किसानों के बीच अक्सर यह धारणा रहती है कि खेत में जितना ज्यादा यूरिया डाला जाएगा, पौधे उतने ही हरे-भरे होंगे और फसल का उत्पादन भी उतना ही बढ़ेगा। लेकिन कृषि विज्ञान के अनुसार यह सोच हमेशा सही नहीं है। यूरिया नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत है और नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन इसकी जरूरत से ज्यादा मात्रा फसल के लिए नुकसानदायक भी हो सकती है।
पौधे को नाइट्रोजन एक निश्चित मात्रा में चाहिए। जब मिट्टी में पहले से पर्याप्त नाइट्रोजन मौजूद हो और किसान उसके ऊपर जरूरत से ज्यादा यूरिया डाल देता है, तो अतिरिक्त नाइट्रोजन का पूरा उपयोग पौधा नहीं कर पाता। इसका कुछ हिस्सा मिट्टी में अलग-अलग रूपों में चला जाता है या वातावरण में नुकसान हो सकता है।
इसलिए अच्छी पैदावार के लिए केवल अधिक यूरिया डालना जरूरी नहीं है। सही मात्रा, सही समय और फसल की वास्तविक पोषक तत्व जरूरत के अनुसार उर्वरक प्रबंधन अधिक महत्वपूर्ण है।
यूरिया में होती है 46 प्रतिशत नाइट्रोजन
सामान्य कृषि यूरिया में लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। नाइट्रोजन पौधों की पत्तियों, तनों और हरे भागों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह क्लोरोफिल के निर्माण और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के लिए भी जरूरी है।
जब फसल में नाइट्रोजन की कमी होती है तो पत्तियां पीली पड़ सकती हैं और पौधे की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि किसान फसल में नाइट्रोजन की कमी पूरी करने के लिए यूरिया का इस्तेमाल करते हैं।
लेकिन कमी पूरी करने और जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने में बड़ा अंतर है।
ज्यादा यूरिया से पौधे की अनावश्यक बढ़वार
जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन मिलने पर कुछ फसलों में पौधे का वानस्पतिक विकास बहुत अधिक हो सकता है। पौधा ज्यादा ऊंचा और पत्तेदार हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दाने, फल या बीज भी उसी अनुपात में बढ़ेंगे।
कई फसलों में पौधे की अत्यधिक हरी बढ़वार होने पर उसका संतुलन बिगड़ सकता है। उदाहरण के लिए अनाज वाली फसलों में बहुत अधिक नाइट्रोजन से पौधे की ऊंचाई और नरम बढ़वार बढ़ सकती है, जिससे कुछ परिस्थितियों में पौधों के गिरने का खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए केवल खेत को ज्यादा हरा देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि फसल निश्चित रूप से ज्यादा उत्पादन देगी।
ज्यादा नाइट्रोजन से पोषक तत्वों का असंतुलन
फसल को केवल नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती। पौधों के लिए फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक, आयरन, बोरॉन और दूसरे पोषक तत्व भी महत्वपूर्ण हैं।
यदि किसान लगातार केवल यूरिया पर ज्यादा निर्भर करता है तो मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन प्रभावित हो सकता है। पौधे को एक पोषक तत्व की अधिक मात्रा मिलने के बावजूद दूसरे जरूरी तत्वों की कमी रह सकती है।
इस स्थिति में खेत हरा दिखाई दे सकता है, लेकिन फसल की वास्तविक उत्पादकता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकती।
ज्यादा यूरिया का पैसा भी बेकार जा सकता है
जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने का सीधा असर किसान की लागत पर पड़ता है। यदि फसल अतिरिक्त नाइट्रोजन का उपयोग नहीं कर पाती तो किसान द्वारा खरीदा गया अतिरिक्त उर्वरक पूरी तरह उत्पादन में परिवर्तित नहीं होता।
इसलिए किसान के लिए बेहतर रणनीति यह है कि वह फसल की जरूरत के अनुसार ही यूरिया का इस्तेमाल करे। इससे उर्वरक की बचत होगी और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता भी बेहतर हो सकती है।
नाइट्रोजन का कुछ हिस्सा खेत से बाहर जा सकता है
पौधे द्वारा उपयोग नहीं की गई नाइट्रोजन खेत में हमेशा सुरक्षित नहीं रहती। मिट्टी और मौसम की परिस्थितियों के आधार पर नाइट्रोजन का कुछ हिस्सा पानी के साथ नीचे जा सकता है। इसे लीचिंग कहा जाता है।
विशेष रूप से भारी बारिश या अत्यधिक सिंचाई की स्थिति में घुलनशील नाइट्रोजन जड़ों के सक्रिय क्षेत्र से नीचे जा सकती है। इससे फसल को उस नाइट्रोजन का पूरा लाभ नहीं मिलता।
कुछ परिस्थितियों में नाइट्रोजन गैसीय रूप में भी वातावरण में जा सकती है। इस तरह जरूरत से ज्यादा यूरिया आर्थिक नुकसान के साथ पर्यावरणीय नुकसान का कारण भी बन सकता है।
मिट्टी की जांच क्यों जरूरी है?
