यूरिया खेती में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन उर्वरकों में से एक है। फसल की बढ़वार, पत्तियों का विकास और पौधे में हरापन बनाए रखने के लिए नाइट्रोजन बेहद जरूरी पोषक तत्व है। लेकिन यूरिया डालने का सही समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसकी सही मात्रा।
अक्सर किसान बारिश की संभावना देखते ही खेत में यूरिया डाल देते हैं। उनका मानना होता है कि बारिश के पानी के साथ यूरिया मिट्टी में घुल जाएगा और पौधों को नाइट्रोजन आसानी से मिल जाएगी। हल्की या सामान्य बारिश के मामले में यह तरीका उपयोगी हो सकता है, लेकिन यदि यूरिया डालने के तुरंत बाद तेज बारिश हो जाए तो स्थिति अलग हो सकती है।
तेज बारिश में मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन का कुछ हिस्सा पौधों की जड़ों के क्षेत्र से नीचे चला सकता है। इसके अलावा मिट्टी की स्थिति और पानी की मात्रा के आधार पर नाइट्रोजन के दूसरे रूपों में बदलने और वातावरण में नुकसान होने की संभावना भी रहती है। इससे किसान द्वारा डाला गया कुछ उर्वरक फसल के लिए अपेक्षित लाभ नहीं दे पाता।
यूरिया पौधे के लिए क्यों जरूरी है?
यूरिया में लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। नाइट्रोजन पौधों की पत्तियों और तनों की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। यह क्लोरोफिल के निर्माण में भी भूमिका निभाती है, जिसके कारण पौधों में हरा रंग दिखाई देता है और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बेहतर तरीके से चलती है।
जब फसल में नाइट्रोजन की कमी होती है तो अक्सर पुरानी पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और पौधे की बढ़वार धीमी हो सकती है। इसी वजह से किसान फसल में जरूरत के अनुसार यूरिया का इस्तेमाल करते हैं।
लेकिन नाइट्रोजन का मतलब यह नहीं है कि जितना ज्यादा यूरिया डाला जाएगा, फसल उतनी ही अच्छी होगी। फसल की जरूरत से अधिक यूरिया आर्थिक नुकसान के साथ मिट्टी और पर्यावरण पर भी असर डाल सकता है।
बारिश से पहले यूरिया डालने में समस्या क्या है?
यूरिया मिट्टी में पहुंचने के बाद कई प्रक्रियाओं से गुजरता है। पानी मिलने पर यह घुलता है और मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों तथा रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से नाइट्रोजन पौधों के लिए उपलब्ध रूपों में बदलती है।
यदि बारिश सामान्य मात्रा में होती है तो यूरिया मिट्टी में पहुंचकर पौधों के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन बहुत तेज बारिश होने पर खेत में पानी की मात्रा अचानक बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में नाइट्रोजन का कुछ हिस्सा जड़ों की सक्रिय परत से नीचे जा सकता है। इसे नाइट्रोजन का लीचिंग कहा जाता है। खासकर हल्की बनावट वाली मिट्टी और अधिक पानी की स्थिति में यह नुकसान ज्यादा हो सकता है।
लीचिंग क्या होती है?
जब पानी मिट्टी की ऊपरी परत से नीचे की ओर जाता है तो उसके साथ पानी में घुलनशील पोषक तत्व भी नीचे जा सकते हैं। इस प्रक्रिया को लीचिंग कहा जाता है।
नाइट्रोजन के कुछ रूप पानी में आसानी से घुल जाते हैं। यदि खेत में बहुत अधिक पानी चला जाए और नाइट्रोजन पौधों की जड़ों द्वारा इस्तेमाल करने से पहले नीचे चली जाए, तो फसल को उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर बारिश यूरिया को बर्बाद कर देती है। नुकसान की मात्रा मिट्टी, बारिश की तीव्रता, खेत में पानी की स्थिति, फसल की अवस्था और यूरिया डालने के समय जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।
सिर्फ नीचे जाना ही समस्या नहीं
नाइट्रोजन का नुकसान केवल मिट्टी के नीचे जाने तक सीमित नहीं है। मिट्टी में यूरिया बदलकर अमोनियम और फिर नाइट्रेट जैसे रूपों में आ सकता है। अलग-अलग परिस्थितियों में नाइट्रोजन का कुछ हिस्सा गैस के रूप में वातावरण में भी जा सकता है।
खासकर जब मिट्टी में पानी भर जाता है और हवा की कमी हो जाती है, तब नाइट्रोजन की कुछ मात्रा ऐसी गैसों के रूप में निकल सकती है जिन्हें पौधे दोबारा इस्तेमाल नहीं कर पाते।
इसलिए यूरिया का सही समय और सही तरीका अपनाना नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।
क्या बारिश से ठीक पहले कभी यूरिया डाल सकते हैं?
