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गोबर और ऊन से तैयार हुई पर्यावरण अनुकूल बायो-कंपोजिट छत, पशुओं को हीट स्ट्रेस से राहत और दूध उत्पादन बढ़ाने में मिलेगी मदद

Eco-friendly bio-composite roofing made from cow dung and wool,

Emran Khan by Emran Khan
June 24, 2026
in पशुपालन, समाचार
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गोबर और ऊन से तैयार हुई पर्यावरण अनुकूल बायो-कंपोजिट छत, पशुओं को हीट स्ट्रेस से राहत और दूध उत्पादन बढ़ाने में मिलेगी मदद
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बढ़ती गर्मी और लगातार बढ़ रहे तापमान के कारण पशुपालन क्षेत्र के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। विशेष रूप से गर्मी के मौसम में पशुओं में हीट स्ट्रेस की समस्या तेजी से बढ़ती है, जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य, दूध उत्पादन और प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। इसी चुनौती का समाधान खोजने की दिशा में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), बरेली के वैज्ञानिकों ने एक अभिनव और पर्यावरण अनुकूल तकनीक विकसित की है।

संस्थान के वैज्ञानिकों ने गाय के गोबर और भेड़ की अनुपयोगी ऊन का उपयोग कर एक विशेष बायो-कंपोजिट छत तैयार की है, जो पशुशालाओं के अंदर तापमान को कम रखने में सहायक हो सकती है। प्रारंभिक परीक्षणों में इस तकनीक से तैयार छतों ने पारंपरिक छतों की तुलना में बेहतर परिणाम दिखाए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे पशुओं को गर्मी से राहत मिलेगी और दूध उत्पादन क्षमता में भी सुधार देखने को मिल सकता है।

गर्मी पशुपालन के लिए बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों के अनुसार गर्मियों के दौरान तापमान बढ़ने पर पशु हीट स्ट्रेस का शिकार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में पशु सामान्य से कम चारा खाते हैं, अधिक पानी पीते हैं और उनका शारीरिक संतुलन प्रभावित होने लगता है। इसका असर दूध उत्पादन, वजन वृद्धि, प्रजनन क्षमता और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर दिखाई देता है।

दूध देने वाले पशुओं में हीट स्ट्रेस के कारण उत्पादन में उल्लेखनीय कमी देखी जाती है। कई बार पशुपालकों को आर्थिक नुकसान का सामना भी करना पड़ता है। ऐसे में कम लागत वाली तकनीकों की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

प्राकृतिक संसाधनों से तैयार की गई नई छत

आईवीआरआई के वैज्ञानिकों ने स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर इस बायो-कंपोजिट सामग्री को विकसित किया है। इसके निर्माण में मुख्य रूप से देशी नस्ल के पशुओं का गोबर और भेड़ों की ऐसी ऊन का उपयोग किया गया है, जिसका सामान्यतः व्यावसायिक उपयोग नहीं हो पाता।

वैज्ञानिकों ने इन दोनों सामग्रियों को प्राकृतिक बंधनकारी तत्वों के साथ मिलाकर एक विशेष मिश्रण तैयार किया। इसके बाद इस मिश्रण को दबाव तकनीक के माध्यम से मजबूत शीटों का रूप दिया गया, जिन्हें पशुशाला की छत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के रासायनिक या कृत्रिम पदार्थ का उपयोग नहीं किया गया, जिससे यह तकनीक पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल मानी जा रही है।

परीक्षण में मिले उत्साहजनक परिणाम

संस्थान द्वारा किए गए परीक्षणों में पाया गया कि बायो-कंपोजिट सामग्री से निर्मित छत वाले पशुशालाओं का तापमान पारंपरिक छतों की तुलना में काफी कम रहा। कई परीक्षणों में तापमान में लगभग पांच से सात डिग्री सेल्सियस तक की कमी दर्ज की गई।

वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में यह अंतर पशुओं के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। कम तापमान वाले वातावरण में पशु अधिक आरामदायक महसूस करते हैं, जिससे उनका तनाव स्तर कम होता है और वे सामान्य रूप से भोजन ग्रहण करते हैं।