यूरिया की सही मात्रा तय करने में मिट्टी की जांच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मिट्टी परीक्षण से खेत में मौजूद प्रमुख पोषक तत्वों की स्थिति का पता लगाने में मदद मिलती है।
यदि मिट्टी में पहले से पर्याप्त नाइट्रोजन या अन्य पोषक तत्व उपलब्ध हैं तो बिना जरूरत अतिरिक्त उर्वरक डालना उचित नहीं है।
मिट्टी की जांच के आधार पर फसल की जरूरत और उपलब्ध पोषक तत्वों को ध्यान में रखकर उर्वरक प्रबंधन किया जा सकता है।
यूरिया कब और कैसे डालें?
यूरिया को एक साथ बहुत अधिक मात्रा में डालने के बजाय फसल की जरूरत के अनुसार उचित समय पर देना कई परिस्थितियों में अधिक प्रभावी हो सकता है।
फसल की अवस्था, मिट्टी की नमी, मौसम, सिंचाई व्यवस्था और स्थानीय कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। बारिश से ठीक पहले या अत्यधिक पानी वाली स्थिति में यूरिया डालने से नाइट्रोजन के नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है।
इसलिए यूरिया डालने से पहले मौसम की स्थिति और खेत की नमी को देखना चाहिए।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन है बेहतर तरीका
अच्छी पैदावार के लिए केवल नाइट्रोजन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। फसल को सभी आवश्यक पोषक तत्व उचित अनुपात में चाहिए।
नाइट्रोजन के साथ फॉस्फोरस, पोटाश और आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद और अन्य जैविक पदार्थों का उचित इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद कर सकता है।
यही वजह है कि कृषि विशेषज्ञ संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर जोर देते हैं।
ज्यादा हरा खेत मतलब ज्यादा पैदावार नहीं
यूरिया डालने के बाद पौधे तेजी से हरे दिखाई देने लगते हैं। इससे किसान को लगता है कि यूरिया जितना ज्यादा डाला जाएगा, फसल उतनी ही अच्छी होगी।
लेकिन पौधे का हरा रंग मुख्य रूप से नाइट्रोजन की उपलब्धता से जुड़ा है, जबकि अंतिम उत्पादन कई कारकों पर निर्भर करता है। इसमें अच्छी किस्म, पानी, मिट्टी, मौसम, प्रकाश, पोषक तत्वों का संतुलन, कीट और रोग नियंत्रण तथा फसल प्रबंधन सभी की भूमिका होती है।
इसलिए केवल हरियाली को उत्पादन का पैमाना मानना सही नहीं है।
निष्कर्ष
ज्यादा यूरिया हमेशा ज्यादा उत्पादन की गारंटी नहीं देता। नाइट्रोजन फसल के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन पौधे की अनावश्यक बढ़वार, पोषक तत्वों के असंतुलन, उर्वरक की बर्बादी और कुछ परिस्थितियों में पर्यावरणीय नुकसान का कारण बन सकती है।
किसानों के लिए बेहतर तरीका यह है कि मिट्टी की जांच, फसल की जरूरत और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के आधार पर यूरिया की मात्रा तय की जाए। सही समय पर सही मात्रा में नाइट्रोजन देना ही अधिक उत्पादन के साथ उर्वरक की बचत और मिट्टी की सेहत के लिए बेहतर रणनीति है।

