भारत में सस्ती यूरिया ने हरित क्रांति से लेकर आज तक कृषि व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किसानों को कम कीमत पर नाइट्रोजन उर्वरक उपलब्ध कराने की नीति ने देश को खाद्यान्न की कमी वाले देश से दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में पहुंचाने में मदद की। लेकिन अब यही व्यवस्था सरकार के लिए बड़ी आर्थिक और कृषि संबंधी चुनौती बनती जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरक और ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, प्राकृतिक गैस की लागत और बढ़ती सब्सिडी ने सरकार के सामने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दूसरी तरफ, दशकों से सस्ती यूरिया के इस्तेमाल के आदी किसानों के लिए अचानक उर्वरक की खपत कम करना आसान नहीं है।
सरकार अब एक साथ कई मोर्चों पर काम कर रही है। एक ओर किसानों को पर्याप्त खाद उपलब्ध कराने और कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर अत्यधिक उर्वरक इस्तेमाल को कम करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और सब्सिडी के बढ़ते बोझ को नियंत्रित करने की रणनीति तैयार की जा रही है।
हरित क्रांति से शुरू हुई सस्ती यूरिया की कहानी
भारत में यूरिया सब्सिडी की शुरुआत 1960 के दशक के खाद्य संकट के दौर से जुड़ी है। उस समय देश खाद्यान्न के लिए आयात पर काफी निर्भर था। सरकार ने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए हरित क्रांति को अपनाया।
गेहूं और धान जैसी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में उन्नत बीज, सिंचाई और रासायनिक उर्वरकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें नाइट्रोजन उर्वरक, खासकर यूरिया, किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया। सरकार ने इसकी कीमतों को नियंत्रित रखा, ताकि किसानों को कम कीमत पर खाद उपलब्ध हो सके।
इस नीति का बड़ा फायदा यह हुआ कि किसानों की उर्वरक लागत कम रही और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ता गया। भारत धीरे-धीरे खाद्यान्न की कमी वाले देश से खाद्य अधिशेष वाले देश में बदल गया। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है। सस्ती उर्वरक व्यवस्था ने छोटे किसानों को भी सहारा दिया और खाद्य कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद की।
लेकिन इस व्यवस्था का दूसरा पहलू भी सामने आया है। जब किसी एक उर्वरक की कीमत अन्य पोषक तत्वों की तुलना में बहुत कम होती है, तो किसान उसकी ओर अधिक आकर्षित होते हैं। इससे खेत में पोषक तत्वों के असंतुलित इस्तेमाल की समस्या पैदा हो सकती है।
बाजार भाव और किसान की कीमत में बड़ा अंतर
भारत में यूरिया की कीमत और अंतरराष्ट्रीय बाजार की लागत के बीच बहुत बड़ा अंतर है। किसान 45 किलोग्राम यूरिया बैग के लिए सिर्फ 266.50 रुपये का भुगतान करते हैं। यह कीमत अप्रैल में सरकार द्वारा यूरिया खरीदने के लिए दिए गए एक टेंडर की लागत के दसवें हिस्से से भी कम बताई गई है।
यही अंतर सरकार की सब्सिडी व्यवस्था को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर सरकार किसानों के लिए यूरिया की कीमत उसी अनुपात में नहीं बढ़ाती। किसान को नियंत्रित कीमत पर खाद मिलती रहती है और बाजार मूल्य तथा किसान द्वारा चुकाई गई कीमत के बीच का अंतर सरकार को सब्सिडी के रूप में वहन करना पड़ता है।
पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण वैश्विक उर्वरक और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने से इस अंतर का बोझ और बढ़ा। स्रोत के अनुसार, अप्रैल के एक टेंडर में भारत ने युद्ध से पहले की कीमतों की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत चुकाई। साथ ही प्राकृतिक गैस की आयात लागत भी बढ़ी, जो घरेलू उर्वरक उत्पादन के लिए जरूरी कच्चा माल है।