दूध उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव की उम्मीद

पशुपालन विशेषज्ञों का मानना है कि जब पशुओं को गर्मी से राहत मिलती है तो उनकी शारीरिक गतिविधियां सामान्य बनी रहती हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव दूध उत्पादन पर भी पड़ता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार प्रारंभिक अध्ययन में देखा गया कि ठंडे वातावरण में रहने वाले पशुओं ने अपेक्षाकृत बेहतर भोजन सेवन किया। बेहतर पोषण का सीधा संबंध दूध उत्पादन और शारीरिक विकास से होता है।

यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर अपनाई जाती है तो गर्मी के मौसम में दूध उत्पादन में होने वाली गिरावट को कम करने में मदद मिल सकती है।

छोटे और सीमांत पशुपालकों के लिए वरदान

देश के अधिकांश पशुपालक छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण वे पशुशालाओं में पंखे, कूलर, फॉगिंग सिस्टम या अन्य आधुनिक सुविधाएं नहीं लगा पाते।

ऐसी स्थिति में कम लागत वाली बायो-कंपोजिट छत उनके लिए एक प्रभावी विकल्प बन सकती है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री से तैयार होने के कारण इसकी लागत भी अपेक्षाकृत कम रहने की संभावना है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तकनीक का व्यावसायिक स्तर पर विस्तार किया गया तो ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों पशुपालकों को इसका लाभ मिल सकता है।

पर्यावरण संरक्षण में भी मिलेगी मदद

यह तकनीक केवल पशुपालन क्षेत्र के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। गोबर और अनुपयोगी ऊन जैसे प्राकृतिक संसाधनों का पुनः उपयोग कर कचरे को उपयोगी उत्पाद में बदला जा सकता है।

इससे एक ओर अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या कम होगी तो दूसरी ओर पर्यावरण अनुकूल निर्माण सामग्री को बढ़ावा मिलेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में ऐसी जैविक सामग्रियां सतत विकास के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

रोग प्रतिरोधक क्षमता और प्रजनन पर भी असर

विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक गर्मी केवल दूध उत्पादन को ही प्रभावित नहीं करती बल्कि पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता और प्रजनन प्रदर्शन पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है।

जब पशु लगातार तनाव की स्थिति में रहते हैं तो उनमें बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। वहीं प्रजनन चक्र भी प्रभावित हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि हीट स्ट्रेस को कम किया जाए तो पशुओं के स्वास्थ्य में समग्र सुधार संभव है।

नई बायो-कंपोजिट छत इस दिशा में एक उपयोगी समाधान साबित हो सकती है।

तकनीक को किसानों तक पहुंचाने की तैयारी

संस्थान के वैज्ञानिकों ने बताया कि इस नवाचार को प्रयोगशाला और परीक्षण स्तर पर सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। अब इसे व्यापक स्तर पर उपयोग में लाने की दिशा में आगे की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

तकनीक के संरक्षण और व्यावसायिक उपयोग को ध्यान में रखते हुए इसके पेटेंट की प्रक्रिया भी प्रारंभ की जा रही है। इसके बाद विभिन्न राज्यों के पशुपालकों और डेयरी क्षेत्र से जुड़े लोगों तक इसे पहुंचाने के प्रयास किए जाएंगे।

पशुपालन क्षेत्र में नई उम्मीद

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के दौर में पशुपालन क्षेत्र को नई तकनीकों की आवश्यकता है। बायो-कंपोजिट छत जैसी पहलें न केवल पशुओं को आरामदायक वातावरण प्रदान करेंगी, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक साबित हो सकती हैं।

यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर अपनाई जाती है, तो कम लागत में पशुशालाओं को ठंडा रखने का एक प्रभावी विकल्प उपलब्ध होगा। इससे पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर होगा, दूध उत्पादन में वृद्धि होगी और पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूती मिल सकेगी। ग्रामीण भारत के लिए यह नवाचार पशुपालन क्षेत्र में एक नई उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।

 

Tags: AnimalAnimal HusbandryLivestock
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