देश के कई राज्यों में मानसून की अच्छी बारिश के बाद खरीफ फसलों की बुवाई ने रफ्तार पकड़ ली है। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में सबसे अधिक उपयोग होने वाले उर्वरक यूरिया की मांग में भी अचानक तेज उछाल देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना सहित कई राज्यों में किसान धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, बाजरा और दलहनी फसलों की बुवाई के बाद पहली टॉप ड्रेसिंग के लिए यूरिया खरीदने बाजार पहुंच रहे हैं। इसके कारण कई जिलों में उर्वरक बिक्री केंद्रों पर किसानों की भीड़ बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश के बाद मिट्टी में पर्याप्त नमी उपलब्ध होने से पौधों की शुरुआती वृद्धि तेज होती है। ऐसे समय पर यदि संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन उपलब्ध हो जाए तो फसल का विकास बेहतर होता है। यही कारण है कि बारिश के बाद यूरिया की मांग हर वर्ष बढ़ती है, लेकिन इस बार मानसून की अच्छी शुरुआत और खरीफ क्षेत्र के विस्तार के कारण इसकी मांग अपेक्षा से अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है।
क्यों बढ़ती है बारिश के बाद यूरिया की मांग?
यूरिया में लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है, जो पौधों की पत्तियों, तनों और समग्र वृद्धि के लिए सबसे आवश्यक पोषक तत्वों में से एक है। जब खेत में पर्याप्त नमी होती है तो पौधे नाइट्रोजन का बेहतर उपयोग कर पाते हैं। इसलिए किसान अक्सर पहली अच्छी बारिश के बाद यूरिया का प्रयोग करना पसंद करते हैं।
बारिश से पहले यूरिया डालने पर कई बार उर्वरक का नुकसान होने की आशंका रहती है। वहीं पर्याप्त नमी मिलने पर यूरिया जल्दी घुलता है और पौधों की जड़ों तक आसानी से पहुंच जाता है। इसी वजह से मानसून सक्रिय होते ही इसकी बिक्री तेजी से बढ़ जाती है।
खरीफ फसलों में सबसे अधिक उपयोग
धान की खेती में यूरिया की मांग सबसे अधिक रहती है। धान के अलावा मक्का, गन्ना, कपास, ज्वार, बाजरा और कई सब्जी फसलों में भी नाइट्रोजन की आवश्यकता अधिक होती है। इन फसलों की शुरुआती वृद्धि के दौरान किसान पहली या दूसरी किस्त के रूप में यूरिया का प्रयोग करते हैं।
इस वर्ष कई राज्यों में समय पर बारिश होने से बुवाई तेजी से पूरी हुई है। अब जैसे-जैसे फसलें 20 से 30 दिन की अवस्था में पहुंचेंगी, यूरिया की मांग और बढ़ सकती है। कृषि विभाग भी किसानों को आवश्यकता के अनुसार उर्वरक उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है।
सरकार की आपूर्ति व्यवस्था पर नजर
यूरिया की बढ़ती मांग को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें उर्वरक उपलब्धता की लगातार निगरानी कर रही हैं। विभिन्न राज्यों में उर्वरक कंपनियों से अतिरिक्त रैक भेजने, गोदामों में पर्याप्त स्टॉक रखने और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं।
सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी जिले में किसानों को यूरिया की कमी का सामना न करना पड़े। इसके लिए राज्यों के कृषि विभाग, उर्वरक कंपनियां और जिला प्रशासन नियमित समीक्षा कर रहे हैं। जहां मांग अधिक है, वहां अतिरिक्त आपूर्ति भेजी जा रही है।
किसानों को नहीं करनी चाहिए घबराहट में खरीदारी
विशेषज्ञों का मानना है कि मांग बढ़ने के दौरान कई किसान भविष्य की जरूरत को देखते हुए जरूरत से अधिक यूरिया खरीद लेते हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में अस्थायी कमी जैसी स्थिति बन जाती है। कृषि अधिकारियों का कहना है कि पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध कराया जा रहा है, इसलिए किसानों को केवल आवश्यकता के अनुसार ही उर्वरक खरीदना चाहिए।
जरूरत से अधिक भंडारण न केवल अन्य किसानों के लिए परेशानी पैदा करता है बल्कि कई बार लंबे समय तक अनुचित तरीके से रखने से उर्वरक की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।
संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर
कृषि वैज्ञानिक लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि केवल यूरिया पर निर्भर रहना उचित नहीं है। अच्छी पैदावार के लिए नाइट्रोजन के साथ-साथ फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है।
यदि किसान केवल यूरिया का अधिक प्रयोग करते हैं तो शुरुआत में फसल हरी-भरी जरूर दिखाई देती है, लेकिन बाद में पौधों की मजबूती, दाना भरने की क्षमता और उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। अधिक यूरिया के कारण कीट और रोगों का प्रकोप भी बढ़ सकता है।
इसलिए कृषि विशेषज्ञ मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की सलाह देते हैं।
सही समय पर करें यूरिया का प्रयोग
बारिश के तुरंत बाद जब खेत में हल्की नमी हो और पानी जमा न हो, तब यूरिया का प्रयोग सबसे अधिक प्रभावी माना जाता है। यदि खेत में पानी भरा हो तो यूरिया का कुछ हिस्सा बह सकता है या नाइट्रोजन का नुकसान गैस के रूप में हो सकता है।
धान की फसल में यूरिया को अलग-अलग चरणों में विभाजित करके देना अधिक लाभकारी माना जाता है। इसी प्रकार मक्का, गन्ना और अन्य फसलों में भी अनुशंसित मात्रा को किस्तों में देने से पोषक तत्वों की उपयोग क्षमता बढ़ती है।
नीम–कोटेड यूरिया का बढ़ा महत्व
देश में अधिकांश यूरिया अब नीम-कोटेड रूप में उपलब्ध कराया जाता है। इससे नाइट्रोजन धीरे-धीरे निकलती है और पौधों को लंबे समय तक पोषण मिलता है। साथ ही नाइट्रोजन की बर्बादी कम होती है और उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ती है।
नीम-कोटेड यूरिया के उपयोग से बार-बार उर्वरक डालने की आवश्यकता भी कुछ हद तक कम हो सकती है। यही कारण है कि सरकार कई वर्षों से इसके उपयोग को बढ़ावा दे रही है।
डिजिटल निगरानी से बेहतर वितरण
हाल के वर्षों में उर्वरक वितरण प्रणाली में डिजिटल तकनीक का उपयोग बढ़ा है। पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीनों के माध्यम से किसानों को उर्वरक वितरण किया जा रहा है, जिससे वास्तविक बिक्री की निगरानी आसान हुई है। इससे कालाबाजारी और अनियमित वितरण पर भी काफी हद तक नियंत्रण मिला है।
मांग बढ़ने के दौरान डिजिटल डेटा के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि किन जिलों में अतिरिक्त स्टॉक भेजने की आवश्यकता है।
मौसम पर रहेगी आगे की नजर
यदि आने वाले दिनों में मानसून सामान्य या उससे बेहतर रहता है तो खरीफ फसलों का रकबा और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में यूरिया की मांग अगले कुछ सप्ताह तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती है। हालांकि लगातार भारी बारिश वाले क्षेत्रों में उर्वरक प्रबंधन अलग तरीके से करना होगा ताकि पोषक तत्वों का नुकसान कम हो।
विशेषज्ञ किसानों को मौसम के पूर्वानुमान को ध्यान में रखते हुए उर्वरक प्रबंधन की सलाह दे रहे हैं। तेज बारिश की संभावना होने पर यूरिया डालने से बचना चाहिए और बारिश थमने के बाद उचित नमी की स्थिति में इसका प्रयोग करना चाहिए।
निष्कर्ष
बारिश के बाद यूरिया की मांग में तेज उछाल खरीफ सीजन का सामान्य लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है। अच्छी बारिश के कारण किसानों ने तेजी से बुवाई की है और अब फसलों की प्रारंभिक वृद्धि के लिए नाइट्रोजन की आवश्यकता बढ़ रही है। सरकार आपूर्ति बनाए रखने के प्रयास कर रही है, वहीं कृषि विशेषज्ञ किसानों को केवल आवश्यकता के अनुसार यूरिया खरीदने और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की सलाह दे रहे हैं। यदि यूरिया का उपयोग सही समय, सही मात्रा और वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो न केवल उत्पादन बढ़ाया जा सकता है बल्कि उर्वरक की लागत कम करने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है।

