भारत में जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की गिरती उर्वरता और बढ़ती उत्पादन लागत कृषि क्षेत्र के सामने बड़ी चुनौतियां बनकर उभरी हैं। इन समस्याओं का समाधान खोजने के लिए कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और टिकाऊ खेती (Sustainable Agriculture) को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी दिशा में एवियो स्मार्ट मार्केट स्टैक लिमिटेड (ASMS), जिसे पहले बार्ट्रॉनिक्स इंडिया लिमिटेड के नाम से जाना जाता था, ने प्रोक्लाइम सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक महत्वपूर्ण रणनीतिक समझौता (MoU) किया है। इस साझेदारी का उद्देश्य बायोचार आधारित अगली पीढ़ी के मिट्टी सुधारक (Soil Enhancers) और उर्वरक समाधान विकसित करना तथा उन्हें व्यावसायिक स्तर पर किसानों तक पहुंचाना है।
यह पहल केवल कृषि उत्पादकता बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के नेट-ज़ीरो लक्ष्य, जलवायु परिवर्तन से मुकाबला, कार्बन उत्सर्जन में कमी और किसानों की आय बढ़ाने जैसे कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों को भी साथ लेकर चलती है।
क्या है यह साझेदारी?
ASMS और प्रोक्लाइम सर्विसेज मिलकर ऐसे बायोचार-आधारित उर्वरक और मिट्टी सुधारक विकसित करेंगे जो वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रमाणित होंगे। इन उत्पादों का उद्देश्य मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करना, जल संरक्षण क्षमता बढ़ाना, फसलों की उत्पादकता बढ़ाना और लंबे समय तक कार्बन को मिट्टी में सुरक्षित रखना है।
इस सहयोग में ASMS अपने मजबूत ग्रामीण नेटवर्क, कृषि विशेषज्ञता और फॉर्मूलेशन क्षमता का उपयोग करेगा, जबकि प्रोक्लाइम बायोचार उत्पादन, कार्बन प्रोजेक्ट डेवलपमेंट और जलवायु समाधान से जुड़ी अपनी विशेषज्ञता उपलब्ध कराएगा। दोनों कंपनियां मिलकर ऐसे उत्पाद तैयार करेंगी जो किसानों के लिए व्यावसायिक रूप से उपयोगी होने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी लाभकारी होंगे।
बायोचार क्या है?
बायोचार एक विशेष प्रकार का कार्बन-समृद्ध पदार्थ है, जिसे बांस, लकड़ी, कृषि अवशेष, पाइन नीडल, लैंटाना, सेना और अन्य जैविक पदार्थों को सीमित ऑक्सीजन में उच्च तापमान पर गर्म करके तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोलिसिस (Pyrolysis) कहा जाता है।
बायोचार को मिट्टी में मिलाने से कई महत्वपूर्ण लाभ मिलते हैं—
- मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।
- मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार होता है।
- पौधों को पोषक तत्व लंबे समय तक उपलब्ध रहते हैं।
- रासायनिक उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ती है।
- मिट्टी के सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में वृद्धि होती है।
- कार्बन लंबे समय तक मिट्टी में सुरक्षित रहता है, जिससे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर कम करने में मदद मिलती है।
इसी वजह से दुनिया भर में बायोचार को जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रभावी तकनीकों में शामिल किया जा रहा है।
वैज्ञानिक परीक्षणों पर रहेगा जोर
दोनों कंपनियां केवल उत्पाद विकसित नहीं करेंगी, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित भी करेंगी। इसके लिए आईआईटी रुड़की में प्रस्तावित प्रयोगशाला परीक्षण, विभिन्न राज्यों में फील्ड ट्रायल और अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में व्यापक परीक्षण किए जाएंगे।
इन परीक्षणों में अलग-अलग प्रकार की मिट्टी, विभिन्न फसलें और अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में बायोचार आधारित फॉर्मूलेशन का मूल्यांकन किया जाएगा। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों तक पहुंचने वाला उत्पाद प्रभावी, सुरक्षित और व्यावसायिक रूप से उपयोगी हो।
टिकाऊ फीडस्टॉक का होगा उपयोग
इस परियोजना में बांस, लैंटाना, सेना, पाइन नीडल और कृषि अवशेषों जैसे टिकाऊ जैविक स्रोतों से बायोचार तैयार किया जाएगा।
