देश में खरीफ सीजन 2026 की बुआई धीरे-धीरे गति पकड़ रही है, लेकिन 10 जुलाई 2026 तक के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि इस वर्ष कई प्रमुख खरीफ फसलों का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में अभी पीछे चल रहा है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, 10 जुलाई 2026 तक देश में कुल 531.25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक 632.69 लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी। यानी इस वर्ष अब तक 101.44 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में बुआई दर्ज की गई है। वहीं सामान्य औसत (2021-2025) की तुलना में भी बुआई 18.11 लाख हेक्टेयर कम रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई राज्यों में मानसून की शुरुआत धीमी रहने, कुछ क्षेत्रों में वर्षा के असमान वितरण तथा किसानों द्वारा पर्याप्त नमी का इंतजार करने के कारण बुआई प्रभावित हुई है। हालांकि जुलाई के दूसरे पखवाड़े में यदि अच्छी बारिश होती है तो खरीफ बुआई में तेजी आने की पूरी संभावना है।
चावल की बुआई में पिछड़ापन, लेकिन सामान्य औसत से आगे
देश की सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसल चावल की बुआई 10 जुलाई तक 114.69 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 125.53 लाख हेक्टेयर थी। इस प्रकार चावल की बुआई में 10.84 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।
हालांकि सकारात्मक बात यह है कि चावल का मौजूदा रकबा सामान्य औसत 97.74 लाख हेक्टेयर से लगभग 16.95 लाख हेक्टेयर अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि शुरुआती देरी के बावजूद चावल की खेती सामान्य स्तर से बेहतर बनी हुई है और आगामी सप्ताहों में इसमें और वृद्धि हो सकती है।
दालों की खेती में भी कमी
दालों की बुआई इस वर्ष अपेक्षाकृत धीमी रही है। कुल दालों का रकबा 56.63 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह 73.85 लाख हेक्टेयर था। यानी 17.22 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज हुई है।
दालों की प्रमुख फसलों की स्थिति इस प्रकार रही—
- अरहर : 19.54 लाख हेक्टेयर (पिछले वर्ष से 8.49 लाख हेक्टेयर कम)
- उड़द : 9.34 लाख हेक्टेयर (3.95 लाख हेक्टेयर कम)
- मूंग : 21.52 लाख हेक्टेयर (2.56 लाख हेक्टेयर कम)
- मोठ : 4.40 लाख हेक्टेयर (1.72 लाख हेक्टेयर कम)
हालांकि मूंग की बुआई सामान्य औसत से लगभग 3.17 लाख हेक्टेयर अधिक रही, जो किसानों की बढ़ती रुचि को दर्शाती है।
श्रीअन्न एवं मोटे अनाज का रकबा घटा
सरकार द्वारा श्रीअन्न (मिलेट्स) को बढ़ावा देने के बावजूद शुरुआती चरण में इनकी बुआई भी पिछले वर्ष से पीछे रही है। कुल मिलाकर श्रीअन्न एवं मोटे अनाज का रकबा 98.69 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले वर्ष यह 127.30 लाख हेक्टेयर था।
प्रमुख फसलों में—
- मक्का : 55.97 लाख हेक्टेयर
- बाजरा : 33.76 लाख हेक्टेयर
- ज्वार : 6.88 लाख हेक्टेयर
- रागी : 0.93 लाख हेक्टेयर
मक्का की विशेष बात यह रही कि इसका रकबा सामान्य औसत से थोड़ा अधिक रहा, जबकि बाजरा और ज्वार में पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
तिलहनों की बुआई में सबसे अधिक गिरावट
इस वर्ष सबसे अधिक असर तिलहनों पर दिखाई दिया है। कुल तिलहनों की बुआई 117.83 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष यह 149.18 लाख हेक्टेयर थी। यानी 31.34 लाख हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की गई।
प्रमुख तिलहनों की स्थिति—
- सोयाबीन : 90.51 लाख हेक्टेयर (17.21 लाख हेक्टेयर कम)
- मूंगफली : 23.40 लाख हेक्टेयर (12.05 लाख हेक्टेयर कम)
