देश में खरीफ सीजन के दौरान किसानों को उर्वरकों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार लगातार प्रयास कर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए वैश्विक आयात टेंडरों और घरेलू उत्पादन में वृद्धि के कारण यूरिया (Urea) की उपलब्धता फिलहाल संतोषजनक बनी हुई है। हालांकि, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) और अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों (Complex Fertilizers) की आपूर्ति अभी भी वैश्विक बाजार की परिस्थितियों से प्रभावित हो रही है। कच्चे माल की ऊंची कीमतें, सीमित अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति और भू-राजनीतिक तनाव के कारण डीएपी की उपलब्धता सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक बाजार में कीमतों और आपूर्ति की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो आगामी रबी सीजन में भी डीएपी की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती हो सकता है।
यूरिया की उपलब्धता क्यों है बेहतर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपभोक्ता देशों में शामिल है। खरीफ और रबी दोनों मौसमों में इसकी मांग सबसे अधिक रहती है। किसानों को किसी प्रकार की कमी का सामना न करना पड़े, इसके लिए केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
सरकार ने घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर वैश्विक आयात टेंडर भी जारी किए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और आयात एजेंसियों के माध्यम से समय पर यूरिया की खरीद की जा रही है, जिससे राज्यों में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध कराया जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि उर्वरक मंत्रालय ने मांग के अनुसार अग्रिम योजना बनाकर विभिन्न राज्यों में यूरिया का वितरण सुनिश्चित किया है। रेलवे, बंदरगाहों और वेयरहाउस नेटवर्क के बेहतर समन्वय से भी आपूर्ति प्रणाली मजबूत हुई है।
DAP पर क्यों बनी हुई है चुनौती?
यूरिया के विपरीत DAP की स्थिति अधिक जटिल है। भारत अपनी डीएपी आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है। डीएपी के उत्पादन में उपयोग होने वाले प्रमुख कच्चे माल—फॉस्फोरिक एसिड, रॉक फॉस्फेट और अमोनिया—का भी अधिकांश हिस्सा विदेशों से आता है।
वैश्विक बाजार में इन कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति में अनिश्चितता का सीधा असर भारत में डीएपी की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ता है।
विशेष रूप से चीन, मोरक्को, सऊदी अरब, जॉर्डन और अन्य प्रमुख निर्यातक देशों की निर्यात नीतियां भी भारतीय बाजार को प्रभावित करती हैं।
वैश्विक बाजार का असर
विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार कई कारणों से अस्थिर बना हुआ है।
- भू-राजनीतिक तनाव।
- प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतें।
- कच्चे माल की सीमित उपलब्धता।
- शिपिंग लागत में वृद्धि।
- निर्यात प्रतिबंध और वैश्विक मांग में तेजी।
इन कारणों से डीएपी और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें कई बार तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में भारत को आवश्यक मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए सरकार को अतिरिक्त प्रयास करने पड़ रहे हैं।
सरकार की रणनीति
सरकार डीएपी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते किए जा रहे हैं। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियों को समय पर आयात करने के निर्देश दिए गए हैं।
उर्वरक मंत्रालय राज्यों के साथ नियमित समीक्षा बैठकें कर उपलब्ध स्टॉक की निगरानी कर रहा है ताकि किसी भी क्षेत्र में कृत्रिम कमी न होने पाए।
कॉम्प्लेक्स उर्वरकों पर भी दबाव
केवल डीएपी ही नहीं बल्कि NPK और अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की उपलब्धता भी वैश्विक कच्चे माल पर निर्भर करती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में फॉस्फेट या पोटाश की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर इन उर्वरकों के उत्पादन और आपूर्ति पर भी पड़ता है।
इसी कारण सरकार किसानों को केवल डीएपी पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की सलाह दे रही है।
संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल डीएपी या यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कृषि के लिए दीर्घकाल में लाभदायक नहीं है।
सरकार PM-PRANAM, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, जैव उर्वरकों तथा संतुलित NPK उपयोग को बढ़ावा दे रही है ताकि किसानों की निर्भरता पारंपरिक उर्वरकों पर कम हो सके।
मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करने से लागत कम होती है और फसल उत्पादन भी बेहतर होता है।
किसानों के लिए क्या सलाह?
कृषि वैज्ञानिक किसानों को सलाह दे रहे हैं कि—
- आवश्यकता से अधिक यूरिया का प्रयोग न करें।
- मृदा परीक्षण के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करें।
- डीएपी के विकल्प के रूप में अनुशंसित NPK ग्रेड का उपयोग करें।
- जैव उर्वरकों और जैविक खाद को भी अपनाएं।
- अधिकृत विक्रेताओं से ही उर्वरक खरीदें।
इससे उत्पादन लागत कम होगी और मिट्टी का स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहेगा।
आगे क्या हो सकती है स्थिति?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में स्थिरता आती है और आयात सुचारु बना रहता है, तो डीएपी की उपलब्धता में सुधार हो सकता है।
हालांकि यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो सरकार को अतिरिक्त आयात, वैकल्पिक स्रोतों और घरेलू उत्पादन बढ़ाने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
निष्कर्ष
वर्तमान समय में भारत में यूरिया की उपलब्धता अपेक्षाकृत संतोषजनक है, जिसका श्रेय समय पर आयात, घरेलू उत्पादन और बेहतर वितरण व्यवस्था को जाता है। दूसरी ओर DAP और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की उपलब्धता अभी भी वैश्विक बाजार की परिस्थितियों पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में सरकार की रणनीति केवल आयात बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय समझौतों, संतुलित उर्वरक उपयोग और वैकल्पिक पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने पर भी केंद्रित है। यदि ये प्रयास प्रभावी ढंग से जारी रहते हैं, तो आने वाले कृषि सीजन में किसानों को उर्वरकों की उपलब्धता और अधिक स्थिर एवं सुरक्षित हो सकती है।