इसका एक बड़ा लाभ यह होगा कि खेतों में पराली और अन्य कृषि अवशेष जलाने की समस्या को कम किया जा सकेगा। कृषि अवशेषों का उपयोग मूल्यवान उत्पाद बनाने में होगा, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर भी मिल सकता है।
कार्बन क्रेडिट से किसानों की अतिरिक्त आय
इस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कार्बन क्रेडिट है।
जब किसान बायोचार आधारित खेती अपनाएंगे, तो मिट्टी में लंबे समय तक कार्बन सुरक्षित रहेगा। यदि इस प्रक्रिया का वैज्ञानिक सत्यापन किया जाता है, तो इसके आधार पर कार्बन क्रेडिट तैयार किए जा सकते हैं।
इन कार्बन क्रेडिट्स को भविष्य में अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कार्बन बाजारों में बेचा जा सकता है। इससे किसानों को फसल उत्पादन के अलावा अतिरिक्त आय का नया स्रोत मिल सकता है।
दुनिया के कई देशों में कार्बन फार्मिंग तेजी से लोकप्रिय हो रही है और भारत भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
ASMS की ग्रामीण पहुंच बनेगी बड़ी ताकत
ASMS की मौजूदगी देश के 5,000 से अधिक गांवों में है। कंपनी का किसानों और ग्रामीण समुदायों के साथ मजबूत नेटवर्क इस परियोजना की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है।
इसी नेटवर्क के माध्यम से बायोचार आधारित उत्पादों का प्रदर्शन, किसानों का प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान और उत्पादों का वितरण किया जाएगा। इससे नई तकनीक किसानों तक तेजी से पहुंच सकेगी।
दोनों कंपनियों ने क्या कहा?
ASMS के हेड – एग्री टेक बिजनेस, डॉ. राजा कृष्ण मूर्ति मोरला ने कहा कि आज कृषि क्षेत्र को ऐसे समाधान चाहिए जो उत्पादन बढ़ाने के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दें। उन्होंने कहा कि प्रोक्लाइम के साथ यह साझेदारी वैज्ञानिक अनुसंधान और ग्रामीण कृषि नेटवर्क को जोड़कर ऐसे उत्पाद विकसित करेगी जो मिट्टी को स्वस्थ बनाएंगे, फसलों की उत्पादकता बढ़ाएंगे और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करेंगे।
वहीं, प्रोक्लाइम सर्विसेज के चीफ मिशन ऑफिसर विजयकुमार रंगाराजू ने कहा कि बायोचार पुनर्योजी (Regenerative) खेती और कार्बन हटाने की सबसे प्रभावी तकनीकों में से एक है। उन्होंने विश्वास जताया कि ASMS के साथ यह सहयोग भारत में बायोचार आधारित कृषि को बड़े स्तर पर अपनाने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
किसानों को क्या होंगे लाभ?
यदि यह परियोजना सफल होती है तो किसानों को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है—
- मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार।
- सिंचाई के पानी की बचत।
- उर्वरकों के बेहतर उपयोग से लागत में कमी।
- फसल उत्पादन और गुणवत्ता में वृद्धि।
- कृषि अवशेषों का बेहतर उपयोग।
- कार्बन क्रेडिट के माध्यम से अतिरिक्त आय।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का बेहतर सामना।
भारत के नेट–ज़ीरो लक्ष्य में योगदान
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए कृषि क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
बायोचार तकनीक वातावरण से कार्बन को हटाकर लंबे समय तक मिट्टी में सुरक्षित रख सकती है। इसलिए इसे कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन (Carbon Sequestration) की प्रभावी तकनीक माना जाता है। यदि इसका बड़े पैमाने पर उपयोग होता है, तो यह भारत के जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
निष्कर्ष
ASMS और प्रोक्लाइम सर्विसेज के बीच हुई यह रणनीतिक साझेदारी भारतीय कृषि में नवाचार और जलवायु अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। बायोचार आधारित उर्वरक और मिट्टी सुधारक न केवल फसल उत्पादन और मिट्टी की सेहत में सुधार ला सकते हैं, बल्कि किसानों के लिए कार्बन क्रेडिट जैसी नई आय के अवसर भी पैदा कर सकते हैं।
यदि वैज्ञानिक परीक्षण और फील्ड ट्रायल सफल रहते हैं, तो यह पहल भारत में टिकाऊ खेती, बेहतर मिट्टी प्रबंधन, कृषि अवशेषों के उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक नई मिसाल बन सकती है। आने वाले वर्षों में यह मॉडल भारतीय कृषि को अधिक उत्पादक, लाभकारी और जलवायु अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

