Micro Irrigation : जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून, गिरते भूजल स्तर और खेती की बढ़ती लागत के बीच भारतीय कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, कम पानी में बेहतर उत्पादन हासिल करना। ऐसे समय में माइक्रो इरिगेशन यानी सूक्ष्म सिंचाई किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीक बनकर सामने आई है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी प्रणालियां खेत में पानी के इस्तेमाल को अधिक नियंत्रित बनाती हैं। इसका मकसद केवल पानी बचाना नहीं, बल्कि सिंचाई, खाद, श्रम और दूसरी लागत को बेहतर तरीके से प्रबंधित करते हुए फसल की उत्पादकता बढ़ाना भी है।
भारत में माइक्रो इरिगेशन का दायरा तेजी से बढ़ा है। जुलाई 2025 में लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, 2015-16 से 2025-26 तक Per Drop More Crop यानी PDMC के तहत करीब 102.56 लाख हेक्टेयर क्षेत्र माइक्रो इरिगेशन के दायरे में लाया जा चुका था। इसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की हिस्सेदारी प्रमुख रही। (Digital Sansad)
इसके बाद सरकारी आंकड़ों में और बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जुलाई 2026 में जारी सरकारी जानकारी के अनुसार, PDMC की शुरुआत से 110.92 लाख हेक्टेयर क्षेत्र माइक्रो इरिगेशन के तहत आ चुका है, जो भारत के नेट सॉन एरिया का करीब 7.98 प्रतिशत बताया गया है।
आखिर क्या है माइक्रो इरिगेशन?
सामान्य सिंचाई में किसान खेत में नाली, पाइप या दूसरे माध्यमों से बड़ी मात्रा में पानी छोड़ते हैं। इसमें पानी का कुछ हिस्सा पौधों तक पहुंचने से पहले बह सकता है या जमीन और वातावरण में नुकसान हो सकता है। माइक्रो इरिगेशन में पानी को जरूरत के अनुसार नियंत्रित मात्रा में फसल तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है।
इसके दो प्रमुख रूप हैं, ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर इरिगेशन।
ड्रिप इरिगेशन में पाइप और ड्रिपर की सहायता से पानी पौधों के जड़ क्षेत्र के आसपास कम मात्रा में पहुंचाया जाता है। यह प्रणाली बागवानी और कतार में लगाई जाने वाली कई फसलों के लिए उपयोगी हो सकती है।
स्प्रिंकलर इरिगेशन में पानी पाइपों के माध्यम से स्प्रिंकलर तक पहुंचता है और बारिश जैसी महीन बूंदों के रूप में खेत में फैलता है। खेत, फसल, मिट्टी, हवा और पानी की उपलब्धता के आधार पर उपयुक्त प्रणाली का चयन किया जाता है।
सरकार की Per Drop More Crop योजना का उद्देश्य भी खेत स्तर पर ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी माइक्रो इरिगेशन तकनीकों के जरिए जल उपयोग दक्षता बढ़ाना है। (Press Information Bureau)
माइक्रो इरिगेशन में कौन से राज्य आगे?
लोकसभा में जुलाई 2025 में पेश राज्यवार आंकड़े माइक्रो इरिगेशन की दिलचस्प तस्वीर दिखाते हैं। 2015-16 से 2025-26 तक PDMC के तहत कर्नाटक में करीब 23.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर हुआ और देश की कुल PDMC कवरेज में इसकी हिस्सेदारी लगभग 22.60 प्रतिशत रही।
इसके बाद तमिलनाडु में करीब 12.64 लाख हेक्टेयर, गुजरात में 12.64 लाख हेक्टेयर, महाराष्ट्र में 11.25 लाख हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में 10.55 लाख हेक्टेयर और राजस्थान में 9.56 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर किया गया था। (Digital Sansad)
इसी अवधि में उत्तर प्रदेश में करीब 4.96 लाख हेक्टेयर, मध्य प्रदेश में 4.37 लाख हेक्टेयर और तेलंगाना में 3.73 लाख हेक्टेयर क्षेत्र PDMC के माध्यम से माइक्रो इरिगेशन के तहत आया। (Digital Sansad)
इन आंकड़ों से साफ है कि माइक्रो इरिगेशन केवल दक्षिण या पश्चिम भारत तक सीमित तकनीक नहीं रह गई है। पानी की कमी वाले इलाकों से लेकर बागवानी प्रधान राज्यों तक अलग-अलग कृषि परिस्थितियों में किसान इसे अपना रहे हैं।
सरकार क्यों दे रही माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा?