तीन लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा सकता है सब्सिडी बिल
बढ़ती अंतरराष्ट्रीय लागत का सीधा असर भारत के उर्वरक सब्सिडी बिल पर पड़ रहा है। एक सरकारी अधिकारी के अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष में भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है, जबकि बजट में इसके लिए करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
यह अंतर सरकार के लिए गंभीर वित्तीय चुनौती है।
उर्वरक सब्सिडी का उद्देश्य किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराना है, लेकिन वैश्विक बाजार में लागत बढ़ने पर सरकार का खर्च तेजी से बढ़ जाता है। इससे राजकोष पर दबाव बढ़ता है और सरकार को अन्य क्षेत्रों के खर्च के साथ संतुलन बनाना पड़ता है।
ICRIER के जुलाई के अनुमान के मुताबिक, यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा चलता है और उर्वरक की मांग बढ़ती है, तो भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल 3.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। तनाव कम होने की स्थिति में भी यह खर्च 2.42 लाख करोड़ रुपये तक रहने का अनुमान लगाया गया है, जो बजट में तय राशि से करीब 40 फीसदी अधिक होगा।
सरकार के सामने सिर्फ खर्च नहीं, मिट्टी की सेहत भी चुनौती
उर्वरक सब्सिडी का मुद्दा केवल सरकारी खर्च तक सीमित नहीं है। लंबे समय से जरूरत से ज्यादा उर्वरक इस्तेमाल करने के कारण मिट्टी की सेहत को लेकर भी चिंता बढ़ रही है।
उद्योग अधिकारियों के अनुसार, कई किसान पैदावार बढ़ाने की उम्मीद में कृषि सलाह में बताई गई मात्रा से ज्यादा उर्वरक डालते हैं। लंबे समय तक ऐसा करने से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है।
अधिक नाइट्रोजन इस्तेमाल का असर केवल मिट्टी तक सीमित नहीं रहता। खेतों से बहकर जाने वाला पोषक तत्व भूजल और नदियों को प्रभावित कर सकता है। वहीं अतिरिक्त नाइट्रोजन से नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन बढ़ सकता है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए स्रोत में बताया गया है कि 2025-26 सीजन में देशभर में जांचे गए 90 लाख से अधिक मिट्टी के नमूनों में आधे से ज्यादा में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर कम पाया गया। ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी की उर्वरता का महत्वपूर्ण संकेतक है।
किसानों से रासायनिक खाद कम करने की अपील
सरकार ने किसानों के बीच उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को लेकर अभियान शुरू किया है। कृषि मंत्रालय ने जून तक देशभर में जागरूकता अभियान चलाया, जिसमें किसानों से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने की अपील की गई।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मिट्टी की जांच कराने पर जोर दिया। किसानों को बताया गया कि जरूरत से ज्यादा उर्वरक इस्तेमाल करने से लाभकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित हो सकते हैं, पैदावार घट सकती है और खेती की लागत बढ़ सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने की जरूरत पर जोर दिया है। मई में दिए एक भाषण में उन्होंने किसानों से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल आधे से भी कम करने की कोशिश करने की अपील की थी। इसका उद्देश्य आयातित कृषि इनपुट पर निर्भरता घटाने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाना भी है।
किसानों के लिए यूरिया कम करना आसान नहीं
सरकार की अपील के बावजूद किसानों के लिए यूरिया का इस्तेमाल अचानक कम करना आसान नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह फसल की पैदावार को लेकर जोखिम है।
