डाय-अमोनियम फॉस्फेट यानी DAP भारतीय किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण फॉस्फेटिक उर्वरकों में से एक है। गेहूं, धान, मक्का, दलहन, तिलहन और कई अन्य फसलों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन किसानों के सामने अक्सर सवाल रहता है कि DAP की कीमत आखिर इतनी क्यों बदलती रहती है? जब एक बोरी की कीमत सरकार तय या नियंत्रित व्यवस्था के तहत रखती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला बदलाव किसानों तक कैसे पहुंचता है?
इस सवाल का जवाब DAP की पूरी सप्लाई चेन को समझने से मिलता है। DAP की कहानी किसान के खेत से नहीं, बल्कि दुनिया के उन इलाकों से शुरू होती है जहां फॉस्फेट रॉक का खनन होता है।
फॉस्फेट रॉक से शुरू होती है DAP की कहानी
DAP बनाने के लिए सबसे जरूरी कच्चे माल में फॉस्फेट रॉक शामिल है। इसे खदानों से निकाला जाता है और प्रोसेस करके फॉस्फोरिक एसिड तैयार किया जाता है। इसके बाद अमोनिया के साथ रासायनिक प्रक्रिया के जरिए DAP बनाया जाता है।
यानी DAP की कीमत केवल भारत में होने वाली उत्पादन लागत से तय नहीं होती। इसके पीछे फॉस्फेट रॉक, फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया, सल्फर, प्राकृतिक गैस, बिजली और परिवहन जैसी कई लागतें जुड़ी होती हैं।
भारत के लिए यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी DAP जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात या आयातित कच्चे माल पर निर्भर होकर पूरा करता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी कीमत तो भारत पर असर
DAP की कीमत पर सबसे बड़ा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार का होता है। अगर फॉस्फेट रॉक या फॉस्फोरिक एसिड महंगा होता है, तो DAP बनाने की लागत बढ़ जाती है।
इसी तरह अमोनिया की कीमत बढ़ने पर भी DAP महंगा हो सकता है। अमोनिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमत बढ़ती है, तो उसका असर उर्वरक उत्पादन की लागत पर भी पड़ सकता है।
यही कारण है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, कच्चे माल की उपलब्धता और उर्वरक की मांग DAP की कीमत को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक बन जाते हैं।
भारत कितना DAP आयात करता है?
भारत में DAP की मांग काफी अधिक है, जबकि घरेलू उत्पादन इस मांग को पूरी तरह पूरा नहीं करता। इसलिए सरकार और भारतीय उर्वरक कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार से DAP या उसके कच्चे माल की खरीद करती हैं।
भारत को फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए कई देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में किसी प्रमुख आपूर्तिकर्ता देश में उत्पादन प्रभावित होने, निर्यात नीति बदलने या बंदरगाहों पर समस्या आने से वैश्विक कीमतों पर असर पड़ सकता है।
इसके अलावा युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री मार्गों में बाधा और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकते हैं।
रुपये और डॉलर का भी है बड़ा खेल
DAP की अंतरराष्ट्रीय खरीद आमतौर पर डॉलर में होती है। इसलिए रुपये और डॉलर की विनिमय दर भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
मान लीजिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत में कोई बदलाव नहीं हुआ, लेकिन रुपये की तुलना में डॉलर मजबूत हो गया। ऐसी स्थिति में भारतीय आयातकों को उसी मात्रा के DAP के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।
यानी किसान के लिए DAP की कीमत केवल वैश्विक उर्वरक बाजार पर निर्भर नहीं है, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार का असर भी इसकी लागत पर पड़ सकता है।
समुद्र के रास्ते भारत तक पहुंचता है DAP
अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदा गया DAP या उसका कच्चा माल समुद्री जहाजों के जरिए भारत पहुंचता है। इसके बाद बंदरगाह से इसे देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाया जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में समुद्री मालभाड़ा, पोर्ट चार्ज, हैंडलिंग, भंडारण और सड़क या रेल परिवहन की लागत जुड़ती है।
अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिपिंग लागत बढ़ती है या किसी समुद्री मार्ग में व्यवधान आता है, तो आयातित उर्वरक की कुल लागत प्रभावित हो सकती है।
फिर सरकार की सब्सिडी आती है तस्वीर में
DAP की कीमत को समझने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सरकारी सब्सिडी है। भारत सरकार किसानों को उर्वरकों की कीमतों में राहत देने के लिए सब्सिडी देती है।
फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी यानी NBS व्यवस्था लागू है। इसके तहत नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों के आधार पर सब्सिडी निर्धारित की जाती है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की लागत बढ़ती है, तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है। सरकार किसानों को कीमतों में अचानक बड़े उछाल से बचाने के लिए नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप करती है।
यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत और किसान द्वारा भुगतान की जाने वाली कीमत हमेशा एक जैसी नहीं होती।
कंपनियां सीधे किसान को DAP नहीं बेचतीं
DAP की यात्रा बंदरगाह पर खत्म नहीं होती। आयात या उत्पादन के बाद उर्वरक कंपनियां इसे विभिन्न राज्यों और जिलों तक पहुंचाती हैं।
इसके बाद अधिकृत डीलरों और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किसानों तक DAP पहुंचता है। सरकार डिजिटल सिस्टम के जरिए उर्वरकों के वितरण और बिक्री की निगरानी भी करती है।
उर्वरक की बिक्री में किसान की पहचान और बिक्री रिकॉर्ड दर्ज करने जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सब्सिडी वाले उर्वरक का लाभ वास्तविक किसानों तक पहुंचे और इसकी कालाबाजारी को रोका जा सके।
मांग बढ़ने पर क्यों बढ़ जाता है दबाव?
DAP की कीमत पर मांग का भी असर होता है। खरीफ और रबी सीजन से पहले उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ती है। अगर किसी समय वैश्विक बाजार में मांग अधिक हो और आपूर्ति सीमित हो, तो अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊपर जा सकती हैं।
दूसरी ओर, अगर पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध हो और अंतरराष्ट्रीय कीमतें नरम हों, तो आयात लागत में राहत मिल सकती है।
इसलिए किसानों को DAP की कीमत में बदलाव केवल स्थानीय बाजार की स्थिति देखकर नहीं समझना चाहिए। इसके पीछे वैश्विक मांग और आपूर्ति का पूरा समीकरण काम करता है।
एक बोरी DAP की कीमत के पीछे कितने खर्च?
अगर आसान भाषा में समझें तो DAP की लागत को कई हिस्सों में बांटा जा सकता है। इसमें फॉस्फेट रॉक और अन्य कच्चे माल की कीमत, अमोनिया और ऊर्जा लागत, DAP का निर्माण, समुद्री परिवहन, बीमा, बंदरगाह खर्च, देश के भीतर परिवहन और वितरण लागत शामिल होती है।
इसके ऊपर सरकार की सब्सिडी व्यवस्था आती है, जो किसानों पर पड़ने वाले वास्तविक मूल्य भार को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यानी किसान जब DAP की एक बोरी खरीदता है, तो उसके पीछे खदान से लेकर केमिकल प्लांट, जहाज, बंदरगाह, गोदाम, ट्रांसपोर्टर और डीलर तक की लंबी सप्लाई चेन काम कर रही होती है।
किसानों के लिए सबसे जरूरी बात
DAP महंगा होने का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि कंपनियां मनमाने तरीके से कीमत बढ़ा रही हैं। इसकी कीमत पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे माल, ऊर्जा, समुद्री परिवहन, मुद्रा विनिमय और सरकारी सब्सिडी जैसे कई कारकों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है।
हालांकि, किसानों के लिए जरूरी है कि वे DAP और दूसरे उर्वरकों की खरीद अधिकृत विक्रेता से ही करें और बिल जरूर लें। साथ ही, केवल DAP पर निर्भर रहने के बजाय मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाना भी जरूरी है।
आखिरकार DAP की कीमत की पूरी कहानी एक बोरी खाद की नहीं, बल्कि वैश्विक खनन, ऊर्जा, रसायन, व्यापार, समुद्री परिवहन, सरकारी सब्सिडी और किसान की जरूरतों से जुड़ी पूरी आर्थिक श्रृंखला की कहानी है। फॉस्फेट रॉक की खदान से शुरू हुआ यह सफर जब किसान के खेत तक पहुंचता है, तब तक उसके साथ कई लागत और नीतियां जुड़ चुकी होती हैं।

