Masoor Ki Kheti: मसूर भारत की प्रमुख रबी दलहनी फसलों में शामिल है। इसकी खेती कम पानी में भी की जा सकती है और दलहनी फसल होने के कारण यह फसल चक्र में उपयोगी मानी जाती है। सही समय पर बुवाई, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी और उचित फसल प्रबंधन अपनाकर किसान मसूर से बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
मसूर की खेती के लिए कैसी मिट्टी होनी चाहिए?
मसूर की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट से चिकनी दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा नहीं होना चाहिए। धान की कटाई के बाद बची हुई नमी वाले खेतों में भी कई क्षेत्रों में मसूर की खेती की जाती है। खेत तैयार करते समय मिट्टी को भुरभुरा और समतल रखना चाहिए। खाद और उर्वरक की मात्रा तय करने से पहले मिट्टी की जांच करवाना बेहतर रहता है।
भारत में मसूर की खेती कहां होती है?
भारत में मसूर की खेती मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में होती है। इसके अलावा झारखंड, राजस्थान, असम, ओडिशा, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में भी किसान मसूर उगाते हैं। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश देश के सबसे महत्वपूर्ण मसूर उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। (NCCD)
मसूर की बुवाई का सही समय क्या है?
मसूर मुख्य रूप से रबी की फसल है। सामान्य तौर पर इसकी बुवाई अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े से नवंबर के पहले पखवाड़े के बीच करना अच्छा माना जाता है। हालांकि सही समय क्षेत्र, तापमान, खेत में उपलब्ध नमी और चुनी गई किस्म के अनुसार थोड़ा बदल सकता है।
ICAR की क्षेत्रीय कृषि सलाह में भी कुछ क्षेत्रों के लिए मसूर की बुवाई नवंबर के पहले पखवाड़े तक पूरी करने की सलाह दी गई है। इसलिए किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की स्थानीय सिफारिश को प्राथमिकता दें।
कतार में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई और फसल की देखभाल आसान हो जाती है। ICAR की एक कृषि सलाह में मसूर के लिए करीब 12 किलो बीज प्रति एकड़ तथा बुवाई से पहले राइजोबियम कल्चर से बीज उपचार की सलाह दी गई है। यह मात्रा किस्म और क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है। (Indian Council of Agricultural Research)
मसूर की फसल में कीट लगने पर क्या करें?
मसूर की फसल में माहू जैसे रस चूसने वाले कीट तथा कुछ क्षेत्रों में फली और पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट दिखाई दे सकते हैं। किसानों को सबसे पहले खेत की नियमित निगरानी करनी चाहिए और प्रभावित पौधों की पहचान करनी चाहिए।
कीट दिखाई देते ही बिना पहचान के कीटनाशक का छिड़काव न करें। खेत में मित्र कीटों को बचाना, खरपतवार नियंत्रित रखना, उचित फसल चक्र अपनाना और आवश्यकता के अनुसार कृषि विशेषज्ञ से जैविक या अन्य सुरक्षित नियंत्रण उपाय पूछना बेहतर
नीचे आसान भाषा और SEO के हिसाब से तैयार आर्टिकल है। कीट नियंत्रण वाले हिस्से में सुरक्षित एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) पर जोर रखा गया है, क्योंकि कीटनाशक का चुनाव कीट, फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार होना चाहिए।
मसूर की खेती कैसे करें? जानें सही मिट्टी, बुवाई का समय, कीट प्रबंधन और सरकारी सब्सिडी
Masoor Ki Kheti: मसूर भारत की प्रमुख रबी दलहनी फसलों में शामिल है। इसकी खेती कम पानी में भी की जा सकती है और दलहनी फसल होने के कारण यह फसल चक्र में उपयोगी मानी जाती है। सही समय पर बुवाई, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी और उचित फसल प्रबंधन अपनाकर किसान मसूर से बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
मसूर की खेती के लिए कैसी मिट्टी होनी चाहिए?
मसूर की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट से चिकनी दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा नहीं होना चाहिए। धान की कटाई के बाद बची हुई नमी वाले खेतों में भी कई क्षेत्रों में मसूर की खेती की जाती है। खेत तैयार करते समय मिट्टी को भुरभुरा और समतल रखना चाहिए। खाद और उर्वरक की मात्रा तय करने से पहले मिट्टी की जांच करवाना बेहतर रहता है।
भारत में मसूर की खेती कहां होती है?
भारत में मसूर की खेती मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में होती है। इसके अलावा झारखंड, राजस्थान, असम, ओडिशा, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में भी किसान मसूर उगाते हैं। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश देश के सबसे महत्वपूर्ण मसूर उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। (NCCD)
मसूर की बुवाई का सही समय क्या है?