भारत में औसत खेत का आकार एक हेक्टेयर यानी करीब 2.5 एकड़ से भी कम बताया गया है। छोटे खेतों पर निर्भर किसानों के लिए हर फसल की पैदावार महत्वपूर्ण होती है। यदि उन्हें लगता है कि उर्वरक कम करने से उत्पादन घट सकता है, तो वे प्रयोग करने से बच सकते हैं।
गेहूं और धान की सरकारी खरीद व्यवस्था तथा गन्ने की सुनिश्चित खरीद भी किसानों को इन फसलों की ओर बनाए रखती है। इन फसलों में नाइट्रोजन की मांग अपेक्षाकृत अधिक रहती है। इसलिए किसान केवल मिट्टी की दीर्घकालीन सेहत को ध्यान में रखकर अपनी वर्तमान उर्वरक रणनीति बदलने से हिचकते हैं।
स्टोनएक्स के फर्टिलाइजर वाइस प्रेसिडेंट जोश लिनविले के अनुसार, जब तक किसानों को उर्वरक इस्तेमाल कम करने के लिए कोई स्पष्ट बाध्यता नहीं होती, तब तक उनके लिए इसे कम करने का आर्थिक कारण सीमित रहेगा। किसान स्वाभाविक रूप से प्रति एकड़ अधिकतम पैदावार हासिल करना चाहते हैं।
पंजाब-हरियाणा में दिखी जमीनी चुनौती
पंजाब और हरियाणा में किसानों के सामने यह चुनौती साफ दिखाई देती है। इन राज्यों में धान और गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर होती है और यूरिया का इस्तेमाल लंबे समय से कृषि पद्धति का हिस्सा रहा है।
स्रोत में पंजाब के किसान सुखबीर राम और हरियाणा के किसान प्रेम चंद का उदाहरण दिया गया है। दोनों किसानों ने उर्वरक के अधिक इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत पर पड़ने वाले असर को लेकर आयोजित बैठकों में हिस्सा लिया।
कृषि वैज्ञानिकों और उर्वरक कंपनियों के अधिकारियों ने किसानों को बताया कि लंबे समय तक अत्यधिक उर्वरक इस्तेमाल करने से खेत की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है। लेकिन किसानों के लिए अगली फसल की पैदावार और आय अधिक तत्काल चिंता है।
सुखबीर राम ने बताया कि उन्होंने अपनी जमीन के कुछ हिस्से में यूरिया कम करने पर विचार किया था, लेकिन पहले की कोशिश में पैदावार घटने के कारण वह दोबारा सामान्य मात्रा में यूरिया इस्तेमाल करने की योजना बना रहे थे।
मांग कम करने की कोशिश के बीच सप्लाई पर भी नियंत्रण
उर्वरक की खपत को नियंत्रित करने की कोशिशों का असर कुछ क्षेत्रों में आपूर्ति पर भी दिखाई दे रहा है।
स्रोत में बताया गया है कि जुलाई और अगस्त बुवाई के लिहाज से महत्वपूर्ण महीने हैं। पंजाब के किसान सुखबीर राम ने बताया कि उन्हें अपनी धान की फसल के लिए प्रति एकड़ चार से पांच 45 किलोग्राम यूरिया बैग की जरूरत लगती है, लेकिन सहकारी आपूर्तिकर्ता से उन्हें प्रति एकड़ केवल तीन बैग मिले।
उनके अनुसार, सहकारी समिति को अधिक इस्तेमाल रोकने की कोशिश के तहत बिक्री सीमित करने का निर्देश दिया गया था। किसान ने बाकी जरूरत निजी डीलरों से पूरी करने की योजना बनाई।
यदि किसान को सहकारी व्यवस्था से पूरी जरूरत का यूरिया नहीं मिलता है, तो उसे निजी बाजार से अतिरिक्त खाद खरीदनी पड़ सकती है। इससे उसकी लागत बढ़ सकती है।
थोक खरीद पर भी लग रही रोक
हरियाणा के करनाल में भी एक उर्वरक खुदरा विक्रेता के सेल्स मैनेजर ने बिक्री को सीमित करने की बात कही। उनके अनुसार, कम आपूर्ति के बीच किसानों को बड़ी मात्रा में खाद खरीदने से रोका जा रहा था।
सरकार का तर्क है कि सब्सिडी वाले उर्वरक का डायवर्जन रोकना और राज्यों के बीच समान वितरण सुनिश्चित करना जरूरी है। उर्वरक मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में सब्सिडी वाले उर्वरक की खरीद पर सीमा तय की गई है। कुछ राज्यों में एक खरीदार को हर महीने 50 बैग तक खरीदने की सीमा का उल्लेख किया गया है।
यह व्यवस्था किसानों की जरूरत और उपलब्ध स्टॉक के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। हालांकि, अलग-अलग फसलों और खेतों की जरूरत अलग होने के कारण इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
