Women Agripreneurs: भारतीय कृषि में महिलाओं की भूमिका अब केवल खेत में बुवाई, निराई, कटाई या पशुपालन तक सीमित नहीं रह गई है। देश के ग्रामीण इलाकों में एक नया बदलाव दिखाई दे रहा है, जहां महिलाएं किसान के साथ-साथ कृषि उद्यमी, ड्रोन ऑपरेटर, स्वयं सहायता समूह की संचालक, खाद्य प्रसंस्करण कारोबारी, किसान उत्पादक संगठन यानी FPO की सदस्य और कृषि सेवा प्रदाता के रूप में अपनी पहचान बना रही हैं।
सरकारी आंकड़े भी इस बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं। मार्च 2026 तक केंद्र सरकार की 10,000 FPO योजना के तहत देश में 10,000 किसान उत्पादक संगठन पंजीकृत हो चुके थे। इनमें 1,175 FPO ऐसे हैं जिनकी सदस्यता 100 प्रतिशत महिलाओं की है। वहीं 23.55 लाख महिला किसान इस FPO नेटवर्क से जुड़ चुकी थीं।
महिला उद्यमिता की यह कहानी सिर्फ FPO तक सीमित नहीं है। स्वयं सहायता समूह यानी SHG, नमो ड्रोन दीदी, खाद्य प्रसंस्करण, जैविक खेती, पशुपालन, कृषि मशीनरी सेवाएं और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग जैसे क्षेत्रों में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से नया ग्रामीण कारोबारी मॉडल तैयार कर रही है।
10 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं का विशाल नेटवर्क
महिला कृषि उद्यमिता की सबसे मजबूत नींव स्वयं सहायता समूहों का नेटवर्क है। जुलाई 2026 में ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी जानकारी के मुताबिक, DAY-NRLM के तहत देश में करीब 92 लाख SHG बनाए जा चुके हैं, जिनसे लगभग 10.05 करोड़ ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हैं। इनके लिए वित्तीय साक्षरता, संस्थागत ऋण तक पहुंच और माइक्रो-एंटरप्राइज को बढ़ावा देने का काम भी किया जा रहा है।
इसी नेटवर्क से कृषि आधारित महिला उद्यमियों की नई पीढ़ी सामने आ रही है। कोई महिला समूह सब्जियों की सामूहिक खेती कर रहा है तो कोई मशरूम, डेयरी, पोल्ट्री, बकरी पालन, मसाले, अचार, मिलेट या दूसरे स्थानीय कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग और बिक्री से आय बढ़ा रहा है।
सरकार की लखपति दीदी पहल भी इसी बदलाव से जुड़ी है। इसका उद्देश्य SHG महिलाओं को कम से कम एक लाख रुपये की वार्षिक टिकाऊ आय हासिल करने में सक्षम बनाना है। 28 जुलाई 2026 को जारी सरकारी जानकारी के अनुसार DAY-NRLM के तहत 10.08 करोड़ ग्रामीण परिवार करीब 92 लाख SHG में संगठित हो चुके थे और 3.46 करोड़ से अधिक SHG सदस्य लखपति दीदी के रूप में सक्षम किए जा चुके थे।
ड्रोन दीदी ने कृषि में बनाई नई पहचान
महिला कृषि उद्यमिता के सबसे दिलचस्प उदाहरणों में नमो ड्रोन दीदी शामिल है। इसमें महिला SHG को कृषि कार्यों के लिए ड्रोन सेवा प्रदाता बनाने की व्यवस्था की गई है। केंद्र सरकार ने इस योजना के लिए 1,261 करोड़ रुपये का प्रावधान किया और 15,000 महिला SHG तक ड्रोन पहुंचाने का लक्ष्य रखा। चयनित महिला समूह किसानों को कृषि कार्यों, खासकर तरल उर्वरक और कीटनाशक के छिड़काव जैसी सेवाएं किराये पर उपलब्ध करा सकते हैं।
योजना में चयनित महिला SHG को ड्रोन पैकेज की लागत पर 80 प्रतिशत तक केंद्रीय वित्तीय सहायता, अधिकतम 8 लाख रुपये तक, देने का प्रावधान है। एक महिला सदस्य के लिए 15 दिन की ड्रोन पायलट ट्रेनिंग तथा दूसरी सदस्य या परिवार के सदस्य के लिए पांच दिन की ड्रोन असिस्टेंट ट्रेनिंग भी पैकेज का हिस्सा है।
इसका मतलब है कि गांव की महिला केवल तकनीक की उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि उसी तकनीक के जरिए कृषि सेवा का व्यवसाय चलाने वाली उद्यमी बन सकती है।
किन राज्यों में दिख रही ड्रोन दीदी की पहचान?
