हिंदुस्तान उर्वरक और रसायन लिमिटेड (HURL) अपने कारोबार के विस्तार के अगले चरण की तैयारी कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, कंपनी ग्रीन यूरिया और कोल गैसीफिकेशन से जुड़े प्रोजेक्ट्स की फिजिबिलिटी जांच रही है। इसके साथ ही HURL अपने मौजूदा प्लांट्स में उपलब्ध सरप्लस अमोनिया का इस्तेमाल कर अमोनियम सल्फेट और NPK जैसे उर्वरकों के उत्पादन की संभावनाएं भी तलाश रही है। प्रस्तावों की फिजिबिलिटी स्टडी तैयार होने के बाद इन्हें आगे की समीक्षा के लिए भेजा जाएगा।
ग्रीन यूरिया और कोल गैसीफिकेशन पर नजर
HURL ने अपनी भविष्य की ग्रोथ रणनीति के लिए ग्रीन यूरिया और कोल गैसीफिकेशन को संभावित विस्तार क्षेत्रों के तौर पर चिन्हित किया है। कंपनी इन परियोजनाओं की तकनीकी और व्यावसायिक व्यवहार्यता की जांच कर रही है। फिजिबिलिटी स्टडी के जरिए यह आकलन किया जाएगा कि प्रस्तावित परियोजनाएं कंपनी के लिए कितनी व्यवहारिक और लाभदायक हो सकती हैं।
भारत में उर्वरक क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन को मजबूत करने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। ऐसे में HURL का विस्तार प्लान देश की उर्वरक उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
बरौनी में अमोनियम सल्फेट बनाने की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक, HURL अपनी बरौनी यूनिट में प्लांट से निकलने वाले सरप्लस अमोनिया का इस्तेमाल कर अमोनियम सल्फेट के उत्पादन की संभावना तलाश रही है। इसके लिए कंपनी फिलहाल फिजिबिलिटी स्टडी तैयार कर रही है।
अमोनियम सल्फेट को यूरिया के एक संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब किसी संकट के कारण यूरिया की आपूर्ति प्रभावित होती है। इसमें 21 प्रतिशत नाइट्रोजन और 24 प्रतिशत सल्फर होता है।
इसके मुकाबले यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है। इसलिए विशेषज्ञों के अनुसार, समान मात्रा में नाइट्रोजन उपलब्ध कराने के लिए यूरिया की तुलना में अमोनियम सल्फेट की अधिक मात्रा की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, इसमें मौजूद सल्फर इसे कुछ फसलों के लिए उपयोगी पोषक स्रोत बनाता है।
NBS के दायरे में आया अमोनियम सल्फेट
अमोनियम सल्फेट को पिछले रबी सीजन में केंद्र सरकार ने न्यूट्रिएंट-बेस्ड सब्सिडी यानी NBS व्यवस्था के तहत शामिल किया था। इससे किसानों के लिए इसकी उपलब्धता और कीमत को अधिक अनुकूल बनाने में मदद मिल सकती है।
अमोनियम सल्फेट में नाइट्रोजन के साथ सल्फर भी मौजूद होता है। इसे मिट्टी के लिए उपयोगी पोषक तत्व माना जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह यूरिया की तुलना में मिट्टी में नाइट्रोजन को धीरे-धीरे छोड़ता है।
यूरिया की आपूर्ति में संकट के दौरान वैकल्पिक नाइट्रोजन स्रोतों की जरूरत बढ़ सकती है। ऐसे में अमोनियम सल्फेट का उत्पादन बढ़ाना HURL के लिए नए कारोबारी अवसर के साथ-साथ उर्वरक पोर्टफोलियो में विविधता लाने का माध्यम बन सकता है।
सिंदरी में NPK उत्पादन की संभावना
HURL अपनी सिंदरी यूनिट में सरप्लस अमोनिया का इस्तेमाल कर NPK उर्वरक बनाने की संभावना भी तलाश रही है। NPK उर्वरक में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे प्रमुख पोषक तत्व होते हैं।
NPK को फसल के लिए संतुलित पोषण देने वाला उर्वरक माना जाता है। इसके अलग-अलग ग्रेड फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार इस्तेमाल किए जाते हैं। यूरिया मुख्य रूप से नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है, जबकि NPK के जरिए एक साथ कई प्रमुख पोषक तत्व दिए जा सकते हैं।
HURL के लिए NPK उत्पादन का प्रस्ताव कंपनी के मौजूदा संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में कदम हो सकता है। हालांकि, इस प्रस्ताव पर भी अंतिम फैसला फिजिबिलिटी स्टडी और आगे की समीक्षा के बाद ही लिया जाएगा।
NPK की कीमत तय करने में कंपनियों को अधिक आजादी
