भारत दुनिया की सबसे बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहां करोड़ों किसान फसल उत्पादन के लिए उर्वरकों पर निर्भर हैं। बढ़ती जनसंख्या, खाद्यान्न सुरक्षा की आवश्यकता और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लक्ष्य को देखते हुए देश में उर्वरकों की मांग लगातार बढ़ रही है। हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन यूरिया, फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों के साथ-साथ इनके कच्चे माल के लिए अभी भी बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
हाल ही में संसद में सरकार ने जानकारी दी कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत ने 32 लाख टन (3.2 मिलियन टन) से अधिक उर्वरकों का आयात किया है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि वैश्विक आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा से बचने के लिए विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय समझौतों (Long-Term Agreements) पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराना और कृषि उत्पादन को प्रभावित होने से बचाना है।
भारत में उर्वरकों का बढ़ता महत्व
हर वर्ष खरीफ और रबी दोनों मौसमों में उर्वरकों की भारी मांग रहती है। धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, दलहन, तिलहन और बागवानी फसलों की बेहतर पैदावार के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश आधारित उर्वरकों का संतुलित उपयोग आवश्यक है।
देश में यूरिया सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला उर्वरक है, जबकि डीएपी (DAP), एनपीके (NPK) और म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) का उपयोग भी लगातार बढ़ रहा है। सरकार किसानों को सब्सिडी के माध्यम से ये उर्वरक किफायती कीमतों पर उपलब्ध कराती है।
आयात क्यों आवश्यक है?
भारत ने घरेलू उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है, लेकिन फॉस्फेट और पोटाश के प्राकृतिक भंडार सीमित होने के कारण इन उर्वरकों और इनके कच्चे माल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। इसके अलावा गैस आधारित यूरिया संयंत्रों के लिए आवश्यक प्राकृतिक गैस (LNG) का भी महत्वपूर्ण हिस्सा आयातित है।
इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री परिवहन में व्यवधान या ऊर्जा संकट का सीधा प्रभाव भारत की उर्वरक आपूर्ति और लागत पर पड़ सकता है।
पहली तिमाही में 32 लाख टन से अधिक आयात
संसद में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत ने 32 लाख टन से अधिक उर्वरकों का आयात किया है। यह आयात देश की मौसमी मांग को पूरा करने और पर्याप्त बफर स्टॉक बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।
विशेषज्ञों के अनुसार खरीफ सीजन से पहले समय पर आयात होने से राज्यों में उर्वरकों की उपलब्धता बेहतर रहती है और किसानों को बुवाई के समय किसी प्रकार की कमी का सामना नहीं करना पड़ता।
दीर्घकालिक समझौतों पर सरकार का फोकस
हाल के वर्षों में सरकार ने केवल स्पॉट मार्केट पर निर्भर रहने के बजाय दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति समझौतों को प्राथमिकता दी है। इन समझौतों के माध्यम से भारत कई वर्षों तक निश्चित मात्रा में उर्वरक या कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है।
ऐसी व्यवस्था से वैश्विक बाजार में अचानक कीमत बढ़ने या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भी देश की जरूरतें पूरी करने में मदद मिलती है। यह रणनीति विशेष रूप से पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा संकट जैसी परिस्थितियों के बाद अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की रणनीति
सरकार उर्वरक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुआयामी रणनीति पर काम कर रही है। इसमें विभिन्न देशों से आयात स्रोतों का विस्तार, नए व्यापारिक समझौते, बंदरगाहों पर तेज़ लॉजिस्टिक व्यवस्था, घरेलू उत्पादन क्षमता में वृद्धि और पर्याप्त बफर स्टॉक का निर्माण शामिल है।
इसके साथ ही राज्यों में मांग के अनुसार उर्वरकों का अग्रिम आवंटन किया जाता है ताकि पीक सीजन में किसी क्षेत्र में कृत्रिम कमी की स्थिति न बने।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर
आयात निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई बंद पड़े यूरिया संयंत्रों को पुनर्जीवित किया है और नई उत्पादन परियोजनाओं को भी प्रोत्साहन दिया है।
नई गैस आधारित तकनीक, ऊर्जा दक्ष संयंत्रों और आधुनिक उत्पादन प्रणालियों के माध्यम से देश में यूरिया उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। सरकार का लक्ष्य दीर्घकाल में आयात पर निर्भरता कम करना और आत्मनिर्भर उर्वरक क्षेत्र विकसित करना है।
किसानों को कैसे मिलेगा लाभ?
मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और दीर्घकालिक आयात समझौतों का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलता है। समय पर उर्वरक उपलब्ध होने से बुवाई और फसल पोषण प्रभावित नहीं होता। साथ ही सब्सिडी व्यवस्था के कारण किसानों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का पूरा बोझ नहीं उठाना पड़ता।
यदि उर्वरकों की उपलब्धता नियमित बनी रहती है तो फसल उत्पादकता बढ़ती है, उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है और किसानों की आय पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
वैश्विक चुनौतियां अब भी बरकरार
हालांकि सरकार ने कई प्रभावी कदम उठाए हैं, फिर भी उर्वरक क्षेत्र पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं है। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, समुद्री परिवहन लागत, भू-राजनीतिक तनाव, प्राकृतिक गैस की उपलब्धता और प्रमुख निर्यातक देशों की नीतियां भविष्य में भी भारतीय बाजार को प्रभावित कर सकती हैं।
इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आयात बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि घरेलू कच्चे माल के विकल्प, हरित अमोनिया, हरित हाइड्रोजन आधारित उर्वरक उत्पादन और जैव उर्वरकों के उपयोग को भी बढ़ावा देना होगा।
संतुलित उर्वरक उपयोग की आवश्यकता
उर्वरकों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ सरकार संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर भी जोर दे रही है। केवल यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए डीएपी, एनपीके, पोटाश, सल्फर, सूक्ष्म पोषक तत्वों और जैव उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नैनो उर्वरक, डिजिटल निगरानी और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) जैसी पहलें भी उर्वरक क्षेत्र को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
आगे की राह
संसद में दी गई जानकारी से स्पष्ट है कि भारत सरकार उर्वरक आपूर्ति को लेकर दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाए हुए है। पहली तिमाही में 32 लाख टन से अधिक उर्वरकों का आयात और विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों पर बढ़ता जोर इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
आने वाले वर्षों में यदि घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार, आयात स्रोतों का विविधीकरण, आधुनिक लॉजिस्टिक्स, हरित उर्वरक तकनीकों का विकास और संतुलित उर्वरक उपयोग की नीति समान गति से आगे बढ़ती है, तो भारत न केवल अपनी खाद्य सुरक्षा को और मजबूत कर सकेगा बल्कि वैश्विक उर्वरक बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव का सामना भी अधिक प्रभावी ढंग से कर पाएगा। किसानों के लिए समय पर उर्वरकों की उपलब्धता, स्थिर कीमतें और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला ही देश की कृषि प्रगति की सबसे बड़ी आधारशिला बनी रहेगी।