कृषि मंत्रालय द्वारा अगस्त 2025 में राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार उर्वरक कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराए गए 1,094 ड्रोन का उपयोग विभिन्न राज्यों में नैनो फर्टिलाइजर के छिड़काव के लिए किया जा रहा था।
इनमें सबसे ज्यादा संख्या कर्नाटक में 147, उत्तर प्रदेश में 135, आंध्र प्रदेश में 106, हरियाणा में 102, मध्य प्रदेश में 87 और तेलंगाना में 81 थी।
इसके अलावा महाराष्ट्र में 60, गुजरात में 58, पंजाब में 57, केरल में 51, तमिलनाडु में 44, राजस्थान में 36, बिहार में 32 और असम में 28 ड्रोन दीदी दर्ज थीं। ओडिशा में 16, छत्तीसगढ़ और झारखंड में 15-15, पश्चिम बंगाल में 14 तथा हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और गोवा में भी इस मॉडल की मौजूदगी दर्ज की गई। कुल मिलाकर यह सूची 22 राज्यों/केंद्रशासित क्षेत्रों तक इसकी पहुंच दिखाती है।
इससे साफ है कि कृषि में महिला आधारित तकनीकी उद्यमिता किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित प्रयोग नहीं रह गई है।
क्या ड्रोन आधारित कारोबार आर्थिक रूप से काम कर सकता है?
इस सवाल पर भी अध्ययन किया गया है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक, बेंगलुरु स्थित Agricultural Development and Rural Transformation Centre ने योजना के तहत दिए गए 500 ड्रोन के संचालन की आर्थिक और कारोबारी व्यवहार्यता का अध्ययन किया।
सरकार के अनुसार अध्ययन में पाया गया कि पहले मुख्य रूप से कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों में काम करने वाले महिला SHG ने ड्रोन मिलने के बाद आधुनिक कृषि तकनीक में कदम रखा। इससे समूहों की गतिविधियों में विविधता और ग्रामीण महिलाओं के लिए आय के नए अवसर बने। यानी ड्रोन को केवल मशीन के रूप में देखने के बजाय इसे गांव आधारित कृषि सेवा कारोबार के रूप में समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
एक महिला SHG अपने क्षेत्र के किसानों को आवश्यकता के अनुसार ड्रोन स्प्रे सेवा दे सकता है। इससे किसान को स्वयं महंगा ड्रोन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, जबकि SHG को सेवा शुल्क के रूप में आय का अवसर मिलता है।
किसानों को इससे क्या फायदा?
महिला कृषि उद्यमिता का फायदा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। इससे गांव में ही ऐसी सेवाएं और उत्पाद उपलब्ध हो सकते हैं जिनके लिए छोटे किसान को पहले बाहर जाना पड़ता था। ड्रोन सेवा इसका उदाहरण है। किसान पूरे ड्रोन में निवेश करने के बजाय स्थानीय सेवा प्रदाता से जरूरत के समय सेवा ले सकता है। सरकार ने भी योजना का उद्देश्य कृषि में दक्षता बढ़ाना, परिचालन लागत घटाना और फसल उत्पादन से जुड़ी तकनीक को बढ़ावा देना बताया है।
इसी तरह SHG या FPO यदि बीज, इनपुट, मशीनरी, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग या मार्केटिंग का काम सामूहिक रूप से करता है तो छोटे किसानों के लिए बाजार तक पहुंच आसान हो सकती है।
सबसे बड़ा लाभ aggregation यानी सामूहिक शक्ति का है। एक किसान के पास बेचने के लिए थोड़ी उपज हो सकती है, लेकिन सैकड़ों किसानों की उपज FPO के माध्यम से एकत्र होने पर बड़ी मात्रा तैयार होती है। इससे प्रोसेसिंग, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और बड़े खरीदारों तक पहुंच की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
FPO में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी
महिला किसानों के उद्यमी बनने की दिशा में FPO महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रहे हैं।
एक जनवरी 2026 तक केंद्र की 10,000 FPO योजना में कुल 56.32 लाख किसान पंजीकृत थे, जिनमें 21.96 लाख महिलाएं थीं। मार्च 2026 तक महिला सदस्यों की संख्या बढ़कर 23.55 लाख हो गई। साथ ही 1,175 FPO पूरी तरह महिला सदस्यों वाले दर्ज किए गए।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि FPO के माध्यम से महिला किसान खेती से आगे बढ़कर खरीद, संग्रह, मूल्य संवर्धन और बाजार से जुड़ी कारोबारी गतिविधियों में हिस्सेदारी कर सकती हैं।
ओडिशा का मॉडल भी बना उदाहरण
