भारत में टिकाऊ (Sustainable) और पर्यावरण-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए बायोलॉजिकल एग्री-इनपुट्स का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। बायो-स्टिमुलेंट्स, बायोफर्टिलाइज़र और बायोपेस्टीसाइड्स जैसे उत्पाद किसानों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं क्योंकि ये मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने तथा फसल की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, इस क्षेत्र के तेज़ी से विस्तार के बीच एक बड़ी चुनौती सामने आ रही है—प्रशिक्षित (Trained) मैनपावर की कमी।
कृषि आयुक्त पी. के. सिंह ने कहा है कि यदि इस चुनौती का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो भारत की बायोलॉजिकल फार्म इनपुट्स को बड़े स्तर पर अपनाने और बायोपेस्टीसाइड्स के उत्पादन को बढ़ाने की योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
BASAI के कार्यक्रम में कृषि आयुक्त ने रखी चिंता
बुधवार को बायोलॉजिकल एग्री सॉल्यूशंस एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BASAI) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए कृषि आयुक्त पी. के. सिंह ने कहा कि भारत बायोलॉजिकल कृषि उत्पादों के क्षेत्र में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके लिए आवश्यक प्रशिक्षित तकनीकी मानव संसाधन पर्याप्त नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि आज कई कंपनियां बायो-स्टिमुलेंट्स, बायोफर्टिलाइज़र और बायोपेस्टीसाइड्स के उत्पादन में निवेश कर रही हैं, लेकिन इन उद्योगों को ऐसे विशेषज्ञों की आवश्यकता है जिन्हें माइक्रोबायोलॉजी, फर्मेंटेशन टेक्नोलॉजी और बायो-प्रोसेसिंग का अनुभव हो।
केमिकल इंडस्ट्री का अनुभव पर्याप्त नहीं
पी. के. सिंह ने स्पष्ट किया कि यह मान लेना गलत होगा कि रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी सीधे बायोलॉजिकल मैन्युफैक्चरिंग में काम कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि बायोलॉजिकल उत्पादों का निर्माण पूरी तरह अलग तकनीक पर आधारित होता है। इसमें सूक्ष्मजीवों (Microorganisms) की कल्चरिंग, फर्मेंटेशन, बायोलॉजिकल डिस्टिलेशन, गुणवत्ता नियंत्रण तथा जीवित सूक्ष्मजीवों की सुरक्षा जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।
इसके विपरीत, केमिकल उद्योग मुख्य रूप से रासायनिक संश्लेषण (Chemical Synthesis) पर आधारित होता है। इसलिए दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग प्रकार के कौशल और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
उनके अनुसार यही “स्ट्रक्चरल स्किल गैप” भविष्य में भारत के बायोलॉजिकल कृषि उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
ऑर्गेनिक खेती के शुरुआती अनुभवों से मिली सीख
पी. के. सिंह ने कहा कि भारत में ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के शुरुआती वर्षों में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने बताया कि कई किसानों ने जैविक खेती अपनाई, लेकिन जब उन्हें समय पर पर्याप्त जैविक इनपुट नहीं मिले या फसलों पर कीट एवं रोगों का दबाव बढ़ गया, तब उन्हें दोबारा रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों की ओर लौटना पड़ा।
इस अनुभव से यह स्पष्ट हुआ कि केवल जैविक खेती को बढ़ावा देना पर्याप्त नहीं है। किसानों को लगातार गुणवत्तापूर्ण जैविक उत्पाद, तकनीकी सलाह और बाज़ार समर्थन भी उपलब्ध कराना होगा।
इंटीग्रेटेड फार्मिंग अप्रोच ही सबसे व्यावहारिक समाधान
कृषि आयुक्त ने कहा कि पूरी तरह रसायन मुक्त खेती की बजाय इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट जैसे मॉडल अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ हैं।
उन्होंने कहा कि यदि रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का संतुलित उपयोग बायोलॉजिकल उत्पादों के साथ किया जाए तो किसान उत्पादन भी बनाए रख सकते हैं और पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को भी कम कर सकते हैं।
उनके अनुसार भविष्य की खेती का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें—
- रासायनिक उर्वरकों का विवेकपूर्ण उपयोग हो।
- बायोफर्टिलाइज़र और बायो-स्टिमुलेंट्स का अधिकतम उपयोग किया जाए।
- जैविक कीटनाशकों को प्राथमिकता दी जाए।
- मिट्टी की जैविक सक्रियता को बढ़ाया जाए।
- उत्पादन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जाए।
भारत में बायो–इनपुट्स की मांग कई गुना बढ़ सकती है
पी. के. सिंह ने इस क्षेत्र की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि भारत के लगभग 14 करोड़ किसान औसतन 2 से 2.5 टन प्रति हेक्टेयर बायोलॉजिकल इनपुट्स का उपयोग करना शुरू कर दें, तो देश में इनकी वार्षिक मांग 20 से 30 करोड़ टन तक पहुंच सकती है।
