देश के किसानों के लिए उर्वरक मोर्चे से एक राहत भरी खबर सामने आई है। भारत के हालिया यूरिया आयात टेंडर में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, भारत को हालिया खरीद में यूरिया रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद के ऊंचे स्तरों की तुलना में काफी कम कीमत पर मिलने की उम्मीद है। इसका सीधा फायदा भले ही यूरिया की खुदरा कीमत के रूप में किसानों को तुरंत दिखाई न दे, लेकिन इससे सरकार के उर्वरक सब्सिडी बिल पर दबाव कम होने की संभावना है। (The Economic Times)
हालिया टेंडर में कितनी गिरी कीमत?
भारत की सरकारी कंपनी राश्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (RCF) ने हाल में यूरिया आयात के लिए टेंडर जारी किया था। इसमें पश्चिमी तट के लिए करीब 10 लाख टन और पूर्वी तट के लिए करीब 7 लाख टन यूरिया की जरूरत रखी गई थी। इस टेंडर में आपूर्तिकर्ताओं की ओर से करीब 3.1 मिलियन टन की पेशकश पश्चिमी तट के लिए और करीब 2.4 मिलियन टन की पेशकश पूर्वी तट के लिए मिली। रिपोर्टों के अनुसार, बोली लगभग 390 से 435 डॉलर प्रति टन के दायरे में रही। (The Economic Times)
यह कीमत जून में हुई खरीद की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत कम बताई जा रही है। इससे संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय यूरिया बाजार में वह दबाव कम हो रहा है, जिसने पिछले महीनों में भारत सहित दुनिया के कई देशों के लिए उर्वरक खरीद को महंगा कर दिया था। (The Economic Times)
कुछ महीने पहले हालात बिल्कुल अलग थे
यूरिया की कीमतों में मौजूदा गिरावट को समझने के लिए कुछ महीने पीछे जाना जरूरी है। अप्रैल 2026 में वैश्विक बाजार में भू-राजनीतिक तनाव के कारण यूरिया की कीमतों में तेज उछाल आया था। उस समय इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) के एक टेंडर में ज्यादातर बोली करीब 1,000 डॉलर प्रति टन के आसपास पहुंच गई थी और कुछ पेशकशें इससे भी ऊपर गई थीं। (Reuters)
इसके मुकाबले जून में नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) के 17 लाख टन यूरिया आयात टेंडर में बोली लगभग 445-449 डॉलर प्रति टन तक आ गई। यह अप्रैल के टेंडर में मिले करीब 935-959 डॉलर प्रति टन के स्तर से 50 प्रतिशत से भी अधिक कम था। (ChemAnalyst)
इससे साफ है कि कुछ ही महीनों में अंतरराष्ट्रीय यूरिया बाजार ने कितना बड़ा उतार-चढ़ाव देखा है।
रूस–यूक्रेन युद्ध से पहले के स्तर से भी कम कीमत की उम्मीद
अब अगस्त के ताजा टेंडर में कीमतें और नीचे आती दिखाई दे रही हैं। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, मौजूदा खरीद से भारत को यूरिया रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले के स्तरों की तुलना में भी कम कीमत पर मिलने की संभावना है। यह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए हर साल बड़ी मात्रा में यूरिया का आयात करता है। (The Economic Times)
यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमत में कमी का सबसे बड़ा फायदा सरकार के स्तर पर दिखाई दे सकता है। क्योंकि किसान को यूरिया नियंत्रित और भारी सब्सिडी वाले मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय खरीद लागत और किसान से वसूली गई कीमत के बीच का अंतर सरकार को वहन करना पड़ता है।
किसान को यूरिया सस्ता क्यों नहीं दिखाई देता?
यह सवाल अक्सर किसानों के मन में आता है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया सस्ता हो रहा है तो दुकान पर किसान को इसका फायदा सीधे क्यों नहीं मिलता?
इसका कारण भारत की उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था है। यूरिया की बिक्री कीमत सरकार द्वारा नियंत्रित होती है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, 45 किलोग्राम यूरिया बोरी का अधिसूचित अधिकतम खुदरा मूल्य ₹242 है, जबकि नीम कोटिंग और लागू करों से जुड़े शुल्क अलग हो सकते हैं। सरकार उत्पादक या आयातक को लागत और किसान से प्राप्त राशि के बीच के अंतर की भरपाई सब्सिडी के रूप में करती है। (Digital Sansad)
इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमत कम होने पर किसान की बोरी का मूल्य जरूरी नहीं कि तुरंत घट जाए। लेकिन सरकार को उसी बोरी पर पहले की तुलना में कम सब्सिडी देनी पड़ सकती है।
सब्सिडी बिल के लिए क्यों बड़ी राहत?