राज्यों में ओडिशा का Mission Shakti महिला SHG आधारित उद्यमिता का बड़ा उदाहरण है। राज्य सरकार के मुताबिक मिशन शक्ति के अंतर्गत करीब 70 लाख महिलाएं लगभग 6 लाख महिला स्वयं सहायता समूहों में संगठित हैं। कार्यक्रम का जोर महिलाओं को आय आधारित गतिविधियों, ऋण और बाजार से जोड़ने पर है। (Mission Shakti Odisha)
इन समूहों की आजीविका गतिविधियों में धान, गन्ना, प्याज, मूंगफली और सब्जी उत्पादन से लेकर जैविक खेती, मिलेट, हल्दी, मशरूम, मधुमक्खी पालन, डेयरी, बकरी पालन, पोल्ट्री, मसाला उत्पादन और जैविक खाद जैसी गतिविधियां शामिल हैं। (Mission Shakti Odisha)
यही मॉडल बताता है कि महिला कृषि उद्यमिता केवल फसल उगाने तक सीमित नहीं है। असली संभावना पूरी farm-to-market value chain में है।
फसल बेचने के बजाय प्रोसेसिंग से बढ़ सकती है कमाई
कृषि में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि किसान अक्सर कच्चा उत्पाद बेच देता है, जबकि उसका प्रसंस्करण और ब्रांडिंग करने वाला व्यवसाय ज्यादा मूल्य प्राप्त कर सकता है।महिला SHG इस अंतर को कम कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना यानी PMFME में खाद्य प्रसंस्करण में पहले से काम कर रहे पात्र SHG सदस्यों के लिए प्रति सदस्य 40,000 रुपये सीड कैपिटल का प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल कार्यशील पूंजी और छोटे उपकरणों की खरीद में किया जा सकता है। (Ministry of Food Processing Industries)
PMFME में One District One Product यानी ODOP दृष्टिकोण भी अपनाया गया है। योजना की आधिकारिक जानकारी के अनुसार ODOP को 35 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 713 जिलों के लिए मंजूरी दी गई थी। समूहों के लिए ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता का प्रावधान भी योजना में शामिल है। (PMFME)
इससे महिला समूह स्थानीय टमाटर को केवल टमाटर के रूप में बेचने के बजाय सॉस या दूसरे प्रसंस्कृत उत्पाद, हल्दी को पैक मसाले, दूध को पनीर या अन्य डेयरी उत्पाद और मोटे अनाज को पैक खाद्य उत्पाद के रूप में बाजार में उतारने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
किसान कैसे उठा सकते हैं इस बदलाव का फायदा?
किसानों के लिए पहला कदम अपने गांव या ब्लॉक में सक्रिय SHG, FPO, राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन या कृषि विभाग से संपर्क करना हो सकता है। किसान यह पता कर सकते हैं कि उनके इलाके में कौन से FPO काम कर रहे हैं और क्या महिला SHG कृषि सेवा, ड्रोन स्प्रे, प्रोसेसिंग या सामूहिक मार्केटिंग उपलब्ध करा रहे हैं।
दूसरा रास्ता सामूहिक खरीद और बिक्री है। छोटे किसानों के लिए अकेले मशीन, स्टोरेज या प्रोसेसिंग यूनिट में निवेश करना कठिन हो सकता है। समूह आधारित मॉडल में लागत और संसाधनों को साझा करने की संभावना बनती है।
तीसरा रास्ता परिवार की महिला सदस्यों को केवल खेत मजदूर के रूप में देखने के बजाय व्यवसाय में औपचारिक भागीदार बनाने का है। वे SHG या FPO से जुड़कर प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, अकाउंटिंग, डिजिटल मार्केटिंग, मशीन संचालन या कृषि सेवा कारोबार में जिम्मेदारी ले सकती हैं।
बाजार सबसे महत्वपूर्ण कड़ी
उत्पादन बढ़ा लेना पर्याप्त नहीं है। महिला उद्यमियों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि तैयार उत्पाद बिकेगा कहां? इसी दिशा में ग्रामीण विकास मंत्रालय SHG उत्पादों के लिए SARAS, SARAS Aajeevika और Aajeevika जैसे ब्रांड और मेलों के जरिए बाजार पहुंच मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।
मई 2026 में मंत्रालय ने SHE-MARTs यानी Self Help Entrepreneurs-Marketing Avenues for Rural Transformation के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा भी शुरू की, जिसका उद्देश्य महिला आधारित ग्रामीण उद्यमों के मार्केटिंग इकोसिस्टम को मजबूत करना है। इसका अगला चरण तभी सफल होगा जब गांव में उत्पादन करने वाली महिला को स्थानीय मंडी के साथ शहर, रिटेल, संस्थागत खरीदार और डिजिटल बाजार तक भी पहुंच मिले।
भविष्य में क्यों फायदे का सौदा बन सकती है महिला कृषि उद्यमिता?