40 जिलों में नया वितरण मॉडल
सरकार उर्वरक वितरण को किसान की वास्तविक जरूरत से जोड़ने के लिए 40 जिलों में एक नया वितरण ढांचा पायलट कर रही है।
इस मॉडल में किसान अपनी जमीन और बोई गई फसल के आधार पर उर्वरक की प्री-बुकिंग कर सकेंगे। इसके आधार पर खाद की सीमा तय करने की कोशिश होगी। उद्देश्य यह है कि उर्वरक की सप्लाई वास्तविक खेती की जरूरत के हिसाब से हो और अनावश्यक खरीद या डायवर्जन को रोका जा सके।
यदि यह मॉडल सफल होता है तो भविष्य में उर्वरक वितरण प्रणाली को अधिक डेटा आधारित बनाया जा सकता है। इससे सरकार को पहले से पता चल सकेगा कि किस जिले में किस फसल के लिए कितनी मात्रा में उर्वरक की जरूरत है।
सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी दे रही जोर
आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार घरेलू यूरिया उत्पादन क्षमता बढ़ाने की तैयारी कर रही है। स्रोत के अनुसार, सरकार ने एक नए कार्यक्रम को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य भारत की सालाना यूरिया उत्पादन क्षमता में 10 मिलियन टन की बढ़ोतरी के लिए निवेश आकर्षित करना है। यह मौजूदा क्षमता से करीब एक तिहाई अधिक बताया गया है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का असर कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस की उपलब्धता और उसकी लागत महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई अनिश्चितता
भारत का उर्वरक बाजार वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा हुआ है। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण उर्वरक और ऊर्जा के वैश्विक प्रवाह में बाधा आई है।
होर्मुज स्ट्रेट इस आपूर्ति व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्रोत के अनुसार, वैश्विक यूरिया शिपमेंट का करीब एक तिहाई और लिक्विफाइड नेचुरल गैस की लगभग पांचवीं हिस्सेदारी इस मार्ग से गुजरती है। इसलिए यहां लंबे समय तक व्यवधान रहने पर वैश्विक उर्वरक और ऊर्जा बाजार पर असर पड़ सकता है।
इंटरनेशनल फर्टिलाइजर एसोसिएशन की मार्केट इंटेलिजेंस डायरेक्टर लॉरा क्रॉस ने कहा कि चिंता केवल उर्वरक की उपलब्धता को लेकर नहीं है, बल्कि फसल में उर्वरक डालने की सही अवधि के दौरान उसकी समय पर डिलीवरी भी महत्वपूर्ण है।
वैश्विक कीमतें घटीं, लेकिन राहत अभी पक्की नहीं
वैश्विक उर्वरक कीमतें इस साल के उच्चतम स्तर से नीचे आई हैं। भारत के जून के एक टेंडर में कीमतें अप्रैल के स्तर से आधे से भी कम हो गई थीं। हालांकि, आगे यह गिरावट कितनी टिकाऊ रहती है, इस पर अनिश्चितता बनी हुई है।
यदि होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते व्यापार पूरी तरह सामान्य नहीं होता है, तो वैश्विक उर्वरक बाजार पर फिर दबाव बन सकता है। ऐसे में भारत के लिए आयात लागत और सब्सिडी दोनों बढ़ सकते हैं।
उर्वरक संकट का असर खाद्य महंगाई पर भी
उर्वरक की कीमत और उपलब्धता का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता। यदि समय पर खाद उपलब्ध नहीं होती या उसकी लागत बढ़ती है, तो फसल उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव खाद्य कीमतों पर पड़ने की संभावना रहती है।
स्रोत में नोमुरा की चीफ इकोनॉमिस्ट सोनल वर्मा के हवाले से कहा गया है कि वैश्विक उर्वरक आपूर्ति में कमी और इस सीजन में कम बारिश कृषि उत्पादन पर दबाव डाल सकती है और खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम पैदा कर सकती है।
इसलिए सरकार के लिए उर्वरक की कीमतों को नियंत्रित रखना सिर्फ किसानों की लागत कम करने का मामला नहीं है। यह खाद्य महंगाई और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
आगे क्या है सरकार के सामने?
