भारत की उर्वरक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए Oman India Fertiliser Company (OMIFCO) ने भारत के साथ वर्ष 2031 तक हर वर्ष लगभग 10 लाख टन (1 मिलियन टन प्रति वर्ष) यूरिया की आपूर्ति जारी रखने का समझौता किया है। इस समझौते के तहत अगस्त 2026 से नियमित आपूर्ति शुरू होगी, जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की उपलब्धता और कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से काफी राहत मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता न केवल किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध कराने में मदद करेगा, बल्कि देश की दीर्घकालिक उर्वरक सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।
भारत को ओमान से उर्वरक सुरक्षा को मिलेगा बड़ा सहारा
भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता देश है। देश में कृषि उत्पादन बनाए रखने के लिए हर वर्ष बड़ी मात्रा में यूरिया की आवश्यकता होती है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने घरेलू यूरिया उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कई नए संयंत्र स्थापित किए हैं, लेकिन मांग और उत्पादन के बीच अभी भी अंतर बना हुआ है। यही कारण है कि भारत को हर वर्ष लाखों टन यूरिया का आयात करना पड़ता है।
ऐसे समय में ओमान से दीर्घकालिक आपूर्ति समझौता भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है OMIFCO?
Oman India Fertiliser Company (OMIFCO) ओमान के सूर (Sur) क्षेत्र में स्थित एक संयुक्त उद्यम (Joint Venture) है, जिसे भारत और ओमान के सहयोग से स्थापित किया गया था। इस परियोजना का उद्देश्य भारत को दीर्घकालिक आधार पर यूरिया और अमोनिया की आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
OMIFCO का उत्पादन मुख्य रूप से भारतीय बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है। भारत सरकार से जुड़ी कंपनियां इस परियोजना में भागीदार हैं, जिससे भारतीय किसानों के लिए उर्वरक आपूर्ति की स्थिरता बनी रहती है।
समझौते की मुख्य बातें
नए समझौते के अनुसार—
- वर्ष 2031 तक प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख टन यूरिया भारत को उपलब्ध कराया जाएगा।
- अगस्त 2026 से नियमित आपूर्ति प्रारंभ होगी।
- यह आपूर्ति दीर्घकालिक अनुबंध के तहत होगी।
- खरीफ और रबी दोनों मौसमों में यूरिया उपलब्धता बेहतर होने की संभावना है।
- भारत को वैश्विक स्पॉट मार्केट पर कम निर्भर रहना पड़ेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार दीर्घकालिक अनुबंधों से मूल्य अस्थिरता का जोखिम भी कम होता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता?
भारत की कृषि व्यवस्था यूरिया पर काफी हद तक निर्भर है। धान, गेहूं, मक्का, गन्ना और कई अन्य प्रमुख फसलों में नाइट्रोजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए यूरिया का व्यापक उपयोग होता है।
हालांकि भारत ने पिछले वर्षों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाई है, फिर भी मांग पूरी करने के लिए आयात आवश्यक बना हुआ है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक कीमतें बढ़ जाएं या आपूर्ति बाधित हो जाए तो किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में ओमान से दीर्घकालिक आपूर्ति भारत के लिए एक सुरक्षित विकल्प प्रदान करती है।
आयात आपूर्ति होगी अधिक स्थिर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतें प्राकृतिक गैस की लागत, भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री परिवहन और निर्यात नीतियों से प्रभावित होती हैं।
रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री मार्गों में व्यवधान जैसी घटनाओं ने पिछले वर्षों में वैश्विक उर्वरक बाजार को प्रभावित किया है।
ऐसी परिस्थितियों में यदि भारत के पास दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंध होते हैं, तो अचानक आपूर्ति संकट की संभावना काफी कम हो जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार OMIFCO समझौता इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित होगा।
खरीफ और रबी सीजन में किसानों को मिलेगा लाभ
भारत में यूरिया की सबसे अधिक मांग खरीफ और रबी मौसम में रहती है।
यदि समय पर पर्याप्त यूरिया उपलब्ध नहीं हो तो—
- बुवाई प्रभावित हो सकती है।
- फसल वृद्धि धीमी हो सकती है।
- उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
- किसानों को अतिरिक्त लागत उठानी पड़ सकती है।
ओमान से नियमित आपूर्ति होने पर वितरण व्यवस्था अधिक सुव्यवस्थित रह सकती है और किसानों को समय पर उर्वरक मिलने की संभावना बढ़ेगी।