उर्वरक सब्सिडी भारत के बजट पर एक बड़ा खर्च है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया महंगा होने पर सरकार को किसानों को नियंत्रित कीमत पर खाद उपलब्ध कराने के लिए ज्यादा राशि खर्च करनी पड़ती है।
2026 में वैश्विक उर्वरक कीमतों में तेज उछाल ने इस दबाव को और बढ़ाया था। अप्रैल में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी के बाद सरकार ने किसानों को ऊंची कीमतों से बचाने के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी में भी वृद्धि की थी। (Reuters)
अब यदि यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक नीचे रहती हैं, तो आयात लागत कम होगी और सरकार के सब्सिडी खर्च को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
चीन की वापसी से भी बदला बाजार
यूरिया की कीमतों में गिरावट के पीछे वैश्विक आपूर्ति की स्थिति में सुधार भी एक महत्वपूर्ण कारण है। जून में भारत के एक बड़े टेंडर के दौरान चीन से यूरिया निर्यात में नरमी आने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति बढ़ने की खबरों ने कीमतों पर दबाव बनाया था। उस समय भारत को करीब 445-449 डॉलर प्रति टन की बोली मिली थी। (Business Standard)
जब वैश्विक बाजार में यूरिया की उपलब्धता बढ़ती है और खरीदारों के पास ज्यादा विकल्प होते हैं, तो आपूर्तिकर्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। इसका असर टेंडर की कीमतों पर दिखाई देता है।
भारत के लिए सिर्फ कीमत नहीं, उपलब्धता भी महत्वपूर्ण
भारत में यूरिया की कीमत के साथ-साथ उसकी उपलब्धता भी बेहद महत्वपूर्ण है। खरीफ सीजन में धान, मक्का, कपास, गन्ना और दूसरी फसलों के लिए नाइट्रोजन की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे समय में अगर घरेलू उत्पादन और आयात दोनों पर्याप्त रहें, तो किसानों को खाद की कमी से जूझना नहीं पड़ता।
सरकार देश में उर्वरक की आवाजाही और उपलब्धता की निगरानी डिजिटल प्रणाली के जरिए करती है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, प्रमुख सब्सिडी वाले उर्वरकों की आवाजाही पर ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से नजर रखी जाती है और राज्यों की जरूरत के अनुसार आपूर्ति को समायोजित किया जाता है। (Digital Sansad)
क्या इसका असर डीएपी और अन्य खादों पर भी पड़ेगा?
यहां किसानों को एक बात समझना जरूरी है। यूरिया की कीमत में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि सभी उर्वरकों की कीमत भी उसी अनुपात में कम हो जाएगी।
यूरिया मुख्य रूप से नाइट्रोजन आधारित उर्वरक है, जबकि डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों की कीमतों पर फॉस्फोरस, पोटाश, अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड और अन्य कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों का प्रभाव पड़ता है।
हाल के महीनों में डीएपी और जटिल उर्वरकों के बाजार पर अलग तरह का दबाव देखा गया है। इसलिए यूरिया के सस्ते होने को पूरे उर्वरक बाजार में कीमतों की व्यापक गिरावट के रूप में देखना सही नहीं होगा। (The Indian Express)
किसानों के लिए असली राहत क्या है?
किसानों के लिए इस खबर की सबसे बड़ी राहत यूरिया की उपलब्धता और सरकार के वित्तीय दबाव में कमी के रूप में देखी जा सकती है। अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम बनी रहती हैं, तो सरकार के लिए पर्याप्त मात्रा में यूरिया खरीदना आसान हो सकता है।
इससे खरीफ और आने वाले रबी सीजन के लिए खाद की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलेगी। साथ ही, वैश्विक बाजार में अचानक कीमत बढ़ने की स्थिति में सरकार के पास कुछ वित्तीय गुंजाइश भी रह सकती है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार काफी संवेदनशील है। गैस की कीमत, समुद्री परिवहन, भू-राजनीतिक तनाव, निर्यात नीतियां और बड़े उत्पादक देशों के फैसले यूरिया की कीमत को तेजी से बदल सकते हैं। इसलिए मौजूदा गिरावट को स्थायी कीमत गिरावट मानना जल्दबाजी होगी।
आगे क्या होगा?
भारत के लिए आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अंतरराष्ट्रीय यूरिया कीमतें किस स्तर पर स्थिर होती हैं। यदि कीमतें मौजूदा स्तर के आसपास बनी रहती हैं, तो सरकार को आयात पर कम खर्च करना पड़ेगा और सब्सिडी बिल पर भी दबाव कम हो सकता है।
दूसरी तरफ, अगर किसी बड़े उत्पादक देश से निर्यात घटता है या ऊर्जा और गैस की कीमतों में दोबारा तेज वृद्धि होती है, तो यूरिया बाजार फिर महंगा हो सकता है।
फिलहाल किसानों के लिए संदेश सकारात्मक है। अंतरराष्ट्रीय यूरिया बाजार में कीमतों की तेज गिरावट ने भारत को बड़ी राहत दी है। अप्रैल में करीब 1,000 डॉलर प्रति टन के आसपास पहुंची कीमतों से लेकर अब करीब 390-435 डॉलर प्रति टन की पेशकश तक आना बाजार में हुए बड़े बदलाव को दिखाता है। (The Economic Times)
यानी खाद के मोर्चे पर फिलहाल सरकार को राहत मिलती दिख रही है। किसान के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध कराने और सब्सिडी व्यवस्था को संभालने के लिए बेहतर स्थिति बन सकती है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि आने वाले टेंडरों में कीमतें और नीचे जाती हैं या मौजूदा स्तर के आसपास स्थिर होती हैं।