भारत में कृषि जल की बड़ी उपभोक्ता है। दूसरी ओर, कई कृषि क्षेत्रों में भूजल पर दबाव बढ़ा है और मौसम का स्वरूप भी अनिश्चित होता जा रहा है। ऐसे में उपलब्ध पानी से अधिक कृषि उत्पादन हासिल करना भविष्य की खेती के लिए महत्वपूर्ण है।
केंद्र सरकार ने इसी दिशा में Per Drop More Crop (PDMC) कार्यक्रम को 2015-16 में शुरू किया था। 2015-16 से 2021-22 तक इसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के एक घटक के रूप में लागू किया गया। 2022-23 से इसे राष्ट्रीय कृषि विकास योजना से जोड़ा गया और सरकारी दस्तावेजों में अब इसे PM-RKVY के तहत लागू किए जाने का उल्लेख मिलता है।
31 जनवरी 2025 को जारी आर्थिक सर्वेक्षण से जुड़ी सरकारी जानकारी के अनुसार, FY2016 से FY2025 तक PDMC के तहत राज्यों को 21,968.75 करोड़ रुपये जारी किए गए थे और उस समय तक करीब 95.58 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर किया गया था। ि
किसानों को कितनी सब्सिडी मिलती है?
माइक्रो इरिगेशन लगाने में शुरुआती निवेश किसानों के लिए बड़ी चिंता हो सकता है। इसी वजह से PDMC के तहत सरकार आर्थिक सहायता उपलब्ध कराती है। सरकारी जानकारी के मुताबिक छोटे और सीमांत किसानों को निर्धारित यूनिट कॉस्ट का 55 प्रतिशत तथा अन्य किसानों को 45 प्रतिशत वित्तीय सहायता दी जाती है। कुछ राज्य अपनी तरफ से अतिरिक्त या टॉप-अप सब्सिडी भी उपलब्ध कराते हैं, जिससे किसान की हिस्सेदारी और कम हो सकती है। (Press Information Bureau)
सरकार की 2025 की जानकारी के मुताबिक PDMC के अंतर्गत माइक्रो इरिगेशन सिस्टम लगाने की सहायता प्रति लाभार्थी अधिकतम 5 हेक्टेयर तक सीमित है। (Press Information Bureau)
हालांकि किसान को वास्तविक सब्सिडी, पात्रता, स्वीकृत उपकरण और आवेदन प्रक्रिया जानने के लिए अपने राज्य के कृषि या उद्यान विभाग से मौजूदा नियमों की पुष्टि करनी चाहिए, क्योंकि राज्यों में अतिरिक्त सहायता और प्रक्रियाएं अलग हो सकती हैं।
किसान कैसे उठा सकते हैं योजना का फायदा?
सबसे पहले किसान को यह तय करना चाहिए कि उसकी फसल, मिट्टी, खेत का आकार और उपलब्ध जल स्रोत के अनुसार ड्रिप बेहतर रहेगा या स्प्रिंकलर। इसके लिए जिला कृषि विभाग, उद्यान विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र या संबंधित राज्य एजेंसी से तकनीकी सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
इसके बाद अपने राज्य में PDMC के तहत आवेदन की मौजूदा प्रक्रिया और पात्रता की जानकारी लेनी चाहिए। आवेदन स्वीकार होने और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद स्वीकृत मानकों के अनुरूप सिस्टम लगवाया जाता है।
यहां एक बात महत्वपूर्ण है। केवल सब्सिडी देखकर सिस्टम चुनना सही रणनीति नहीं है। किसान को फिल्टर, पाइप, ड्रिपर या स्प्रिंकलर की गुणवत्ता, पानी की गुणवत्ता, सिस्टम की क्षमता, खेत का दबाव और बिक्री के बाद मिलने वाली सेवा पर भी ध्यान देना चाहिए। खराब डिजाइन या समय पर रखरखाव नहीं होने से सिस्टम का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
पानी के साथ खाद की भी बचत
माइक्रो इरिगेशन का एक बड़ा लाभ फर्टिगेशन है। इसमें सिंचाई के पानी के साथ घुलनशील पोषक तत्व नियंत्रित तरीके से फसल तक पहुंचाए जा सकते हैं। इससे खाद को पूरे खेत में फैलाने के बजाय पौधों के जरूरत वाले क्षेत्र तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
कृषि मंत्रालय का कहना है कि माइक्रो इरिगेशन पानी बचाने के साथ फर्टिगेशन के माध्यम से उर्वरक उपयोग, श्रम खर्च और दूसरी इनपुट लागत को कम करने तथा किसानों की आय बढ़ाने में मदद करता है। (Press Information Bureau)
ICAR से जुड़े शोधकर्ताओं ने भी माइक्रो इरिगेशन को पानी की बचत के साथ उर्वरक, श्रम और अन्य इनपुट लागत घटाने तथा समान मात्रा में पानी से अधिक क्षेत्र की सिंचाई करने में उपयोगी बताया है। (Icar E-Pubs)
क्या वास्तव में बढ़ सकती है किसान की आमदनी?