NPK उर्वरकों की कीमत व्यवस्था यूरिया से अलग है। NPK के कुछ हिस्से पर NBS व्यवस्था लागू होती है, जबकि कंपनियों को बाजार की परिस्थितियों और मांग के आधार पर अपने उत्पादों की कीमत तय करने की अधिक स्वतंत्रता होती है।
ऐसे में NPK उत्पादन HURL के लिए कारोबारी दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। कंपनी यदि अपने मौजूदा प्लांट से उपलब्ध अमोनिया का इस्तेमाल नए उत्पादों में करती है, तो उसे अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का अवसर मिल सकता है।
हालांकि, NPK की मांग, कच्चे माल की उपलब्धता और बाजार की कीमतें इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक होंगे। इन सभी पहलुओं का अध्ययन फिजिबिलिटी रिपोर्ट में किया जाएगा।
HURL की स्थापना 2016 में हुई
हिंदुस्तान उर्वरक और रसायन लिमिटेड की स्थापना वर्ष 2016 में हुई थी। यह NTPC, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL), कोल इंडिया (CIL), फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (FCIL) और हिंदुस्तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड (HFCL) का संयुक्त उपक्रम है।
कंपनी पिछले कुछ वर्षों में भारत की प्रमुख उर्वरक विनिर्माण कंपनियों में शामिल हुई है। HURL की तीन प्रमुख प्रमोटर कंपनियां CIL, NTPC और IOCL हैं। कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक, इन तीनों के पास संयुक्त रूप से 89 प्रतिशत इक्विटी शेयर हैं और तीनों की हिस्सेदारी बराबर है।
बाकी 11 प्रतिशत हिस्सेदारी FCIL और HFCL के पास है। इनकी हिस्सेदारी तीनों प्लांट लोकेशन पर उपलब्ध परिसंपत्तियों, अवसर लागत और लीज आधार पर जमीन के इस्तेमाल से जुड़ी व्यवस्था के आधार पर है।
गोरखपुर, बरौनी और सिंदरी में प्लांट
HURL वर्तमान में गोरखपुर, बरौनी और सिंदरी में प्राकृतिक गैस आधारित उर्वरक कॉम्प्लेक्स संचालित करती है। कंपनी इन इकाइयों के जरिए देश में उर्वरक उत्पादन को बढ़ावा दे रही है।
अब सरप्लस अमोनिया के इस्तेमाल से नए उत्पादों का उत्पादन करने की संभावनाएं तलाशना कंपनी की मौजूदा परिसंपत्तियों के बेहतर उपयोग की दिशा में कदम माना जा रहा है। बरौनी में अमोनियम सल्फेट और सिंदरी में NPK उत्पादन के प्रस्ताव इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
इसके अलावा ग्रीन यूरिया और कोल गैसीफिकेशन परियोजनाओं की फिजिबिलिटी की जांच से कंपनी भविष्य में अपने कारोबार को नए क्षेत्रों तक ले जाने की तैयारी कर रही है।
उर्वरक क्षेत्र में बदल रही रणनीति
भारत में उर्वरक क्षेत्र इस समय कई बदलावों से गुजर रहा है। एक तरफ यूरिया की मांग और आपूर्ति को लेकर दबाव रहता है, वहीं दूसरी तरफ संतुलित पोषक तत्वों के इस्तेमाल पर जोर बढ़ रहा है। किसानों को केवल नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों का इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही है।
ऐसे में अमोनियम सल्फेट और NPK जैसे उत्पादों की भूमिका बढ़ सकती है। अमोनियम सल्फेट नाइट्रोजन के साथ सल्फर उपलब्ध कराता है, जबकि NPK के जरिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संयोजन मिलता है।
HURL का प्रस्ताव इसी बदलते उर्वरक बाजार में अपने उत्पाद पोर्टफोलियो का विस्तार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।
फिजिबिलिटी स्टडी के बाद होगा अगला फैसला
HURL की प्रस्तावित परियोजनाएं अभी अध्ययन के चरण में हैं। कंपनी पहले इनके तकनीकी और व्यावसायिक पहलुओं का मूल्यांकन करेगी। इसके बाद प्रस्तावों को आगे की समीक्षा के लिए भेजा जाएगा।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमोनियम सल्फेट और NPK का व्यावसायिक उत्पादन कब शुरू होगा। इसी तरह ग्रीन यूरिया और कोल गैसीफिकेशन परियोजनाओं को लेकर भी अंतिम निर्णय फिजिबिलिटी स्टडी के परिणामों और आगे की मंजूरी पर निर्भर करेगा।
फिर भी, यदि ये परियोजनाएं आगे बढ़ती हैं तो HURL के उत्पाद पोर्टफोलियो में विस्तार के साथ देश के उर्वरक क्षेत्र में वैकल्पिक पोषक स्रोतों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