मसूर मुख्य रूप से रबी की फसल है। सामान्य तौर पर इसकी बुवाई अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े से नवंबर के पहले पखवाड़े के बीच करना अच्छा माना जाता है। हालांकि सही समय क्षेत्र, तापमान, खेत में उपलब्ध नमी और चुनी गई किस्म के अनुसार थोड़ा बदल सकता है।
ICAR की क्षेत्रीय कृषि सलाह में भी कुछ क्षेत्रों के लिए मसूर की बुवाई नवंबर के पहले पखवाड़े तक पूरी करने की सलाह दी गई है। इसलिए किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की स्थानीय सिफारिश को प्राथमिकता दें। (Indian Council of Agricultural Research)
कतार में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई और फसल की देखभाल आसान हो जाती है। ICAR की एक कृषि सलाह में मसूर के लिए करीब 12 किलो बीज प्रति एकड़ तथा बुवाई से पहले राइजोबियम कल्चर से बीज उपचार की सलाह दी गई है। यह मात्रा किस्म और क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है। (Indian Council of Agricultural Research)
मसूर की फसल में कीट लगने पर क्या करें?
मसूर की फसल में माहू जैसे रस चूसने वाले कीट तथा कुछ क्षेत्रों में फली और पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट दिखाई दे सकते हैं। किसानों को सबसे पहले खेत की नियमित निगरानी करनी चाहिए और प्रभावित पौधों की पहचान करनी चाहिए।
कीट दिखाई देते ही बिना पहचान के कीटनाशक का छिड़काव न करें। खेत में मित्र कीटों को बचाना, खरपतवार नियंत्रित रखना, उचित फसल चक्र अपनाना और आवश्यकता के अनुसार कृषि विशेषज्ञ से जैविक या अन्य सुरक्षित नियंत्रण उपाय पूछना बेहतर है।
यदि रासायनिक कीटनाशक की आवश्यकता पड़े तो किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विभाग या अधिकृत कृषि विशेषज्ञ से कीट की पहचान करवाकर केवल उस फसल और कीट के लिए पंजीकृत उत्पाद का लेबल के अनुसार इस्तेमाल करें। सुरक्षा उपकरण और लेबल पर दिए गए कटाई-पूर्व अंतराल का पालन भी जरूरी है।
मसूर की फसल पर सब्सिडी मिलती है क्या?
दलहनी फसलों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर उन्नत बीज, बीज मिनीकिट, प्रदर्शन, कृषि यंत्र और अन्य कृषि इनपुट से जुड़ी सहायता दी जाती है। मसूर किसान भी संबंधित राज्य और योजना की पात्रता के अनुसार इनका लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन सब्सिडी की राशि और पात्रता हर राज्य तथा वर्ष में समान नहीं होती। इसलिए किसान बुवाई से पहले अपने राज्य के कृषि विभाग, नजदीकी कृषि कार्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र से चालू योजनाओं की जानकारी जरूर लें।
मसूर किसानों के लिए जरूरी सलाह
मसूर की अच्छी पैदावार के लिए समय पर बुवाई करें, क्षेत्र के लिए अनुशंसित प्रमाणित बीज चुनें और खेत में पानी जमा न होने दें। बुवाई से पहले मिट्टी की जांच तथा अनुशंसित जैविक बीज उपचार फायदेमंद हो सकता है। फसल में रोग या कीट दिखाई देने पर अनुमान से दवा डालने के बजाय कृषि विशेषज्ञ से उसकी पहचान करवाएं।सही किस्म, समय पर बुवाई और संतुलित फसल प्रबंधन अपनाकर किसान कम पानी में भी मसूर की अच्छी फसल लेने की दिशा में काम कर सकते हैं।
मसूर की फसल पर सब्सिडी मिलती है क्या?
दलहनी फसलों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर उन्नत बीज, बीज मिनीकिट, प्रदर्शन, कृषि यंत्र और अन्य कृषि इनपुट से जुड़ी सहायता दी जाती है। मसूर किसान भी संबंधित राज्य और योजना की पात्रता के अनुसार इनका लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन सब्सिडी की राशि और पात्रता हर राज्य तथा वर्ष में समान नहीं होती। इसलिए किसान बुवाई से पहले अपने राज्य के कृषि विभाग, नजदीकी कृषि कार्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र से चालू योजनाओं की जानकारी जरूर लें।
मसूर किसानों के लिए जरूरी सलाह
मसूर की अच्छी पैदावार के लिए समय पर बुवाई करें, क्षेत्र के लिए अनुशंसित प्रमाणित बीज चुनें और खेत में पानी जमा न होने दें। बुवाई से पहले मिट्टी की जांच तथा अनुशंसित जैविक बीज उपचार फायदेमंद हो सकता है। फसल में रोग या कीट दिखाई देने पर अनुमान से दवा डालने के बजाय कृषि विशेषज्ञ से उसकी पहचान करवाएं। सही किस्म, समय पर बुवाई और संतुलित फसल प्रबंधन अपनाकर किसान कम पानी में भी मसूर की अच्छी फसल लेने की दिशा में काम कर सकते हैं।