यह आंकड़ा वर्तमान उत्पादन क्षमता और उपलब्धता से कई गुना अधिक है।
इसका अर्थ है कि आने वाले वर्षों में भारत में—
- नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित करनी होंगी।
- माइक्रोबियल कल्चर उत्पादन बढ़ाना होगा।
- लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन मजबूत करनी होगी।
- गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं का विस्तार करना होगा।
- प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों की बड़ी संख्या तैयार करनी होगी
बायोफर्टिलाइज़र की मांग भी होगी विशाल
पी. के. सिंह ने कहा कि यदि प्रत्येक किसान नियमित रूप से बायोफर्टिलाइज़र का उपयोग करने लगे, तो देश में 100 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक बायोफर्टिलाइज़र की आवश्यकता हो सकती है।
हालांकि यह एक संभावित अनुमान है, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य में जैविक कृषि उत्पादों का बाजार अत्यंत विशाल बनने वाला है।
इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की उपलब्धता और किसानों तक उनकी पहुंच भी सुनिश्चित करनी होगी।
तेजी से बढ़ रहा है भारत का बायोलॉजिकल एग्री–इनपुट बाजार
कार्यक्रम में उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया कि भारत का बायोलॉजिकल कृषि इनपुट बाजार लगातार डबल डिजिट ग्रोथ दर्ज कर रहा है।
उद्योग संगठन BASAI के अनुसार इस दशक के अंत तक भारतीय बायोलॉजिकल एग्री-इनपुट बाजार का आकार 1.5 बिलियन डॉलर से अधिक होने की संभावना है।
इस तेज़ वृद्धि के पीछे कई प्रमुख कारण हैं—
- किसानों में जागरूकता बढ़ना।
- सरकार की सहायक नीतियां।
- रासायनिक अवशेष (Residue) मुक्त कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग।
- निर्यात बाजार की आवश्यकताएं।
- मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने की जरूरत।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की आवश्यकता।
प्राकृतिक और जैविक खेती का बढ़ता दायरा
देश में पिछले कुछ वर्षों में लाखों हेक्टेयर भूमि प्राकृतिक खेती और ऑर्गेनिक खेती के दायरे में लाई गई है।
कई राज्य प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं चला रहे हैं। किसानों को जैविक इनपुट तैयार करने, जैविक खाद बनाने तथा सूक्ष्मजीव आधारित उत्पादों के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुणवत्तापूर्ण बायो-इनपुट्स समय पर उपलब्ध कराए जाएं, तो प्राकृतिक खेती का विस्तार और तेज़ हो सकता है।
कौशल विकास होगा सफलता की कुंजी
पी. के. सिंह ने कहा कि भारत को केवल उत्पाद निर्माण पर ध्यान देने के बजाय स्किल डेवलपमेंट पर भी समान रूप से निवेश करना होगा।
उन्होंने सुझाव दिया कि—
- कृषि विश्वविद्यालयों में बायोलॉजिकल मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े विशेष पाठ्यक्रम शुरू किए जाएं।
- माइक्रोबायोलॉजी एवं बायोप्रोसेस इंजीनियरिंग में प्रशिक्षण बढ़ाया जाए।
- उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़े।
- युवाओं को बायोलॉजिकल कृषि उद्योग में रोजगार के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
- गुणवत्ता नियंत्रण विशेषज्ञों की नई पीढ़ी तैयार की जाए।
किसानों को क्या होगा लाभ?
यदि बायोलॉजिकल एग्री-इनपुट्स का बड़े पैमाने पर उपयोग बढ़ता है तो किसानों को कई महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं—
- रासायनिक उर्वरकों पर खर्च कम होगा।
- मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ेगी।
- पोषक तत्वों की उपलब्धता बेहतर होगी।
- पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी।
- कीटनाशकों के उपयोग में कमी आएगी।
- उत्पादन की गुणवत्ता सुधरेगी।
- निर्यात योग्य अवशेष-मुक्त कृषि उत्पादों का उत्पादन बढ़ेगा।
- लंबे समय में खेती अधिक टिकाऊ और लाभदायक बनेगी।
निष्कर्ष
भारत का कृषि क्षेत्र धीरे-धीरे रासायनिक आधारित खेती से संतुलित और जैविक समाधान आधारित खेती की ओर बढ़ रहा है। बायो-स्टिमुलेंट्स, बायोफर्टिलाइज़र और बायोपेस्टीसाइड्स आने वाले वर्षों में कृषि विकास के प्रमुख स्तंभ बन सकते हैं। हालांकि, इस परिवर्तन की सफलता केवल नई फैक्ट्रियां लगाने या उत्पादन बढ़ाने पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि प्रशिक्षित मानव संसाधन, वैज्ञानिक अनुसंधान, गुणवत्ता नियंत्रण और किसानों तक प्रभावी विस्तार सेवाएं पहुंचाने पर भी समान रूप से निर्भर करेगी।
कृषि आयुक्त पी. के. सिंह का यह संदेश स्पष्ट है कि यदि भारत को वैश्विक बायोलॉजिकल कृषि उद्योग में अग्रणी बनना है, तो तकनीकी कौशल, अनुसंधान, उद्योग और किसानों के बीच मजबूत समन्वय विकसित करना होगा। यही रणनीति देश को टिकाऊ कृषि, स्वस्थ मिट्टी और सुरक्षित खाद्य उत्पादन की दिशा में नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।

