देश में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, उत्पादन लागत में वृद्धि और पर्यावरणीय चुनौतियों को देखते हुए केंद्र सरकार PM-PRANAM (PM Programme for Restoration, Awareness, Nourishment and Amelioration of Mother Earth) योजना के माध्यम से संतुलित एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा दे रही है। इस योजना का उद्देश्य राज्यों को रासायनिक उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए प्रोत्साहित करना, जैविक और प्राकृतिक खेती का विस्तार करना तथा प्रिसिजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट (Precision Nutrient Management) जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है। सरकार का मानना है कि इससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहेगी, उर्वरक सब्सिडी का बोझ कम होगा और किसानों की आय में भी सुधार होगा।
क्यों शुरू की गई PM-PRANAM योजना?
भारत दुनिया में रासायनिक उर्वरकों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देशों में शामिल है। विशेष रूप से यूरिया का असंतुलित उपयोग लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। कई क्षेत्रों में किसान फसल की वास्तविक आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का प्रयोग करते हैं, जिससे मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है।
इसी समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने PM-PRANAM योजना की शुरुआत की। इसका प्रमुख उद्देश्य राज्यों को ऐसे प्रयासों के लिए प्रोत्साहित करना है जिनसे रासायनिक उर्वरकों की खपत कम हो और वैकल्पिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिले।
योजना का मुख्य उद्देश्य
PM-PRANAM योजना का मूल लक्ष्य केवल उर्वरक उपयोग कम करना नहीं है, बल्कि संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देना है। इसके तहत किसानों को यह समझाया जा रहा है कि फसल की आवश्यकता और मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग किया जाए।
योजना के प्रमुख उद्देश्य हैं—
- रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना।
- जैविक और प्राकृतिक खेती का विस्तार करना।
- मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाना।
- उर्वरक सब्सिडी पर सरकारी व्यय कम करना।
- पर्यावरण अनुकूल कृषि प्रणाली को बढ़ावा देना।
- किसानों की उत्पादन लागत घटाना।
राज्यों को मिल रहा प्रोत्साहन
PM-PRANAM योजना की एक विशेषता यह है कि इसमें राज्यों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई है।
यदि कोई राज्य रासायनिक उर्वरकों की खपत में कमी लाने में सफल होता है और उर्वरक सब्सिडी की बचत होती है, तो उस बचत का एक हिस्सा राज्य को प्रोत्साहन राशि के रूप में उपलब्ध कराया जाता है।
राज्य इस राशि का उपयोग कृषि अवसंरचना, जैविक खेती, प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य सुधार, कृषि यंत्रीकरण और किसानों के प्रशिक्षण जैसे कार्यों में कर सकते हैं।
संतुलित उर्वरक उपयोग पर विशेष जोर
सरकार किसानों को लगातार यह संदेश दे रही है कि केवल यूरिया का अधिक उपयोग करना फसल के लिए लाभदायक नहीं होता।
विशेषज्ञों के अनुसार फसलों को नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटाश (K) तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की संतुलित आवश्यकता होती है।
इसी कारण सरकार NPK आधारित संतुलित पोषण, सल्फर, जिंक और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग पर भी बल दे रही है।
प्रिसिजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट की भूमिका
PM-PRANAM योजना के तहत Precision Nutrient Management (PNM) को विशेष महत्व दिया जा रहा है।
इस तकनीक के माध्यम से किसान मृदा परीक्षण, ड्रोन, सेंसर, जीपीएस आधारित तकनीक तथा डिजिटल कृषि उपकरणों की सहायता से फसल की आवश्यकता के अनुसार सही मात्रा में उर्वरकों का उपयोग कर सकते हैं।
इससे—
- उर्वरकों की बर्बादी कम होती है।
- लागत घटती है।
- फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है।
- पर्यावरण पर दबाव कम पड़ता है।
जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा
सरकार PM-PRANAM के माध्यम से जैविक खेती और प्राकृतिक खेती को भी प्रोत्साहित कर रही है।
गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जैव उर्वरक, हरी खाद तथा सूक्ष्मजीव आधारित उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़े और भूमि की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहे।
प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड से जुड़ाव
PM-PRANAM योजना का संबंध मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) कार्यक्रम से भी है।
मृदा परीक्षण के आधार पर किसानों को यह जानकारी दी जाती है कि उनकी भूमि में किन पोषक तत्वों की कमी है और किस मात्रा में उर्वरक का प्रयोग किया जाना चाहिए।
इससे अनावश्यक उर्वरक उपयोग कम होता है और संतुलित पोषण सुनिश्चित होता है।
किसानों को होने वाले लाभ
योजना के प्रभावी क्रियान्वयन से किसानों को कई स्तरों पर लाभ मिलने की संभावना है—
- उर्वरकों पर खर्च कम होगा।
- मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहेगी।
- उत्पादन लागत घटेगी।
- बेहतर गुणवत्ता की फसल प्राप्त होगी।
- जल और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
- कृषि अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनेगी।
पर्यावरण संरक्षण में योगदान
विशेषज्ञों का मानना है कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से न केवल मिट्टी बल्कि भूजल और पर्यावरण भी प्रभावित होते हैं।
संतुलित उर्वरक उपयोग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, जल प्रदूषण में कमी तथा जैव विविधता के संरक्षण में भी सहायता मिल सकती है।
इसी कारण PM-PRANAM को भारत की सस्टेनेबल एग्रीकल्चर रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
भविष्य की दिशा
सरकार आने वाले वर्षों में PM-PRANAM के तहत डिजिटल कृषि, ड्रोन आधारित पोषक तत्व प्रबंधन, जैव उर्वरकों के उपयोग और प्राकृतिक खेती के विस्तार पर अधिक ध्यान देने की योजना बना रही है।
साथ ही राज्यों और कृषि विश्वविद्यालयों के सहयोग से किसानों को आधुनिक पोषक तत्व प्रबंधन तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
PM-PRANAM योजना केवल रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने की पहल नहीं है, बल्कि यह संतुलित पोषण, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग और टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि राज्यों, कृषि वैज्ञानिकों और किसानों के संयुक्त प्रयास से इस योजना का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो आने वाले वर्षों में भारत की कृषि अधिक उत्पादक, पर्यावरण-अनुकूल और आर्थिक रूप से मजबूत बन सकती है।

