभदायक है।
- फसल उत्पादन में लगभग 10–15 प्रतिशत तक वृद्धि होती है।
- नाइट्रोजन और फास्फोरस की आवश्यकता का 20–25 प्रतिशत तक पूर्ति करते हैं।
- मिट्टी की उर्वरता और संरचना में सुधार करते हैं।
- पौधों के अंकुरण और वृद्धि को बढ़ावा देते हैं।
- जड़ों का विकास बेहतर होता है।
- मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है।
- कई मिट्टी जनित रोगों के नियंत्रण में सहायता मिलती है।
- रासायनिक उर्वरकों की लागत कम होती है।
- पर्यावरण प्रदूषण नहीं होता और भूमि की दीर्घकालीन उत्पादकता बनी रहती है।
प्रयोग के समय सावधानियां
जैव उर्वरकों से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।
- फसल के अनुसार उचित जैव उर्वरक का चयन करें।
- अनुशंसित मात्रा में ही प्रयोग करें।
- पैकेट पर निर्माण एवं समाप्ति तिथि अवश्य जांचें।
- समाप्ति तिथि के बाद जैव उर्वरक का उपयोग न करें।
- जैव उर्वरकों को सूखी और छायादार जगह पर संग्रहित करें।
- अधिक तापमान से बचाएं क्योंकि अत्यधिक गर्मी में सूक्ष्म जीव नष्ट हो सकते हैं।
निष्कर्ष
वर्तमान समय में टिकाऊ कृषि और पर्यावरण संरक्षण के लिए जैव उर्वरकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ये न केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हैं, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता सुधारकर दीर्घकालीन उत्पादकता भी सुनिश्चित करते हैं। हालांकि इनके अनेक लाभ होने के बावजूद आज भी बड़ी संख्या में किसान इनके उपयोग और फायदों से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। यदि किसानों को जैव उर्वरकों के बारे में जागरूक किया जाए और उनकी उपलब्धता बढ़ाई जाए, तो कृषि लागत घटाने, मिट्टी की सेहत सुधारने और सुरक्षित खाद्य उत्पादन में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है। जैव उर्वरक वास्तव में टिकाऊ और लाभकारी खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।