माइक्रो इरिगेशन का फायदा केवल पानी की बचत में नहीं है। यदि सिंचाई सही समय और सही मात्रा में हो, तो फसल पर जल तनाव कम करने और उत्पादन को अधिक स्थिर बनाने में मदद मिल सकती है।
केंद्र सरकार द्वारा प्रकाशित जानकारी में NITI Aayog के 2020-21 के मूल्यांकन का हवाला देते हुए बताया गया है कि PDMC ने जल उपयोग दक्षता में 30 से 70 प्रतिशत तक सुधार और किसानों की आय में 10 से 69 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज करने में प्रभावी भूमिका निभाई। ये परिणाम अलग-अलग क्षेत्रों, फसलों और परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं, इसलिए इन्हें हर खेत के लिए निश्चित लाभ नहीं माना जाना चाहिए।
यही वजह है कि फल, सब्जी, गन्ना और दूसरी उपयुक्त फसलों में माइक्रो इरिगेशन को लेकर किसानों की दिलचस्पी बढ़ी है।
Micro Irrigation Fund से राज्यों को ताकत
किसानों के अलावा राज्यों को भी माइक्रो इरिगेशन का दायरा बढ़ाने के लिए वित्तीय संसाधनों की जरूरत होती है। इसी उद्देश्य से सरकार ने NABARD के साथ Micro Irrigation Fund यानी MIF बनाया।
शुरुआत में इसका कॉर्पस 5,000 करोड़ रुपये था। बाद में इसे बढ़ाकर 10,000 करोड़ रुपये करने की मंजूरी दी गई। इसका उद्देश्य राज्यों को PDMC के ऊपर अतिरिक्त प्रोत्साहन, टॉप-अप सहायता और माइक्रो इरिगेशन परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाने में मदद करना है। केंद्र सरकार राज्यों द्वारा लिए गए संबंधित ऋण पर 2 प्रतिशत ब्याज सहायता भी उपलब्ध कराती है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 से जुड़ी सरकारी जानकारी के अनुसार उस समय Micro Irrigation Fund के तहत 4,709 करोड़ रुपये के ऋण मंजूर और करीब 3,640 करोड़ रुपये वितरित किए जा चुके थे।
हर खेत के लिए एक जैसा समाधान नहीं
माइक्रो इरिगेशन के फायदे हैं, लेकिन इसे खेती की हर समस्या का अकेला समाधान मानना भी सही नहीं होगा। सिस्टम लगाने की शुरुआती लागत, पाइप और ड्रिपर का रखरखाव, फिल्टर की सफाई, पानी में मौजूद लवण या गंदगी के कारण क्लॉगिंग और समय पर मरम्मत जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।
स्प्रिंकलर सिस्टम पर तेज हवा का प्रभाव पड़ सकता है, जबकि ड्रिप में एमिटर बंद होने पर पौधे तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंचता। इसलिए किसानों के लिए प्रशिक्षण और नियमित रखरखाव उतना ही जरूरी है जितना सिस्टम खरीदना।
छोटे किसानों के लिए सामूहिक जल स्रोत, किसान उत्पादक संगठन यानी FPO के माध्यम से तकनीकी सेवाएं, स्थानीय स्तर पर मरम्मत सुविधा और गुणवत्तापूर्ण उपकरणों की उपलब्धता माइक्रो इरिगेशन की सफलता बढ़ा सकती है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में क्यों बढ़ेगी अहमियत?