भारतीय कृषि का भविष्य केवल अधिक उत्पादन में नहीं, बल्कि कम लागत, तकनीक, प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और बेहतर बाजार में छिपा है। इन सभी क्षेत्रों में महिला SHG और FPO की भूमिका बढ़ सकती है।
ड्रोन जैसी तकनीक गांवों में नए प्रकार के रोजगार पैदा कर सकती है। फूड प्रोसेसिंग खेत की उपज में मूल्य जोड़ सकती है। FPO छोटे किसानों को सामूहिक ताकत दे सकते हैं। SHG ग्रामीण परिवारों को संस्थागत वित्त और छोटे कारोबार की दिशा में ले जा सकते हैं।
सरकार ने सितंबर 2024 में 2,817 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ Digital Agriculture Mission को भी मंजूरी दी थी, जिसमें AgriStack, Krishi Decision Support System और डिजिटल कृषि से जुड़े दूसरे ढांचे शामिल हैं। इसलिए आने वाले वर्षों में महिला कृषि उद्यमी की भूमिका खेती और डिजिटल तकनीक के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। केवल योजना घोषित कर देना महिला उद्यमिता की सफलता की गारंटी नहीं है। मशीनों की मरम्मत, नियमित प्रशिक्षण, कार्यशील पूंजी, स्थानीय स्तर पर पर्याप्त ग्राहक, उत्पाद की गुणवत्ता, पैकेजिंग, लाइसेंसिंग और बाजार तक पहुंच जैसी चुनौतियां बनी रहती हैं।
ड्रोन कारोबार में भी मशीन उपलब्ध कराने के साथ नियमित काम मिलना जरूरी है। इसी कारण योजना में राज्य स्तर पर ऐसे क्लस्टर चुनने, ड्रोन की मांग का आकलन करने और चयनित SHG के लिए कारोबार सुनिश्चित करने में संबंधित संस्थाओं के समन्वय की व्यवस्था रखी गई है। इसी तरह प्रोसेसिंग यूनिट तभी टिकाऊ होगी जब कच्चा माल लगातार मिले और तैयार उत्पाद के लिए खरीदार मौजूद हों।
खेती की नई तस्वीर: महिला किसान से महिला CEO तक
भारत के कृषि क्षेत्र में हो रहा यह बदलाव सामाजिक परिवर्तन से कहीं आगे आर्थिक बदलाव की कहानी है। जिस महिला की पहचान कभी खेत में परिवार के सहयोगी के रूप में होती थी, वही अब SHG की पदाधिकारी, FPO की सदस्य, कृषि मशीन सेवा प्रदाता, ड्रोन पायलट और खाद्य प्रसंस्करण उद्यमी बन रही है।
DAY-NRLM के प्रभाव पर 2025 में किए गए एक स्वतंत्र अध्ययन का हवाला देते हुए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जुलाई 2026 में बताया कि नौ राज्यों के करीब 23,000 परिवारों पर किए गए मूल्यांकन में NRLM ब्लॉकों में घरेलू आय में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि परिपक्व सामुदायिक संस्थाओं वाले क्लस्टरों में आय वृद्धि 12 से 33 प्रतिशत के बीच रही।
इसलिए महिला उद्यमिता को केवल महिला सशक्तिकरण की योजना के रूप में देखना इसकी आर्थिक क्षमता को कम करके आंकना होगा। यह छोटे किसानों के लिए स्थानीय सेवाओं, सामूहिक बाजार, प्रोसेसिंग और ग्रामीण रोजगार का नया नेटवर्क बन सकती है।
यदि तकनीक के साथ प्रशिक्षण, सस्ता वित्त और स्थायी बाजार जुड़ता है, तो आने वाले वर्षों में गांव की महिलाएं भारतीय कृषि की सिर्फ श्रमशक्ति नहीं, बल्कि उसकी कारोबारी और तकनीकी नेतृत्वकर्ता भी बन सकती हैं।