ऐसा कहना सही नहीं होगा कि बारिश से पहले कभी भी यूरिया नहीं डालना चाहिए। हल्की बारिश की संभावना हो और खेत की स्थिति उपयुक्त हो तो यूरिया का इस्तेमाल फसल के लिए फायदेमंद हो सकता है।
समस्या मुख्य रूप से भारी बारिश, जलभराव या लंबे समय तक खेत में पानी रहने की स्थिति में बढ़ती है।
इसलिए किसान को केवल आसमान में बादल देखकर यूरिया डालने के बजाय स्थानीय मौसम पूर्वानुमान, मिट्टी की नमी और फसल की जरूरत को ध्यान में रखना चाहिए।
यूरिया डालने का सही समय कैसे तय करें?
यूरिया की मात्रा और समय फसल के अनुसार अलग होता है। कई फसलों में नाइट्रोजन को एक बार में देने के बजाय अलग-अलग चरणों में देने की सलाह दी जाती है।
इससे पौधों को उनकी जरूरत के समय नाइट्रोजन मिल सकती है और एक साथ बहुत अधिक यूरिया डालने से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए धान और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों में नाइट्रोजन की आवश्यकता फसल की अलग-अलग अवस्थाओं में होती है। इसलिए किसान को स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और मिट्टी परीक्षण के आधार पर यूरिया की मात्रा तथा समय तय करना चाहिए।
खेत में पानी खड़ा हो तो क्या करें?
यदि भारी बारिश के बाद खेत में पानी खड़ा है तो ऐसी स्थिति में तुरंत यूरिया डालना सामान्यतः उचित नहीं माना जाता। पहले अतिरिक्त पानी की निकासी और खेत की स्थिति सामान्य होने पर ध्यान देना चाहिए।
जब खेत में अत्यधिक पानी भरा हो तो पौधों की जड़ों को भी पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती। ऐसे में केवल अधिक यूरिया डालने से फसल को फायदा नहीं होगा।
खेत की स्थिति सामान्य होने के बाद फसल की वास्तविक जरूरत का आकलन करके नाइट्रोजन की पूर्ति की जा सकती है।
यूरिया का सही इस्तेमाल किसान की लागत भी बचाता है
यूरिया का सही समय पर इस्तेमाल केवल फसल के लिए ही नहीं, किसान की जेब के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि बारिश के कारण डाला गया यूरिया पौधे को अपेक्षित मात्रा में नहीं मिल पाता तो किसान को बाद में दोबारा नाइट्रोजन देना पड़ सकता है।
इससे उर्वरक की लागत और श्रम दोनों बढ़ सकते हैं। इसलिए मौसम देखकर जल्दबाजी में यूरिया डालने के बजाय फसल की जरूरत और बारिश की संभावना को ध्यान में रखना अधिक बेहतर है।
संतुलित उर्वरक इस्तेमाल जरूरी
फसल के लिए केवल नाइट्रोजन ही पर्याप्त नहीं है। पौधों को फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी जरूरत होती है।
यदि किसान लगातार केवल यूरिया का इस्तेमाल करता है तो मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाना जरूरी है।
जैविक खाद, फसल अवशेष और अन्य जैविक पदार्थों का उचित इस्तेमाल भी मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद कर सकता है।
निष्कर्ष
बारिश से ठीक पहले यूरिया डालना हर स्थिति में गलत नहीं है, लेकिन तेज बारिश और जलभराव की संभावना होने पर नाइट्रोजन के नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है। पानी के साथ नाइट्रोजन का कुछ हिस्सा जड़ों की सक्रिय परत से नीचे जा सकता है और कुछ परिस्थितियों में नाइट्रोजन का पर्यावरण में भी नुकसान हो सकता है।
इसलिए किसान को यूरिया डालने से पहले मौसम का पूर्वानुमान, मिट्टी की नमी, बारिश की संभावना और फसल की अवस्था को ध्यान में रखना चाहिए। यूरिया की सही मात्रा को सही समय पर देना न केवल फसल की बढ़वार के लिए जरूरी है, बल्कि उर्वरक की लागत बचाने और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