- तिल : 2.79 लाख हेक्टेयर
- सूरजमुखी : 0.86 लाख हेक्टेयर
विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य भारत के कई सोयाबीन उत्पादक क्षेत्रों में समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण किसान बुआई टाल रहे हैं। यदि आने वाले दिनों में बारिश सामान्य रहती है तो सोयाबीन का रकबा तेजी से बढ़ सकता है।
कपास की बुआई भी पिछड़ी
देश की प्रमुख नकदी फसल कपास की बुआई भी इस वर्ष अपेक्षा से कम रही है। 10 जुलाई तक 79.54 लाख हेक्टेयर में कपास बोई गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 93.95 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई थी।
कपास का मौजूदा रकबा सामान्य औसत से भी 16.28 लाख हेक्टेयर कम है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में बारिश की कमी तथा किसानों द्वारा नमी की प्रतीक्षा इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है।
गन्ना और जूट में सकारात्मक तस्वीर
जहां अधिकांश खरीफ फसलों में कमी देखने को मिली, वहीं गन्ना और जूट एवं मेस्ता की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही।
गन्ने का रकबा 57.58 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 0.86 लाख हेक्टेयर अधिक है। सामान्य औसत की तुलना में भी इसमें 2.36 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इसी प्रकार जूट एवं मेस्ता की बुआई 6.28 लाख हेक्टेयर में हुई, जो पिछले वर्ष और सामान्य औसत दोनों से बेहतर रही।
मौसम रहेगा निर्णायक
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ बुआई का बड़ा हिस्सा जुलाई के दूसरे और तीसरे सप्ताह में पूरा होता है। यदि इस अवधि में मानसून सक्रिय रहता है और प्रमुख कृषि राज्यों—मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ तथा पूर्वी भारत—में अच्छी वर्षा होती है, तो बुआई का अंतर काफी हद तक कम हो सकता है।
विशेष रूप से धान, सोयाबीन, मक्का, बाजरा और कपास जैसी फसलों की बुआई आने वाले दिनों में तेजी पकड़ने की संभावना है। कई राज्यों में कृषि विभाग किसानों को समय पर बीज, उर्वरक और तकनीकी सलाह उपलब्ध कराने के साथ-साथ मौसम आधारित कृषि परामर्श भी जारी कर रहे हैं।
किसानों के लिए क्या है संदेश?
कृषि वैज्ञानिक किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) तथा राज्य कृषि विभाग द्वारा जारी मौसम आधारित सलाह का पालन करें। जहां पर्याप्त वर्षा हो चुकी है वहां शीघ्र बुआई पूरी करें, जबकि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में नमी संरक्षण तकनीकों को अपनाएं। संतुलित उर्वरक उपयोग, प्रमाणित बीज और समय पर खरपतवार प्रबंधन से उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है।
आगे क्या?
केंद्रीय कृषि मंत्रालय आने वाले सप्ताहों में खरीफ बुआई की नियमित समीक्षा करेगा। यदि मानसून सामान्य रहता है तो जुलाई के अंत तक अधिकांश राज्यों में बुआई का रकबा तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। फिलहाल शुरुआती आंकड़े यह दर्शाते हैं कि खरीफ 2026 की शुरुआत पिछले वर्ष की तुलना में धीमी रही है, लेकिन मौसम की अनुकूलता के साथ आने वाले दिनों में स्थिति में सुधार की पूरी संभावना बनी हुई है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर वर्षा, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता और किसानों तक तकनीकी मार्गदर्शन की प्रभावी पहुंच से खरीफ सीजन 2026 के उत्पादन लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। किसानों और नीति निर्माताओं दोनों की नजर अब जुलाई के दूसरे पखवाड़े की वर्षा और बुआई की रफ्तार पर टिकी हुई है, जो पूरे खरीफ सीजन की दिशा तय करेगी।