वैश्विक बाजार की अनिश्चितता से मिलेगी राहत
यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस प्रमुख कच्चा माल है। जब अंतरराष्ट्रीय गैस कीमतें बढ़ती हैं तो यूरिया भी महंगा हो जाता है।
इसके अतिरिक्त—
- निर्यात प्रतिबंध,
- समुद्री मालभाड़ा,
- भू-राजनीतिक तनाव,
- मुद्रा विनिमय दर,
- ऊर्जा संकट
जैसे कारक भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।
दीर्घकालिक अनुबंध भारत को इन जोखिमों के प्रभाव से आंशिक सुरक्षा प्रदान करते हैं।
उर्वरक सब्सिडी पर भी पड़ सकता है सकारात्मक प्रभाव
भारत सरकार किसानों को रियायती दर पर यूरिया उपलब्ध कराने के लिए भारी उर्वरक सब्सिडी देती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतें बहुत अधिक बढ़ती हैं तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक और अपेक्षाकृत स्थिर आपूर्ति व्यवस्था से मूल्य जोखिम कम होने पर सब्सिडी प्रबंधन भी अधिक प्रभावी हो सकता है।
हालांकि अंतिम प्रभाव वैश्विक कीमतों और अनुबंध की वाणिज्यिक शर्तों पर निर्भर करेगा।
आत्मनिर्भरता की दिशा में पूरक कदम
भारत एक ओर नए यूरिया संयंत्र स्थापित कर घरेलू उत्पादन बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर विश्वसनीय देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते भी कर रहा है।
यह दोहरी रणनीति महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- घरेलू उत्पादन बढ़ेगा।
- आयात स्रोत विविध होंगे।
- आपूर्ति बाधित होने का जोखिम घटेगा।
- किसानों को लगातार उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
विशेषज्ञ इसे भारत की उर्वरक सुरक्षा नीति का संतुलित मॉडल मानते हैं।
भारत-ओमान संबंध होंगे और मजबूत
भारत और ओमान के बीच ऊर्जा, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में लंबे समय से सहयोग रहा है।
OMIFCO परियोजना दोनों देशों के आर्थिक संबंधों का प्रमुख उदाहरण है। नए समझौते से—
- द्विपक्षीय व्यापार को मजबूती मिलेगी।
- ऊर्जा एवं उर्वरक क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा।
- दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया के साथ ऐसे सहयोग भारत की खाद्य सुरक्षा रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
किसानों को क्या मिलेगा लाभ?
यदि आपूर्ति समय पर और पर्याप्त मात्रा में होती है, तो किसानों को कई प्रत्यक्ष लाभ मिल सकते हैं—
- यूरिया की बेहतर उपलब्धता।
- वितरण केंद्रों पर दबाव कम होने की संभावना।
- समय पर बुवाई और पोषण प्रबंधन।
- आपूर्ति संकट की आशंका में कमी।
- कृषि उत्पादन में स्थिरता।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल उपलब्धता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग अपनाना होगा ताकि मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहे।
संतुलित पोषण पर भी रहेगा जोर
कृषि वैज्ञानिक लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि केवल यूरिया के अधिक उपयोग से दीर्घकाल में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए किसानों को—
- यूरिया के साथ DAP, NPK और पोटाश का संतुलित उपयोग,
- सूक्ष्म पोषक तत्वों का समावेश,
- जैव उर्वरकों (Bio-fertilizers) का उपयोग,
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिशों का पालन
करना चाहिए।
यूरिया की बेहतर उपलब्धता का अर्थ यह नहीं है कि उसका अत्यधिक उपयोग किया जाए, बल्कि आवश्यकता के अनुसार वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करना ही बेहतर उत्पादन और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने का आधार है।
भविष्य की दिशा
भारत की बढ़ती आबादी और खाद्य सुरक्षा की आवश्यकताओं को देखते हुए उर्वरकों की मांग आने वाले वर्षों में बनी रहने की संभावना है। ऐसे में घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार, हरित अमोनिया और हरित यूरिया जैसी नई तकनीकों का विकास, तथा ओमान जैसे विश्वसनीय साझेदार देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते भारत की उर्वरक सुरक्षा रणनीति के महत्वपूर्ण स्तंभ बनेंगे।
OMIFCO के साथ वर्ष 2031 तक प्रतिवर्ष 10 लाख टन यूरिया आपूर्ति का यह समझौता भारत को वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं से आंशिक सुरक्षा प्रदान करेगा और खरीफ व रबी दोनों मौसमों में किसानों तक समय पर उर्वरक पहुंचाने में मददगार साबित हो सकता है। यदि इसके साथ संतुलित उर्वरक उपयोग, घरेलू उत्पादन वृद्धि और कुशल वितरण व्यवस्था को भी मजबूत किया जाए, तो यह समझौता भारतीय कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता और खाद्य सुरक्षा को नई मजबूती देने वाला कदम सिद्ध हो सकता है।