भारत के सामने अब उर्वरक नीति में संतुलन बनाने की चुनौती है। किसानों को सस्ती और पर्याप्त खाद उपलब्ध कराना जरूरी है, लेकिन अत्यधिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था को लंबे समय तक जारी रखना भी मुश्किल होता जा रहा है।
सब्सिडी में अचानक कटौती करना किसानों के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है। वहीं इसे मौजूदा स्तर पर बनाए रखना सरकार के वित्तीय बोझ को बढ़ाता रहेगा। इसलिए सुधार का रास्ता धीरे-धीरे और किसान-केंद्रित होना जरूरी होगा।
मिट्टी परीक्षण, फसल आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, संतुलित एनपीके उपयोग और वैकल्पिक पोषक स्रोतों को बढ़ावा देने के साथ किसानों को यह भरोसा दिलाना भी जरूरी है कि उर्वरक कम करने का मतलब पैदावार कम करना नहीं है।
इसके लिए खेत स्तर पर प्रदर्शन और वैज्ञानिक सलाह की भूमिका बढ़ानी होगी।
सिर्फ सप्लाई बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं
ICRIER के विजिटिंग प्रोफेसर और संबंधित रिपोर्ट के सह-लेखक सच्चिदा नंद के अनुसार, सरकार ने संकट के दौरान सप्लाई सुनिश्चित करने की दिशा में अच्छा काम किया है, लेकिन मांग को मैनेज करना बड़ी चुनौती है। उनका मानना है कि मौजूदा संकट कठिन सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी गति पैदा कर सकता है।
यही भारत की उर्वरक नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। केवल ज्यादा यूरिया उपलब्ध कराना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया इस्तेमाल करता रहेगा तो सब्सिडी का बोझ, मिट्टी की सेहत और पर्यावरणीय दबाव तीनों बने रहेंगे।
दूसरी ओर, यदि सरकार बिना पर्याप्त तैयारी के उर्वरक उपलब्धता सीमित करती है, तो फसल की महत्वपूर्ण अवस्था में किसानों को परेशानी हो सकती है।
इसलिए भविष्य की नीति को आपूर्ति और मांग दोनों को ध्यान में रखकर बनाना होगा।
निष्कर्ष
भारत की उर्वरक नीति अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। दशकों से चली आ रही सस्ती यूरिया व्यवस्था ने देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में अहम योगदान दिया है, लेकिन बदलते वैश्विक बाजार, बढ़ती लागत और सब्सिडी के बढ़ते बोझ ने इस मॉडल की सीमाएं भी सामने ला दी हैं।
सरकार के सामने एक तरफ किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ अत्यधिक इस्तेमाल को रोकने और मिट्टी की सेहत बचाने की चुनौती है। पश्चिम एशिया में जारी संकट ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है।
40 जिलों में नया वितरण मॉडल, सब्सिडी वाले उर्वरक की खरीद पर सीमा और घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़ाने की योजना इस दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम हैं। लेकिन इन प्रयासों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों की वास्तविक जरूरतों को कितना ध्यान में रखा जाता है।
आखिरकार, भारत को ऐसी उर्वरक नीति की जरूरत है जिसमें किसान को समय पर खाद मिले, कीमत उसके लिए वहनीय रहे, सरकार का सब्सिडी बोझ नियंत्रित हो और मिट्टी की सेहत भी सुरक्षित रहे। केवल आपूर्ति बढ़ाने के बजाय उर्वरक के संतुलित और वैज्ञानिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना ही लंबे समय में अधिक टिकाऊ रास्ता साबित हो सकता है।
स्रोत में भी यही संकेत मिलता है कि केवल सप्लाई बढ़ाने और सरकारी हस्तक्षेप से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। यूरिया नीति में व्यापक सुधार की जरूरत है, ताकि कृषि, सरकारी वित्त और पर्यावरण—तीनों के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सके।