मौसम की अनिश्चितता भारतीय कृषि के लिए आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती रहने वाली है। कभी लंबे समय तक बारिश न होना और कभी कम समय में अत्यधिक वर्षा जैसी परिस्थितियां किसानों की सिंचाई योजना को प्रभावित करती हैं।
ऐसे में माइक्रो इरिगेशन किसान को उपलब्ध पानी पर अधिक नियंत्रण देता है। सरकार भी इसे जल संरक्षण, बेहतर सिंचाई दक्षता, फसल उत्पादकता और कृषि की जलवायु सहनशीलता बढ़ाने वाली तकनीक के रूप में देख रही है।
ICAR के शोध में भी माइक्रो इरिगेशन को सिंचाई और फसल तीव्रता बढ़ाने, संसाधनों की बचत, खेती की लागत तथा उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव की संभावना वाली तकनीक बताया गया है। (Icar E-Pubs)
तकनीक से और स्मार्ट हो सकती है सिंचाई
भविष्य में माइक्रो इरिगेशन केवल ड्रिप पाइप और स्प्रिंकलर तक सीमित नहीं रहेगा। सेंसर, ऑटोमेशन, मौसम आधारित सिंचाई सलाह और IoT जैसी तकनीकों के साथ इसे और सटीक बनाया जा सकता है। जुलाई 2025 में कृषि मंत्रालय ने कृषि में AI और IoT आधारित प्रणालियों के इस्तेमाल को उत्पादकता, टिकाऊ खेती और किसानों की आजीविका सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया था।
मसलन, मिट्टी की नमी मापने वाले सेंसर से किसान यह समझ सकता है कि खेत को कब पानी की जरूरत है। यदि ऐसी तकनीक माइक्रो इरिगेशन से जुड़ती है तो भविष्य में सिंचाई कैलेंडर के बजाय वास्तविक जरूरत के आधार पर की जा सकती है।
माइक्रो इरिगेशन अपनाने से पहले किसान रखें इन बातों का ध्यान
किसान को सबसे पहले अपनी फसल, मिट्टी और पानी की गुणवत्ता की जांच करनी चाहिए। उसके बाद उपयुक्त सिस्टम और उसकी क्षमता तय करनी चाहिए। केवल कम कीमत देखकर उपकरण चुनने के बजाय गुणवत्ता और सर्विस नेटवर्क भी देखना जरूरी है।
ड्रिप सिस्टम में फिल्टर नियमित रूप से साफ करना, पाइपलाइन और एमिटर जांचना तथा पानी का दबाव सही रखना जरूरी है। स्प्रिंकलर में नोजल, दबाव और खेत में पानी के वितरण की नियमित जांच करनी चाहिए।
साथ ही किसान को स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से यह भी समझना चाहिए कि किस फसल में कितनी देर और कितने अंतराल पर सिंचाई करनी है। माइक्रो इरिगेशन का अर्थ लगातार पानी देना नहीं, बल्कि फसल की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार पानी देना है।
आने वाले समय में किसानों के लिए क्यों बन सकता है फायदे का सौदा?
भारत की खेती के सामने अब चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाने की नहीं है। चुनौती यह है कि कम पानी, सीमित संसाधन और बढ़ती लागत के बीच उत्पादन को टिकाऊ कैसे बनाया जाए।यही वह जगह है जहां माइक्रो इरिगेशन की भूमिका बढ़ सकती है। जुलाई 2025 तक PDMC के तहत 102.56 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर होने से लेकर 2026 में सरकारी आंकड़े में 110.92 लाख हेक्टेयर तक पहुंचना इस तकनीक के विस्तार को दिखाता है। लेकिन असली सफलता केवल आंकड़ों में क्षेत्र बढ़ाने से नहीं आएगी। किसानों को गुणवत्तापूर्ण उपकरण, समय पर सब्सिडी, स्थानीय तकनीकी सहायता, रखरखाव प्रशिक्षण और फसल के अनुसार सही सिंचाई सलाह भी उपलब्ध करानी होगी।
यदि इन पहलुओं पर एक साथ काम होता है तो माइक्रो इरिगेशन भारत में ‘हर बूंद से अधिक फसल’ के विचार को जमीन पर मजबूत कर सकता है। पानी की हर बूंद की कीमत बढ़ते समय में ऐसी तकनीक किसान की लागत कम करने, उत्पादन को अधिक स्थिर बनाने और सीमित जल संसाधनों पर दबाव घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इसलिए माइक्रो इरिगेशन को केवल एक सिंचाई तकनीक के तौर पर देखना अधूरा होगा। यह धीरे-धीरे भारतीय खेती में पानी के प्रबंधन, फर्टिगेशन, ऑटोमेशन और प्रिसीजन फार्मिंग को जोड़ने वाला आधार बन सकता है। किसान के लिए इसका सबसे बड़ा संदेश भी सीधा है, खेत में अधिक पानी पहुंचाना जरूरी नहीं, बल्कि सही समय पर सही जगह सही मात्रा में पानी पहुंचाना अधिक महत्वपूर्ण है।

