फल और सब्जियां हमारी रोजमर्रा की डाइट का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन इनके उत्पादन और भंडारण में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहते हैं। खासकर तब, जब किसी खाद्य पदार्थ में कीटनाशक अवशेष यानी Pesticide Residue निर्धारित सुरक्षित सीमा से अधिक पाया जाता है। इसी वजह से सरकार देश में फल और सब्जियों समेत विभिन्न खाद्य पदार्थों में कीटनाशक अवशेष की निगरानी और जांच करती है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार, 2023 से 2026 के बीच 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 70,000 से अधिक फल-सब्जी नमूनों की जांच की गई। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि बाजार में पहुंचने वाले कृषि उत्पादों में कीटनाशकों के अवशेष निर्धारित सीमा के भीतर हैं या नहीं। कुछ राज्यों में ऐसे नमूने भी मिले हैं, जिनमें अवशेष तय सीमा से अधिक पाए गए।
यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका संबंध सीधे किसानों की खेती की पद्धति और उपभोक्ताओं की खाद्य सुरक्षा से है।
कीटनाशक अवशेष आखिर क्या होता है?
फसलों को कीट, रोग और खरपतवार से बचाने के लिए किसान विभिन्न प्रकार के कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। सही मात्रा और सही समय पर इस्तेमाल किए जाने पर ये उत्पाद फसल सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लेकिन किसी कीटनाशक के इस्तेमाल के बाद उसका बहुत छोटा हिस्सा फसल की सतह या उसके अंदर मौजूद रह सकता है। इसे कीटनाशक अवशेष कहा जाता है।
हर कीटनाशक के लिए वैज्ञानिक मूल्यांकन के आधार पर एक अधिकतम अवशेष सीमा तय की जाती है, जिसे Maximum Residue Limit यानी MRL कहा जाता है। यदि किसी खाद्य उत्पाद में किसी कीटनाशक का अवशेष इस निर्धारित सीमा से अधिक पाया जाता है, तो वह खाद्य सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय बन सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर ऐसे नमूने से तुरंत बीमारी होगी। बल्कि MRL एक नियामकीय और वैज्ञानिक सीमा है, जिसका उद्देश्य लंबे समय तक खाद्य पदार्थों के सेवन से होने वाले संभावित जोखिम को नियंत्रित करना है।
70 हजार से अधिक नमूनों की जांच क्यों महत्वपूर्ण है?
देश में फल-सब्जियों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। अलग-अलग राज्यों में मौसम, मिट्टी, फसल पैटर्न, कीटों का प्रकोप और कृषि पद्धतियां अलग-अलग होती हैं। ऐसे में केवल कुछ क्षेत्रों से नमूने लेकर पूरे देश की स्थिति का आकलन करना मुश्किल है।
23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 70 हजार से अधिक नमूनों की जांच से निगरानी का दायरा काफी व्यापक हो जाता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किन फसलों और क्षेत्रों में अवशेष की समस्या अपेक्षाकृत ज्यादा दिखाई दे रही है।
सैंपल जांच का एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य किसानों को बेहतर कृषि पद्धतियों के बारे में जागरूक करना है। यदि किसी क्षेत्र में बार-बार निर्धारित सीमा से अधिक अवशेष पाए जाते हैं, तो वहां किसानों को कीटनाशक के सही उपयोग, मात्रा, छिड़काव समय और फसल कटाई से पहले आवश्यक अंतराल यानी Waiting Period के बारे में अधिक जानकारी देने की जरूरत होती है।
निर्धारित सीमा से ज्यादा अवशेष क्यों मिलते हैं?
फल और सब्जियों में अधिक मात्रा में कीटनाशक अवशेष मिलने के कई कारण हो सकते हैं। इनमें सबसे प्रमुख कारण है कीटनाशक का गलत या अत्यधिक इस्तेमाल।
कभी-कभी किसान कीटों पर तेजी से नियंत्रण पाने के लिए अनुशंसित मात्रा से ज्यादा कीटनाशक का इस्तेमाल कर लेते हैं। कई बार अलग-अलग उत्पादों को मिलाकर छिड़काव किया जाता है, जबकि उनके मिश्रण की वैज्ञानिक सिफारिश उपलब्ध नहीं होती।
दूसरी बड़ी वजह है फसल कटाई से ठीक पहले कीटनाशक का छिड़काव। प्रत्येक कीटनाशक के लिए एक निर्धारित प्रतीक्षा अवधि होती है। इस अवधि में पौधे और फल पर मौजूद अवशेष प्राकृतिक प्रक्रियाओं के कारण कम हो सकते हैं। यदि किसान इस अवधि से पहले फसल काटकर बाजार में भेज देता है, तो अवशेष अपेक्षाकृत अधिक रह सकते हैं।
इसके अलावा गलत कीटनाशक का चुनाव, बार-बार एक ही रसायन का इस्तेमाल, लेबल पर दिए निर्देशों की अनदेखी और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के बिना दवा का प्रयोग भी समस्या बढ़ा सकता है।
किसान क्या सावधानी बरतें?
कीटनाशक अवशेष को कम करने में किसान की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। किसानों को हमेशा फसल और कीट के अनुसार अनुशंसित कीटनाशक का ही इस्तेमाल करना चाहिए।
सबसे पहले दवा की बोतल या पैकेट पर दिए निर्देशों को पढ़ना जरूरी है। उसमें बताई गई मात्रा से अधिक दवा डालने से यह जरूरी नहीं कि कीट नियंत्रण बेहतर हो जाएगा। उल्टा, फसल में अवशेष बढ़ सकते हैं और उत्पादन लागत भी बढ़ सकती है।
किसान को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दवा का छिड़काव फसल कटाई के कितने दिन पहले बंद करना है। इसे प्री-हार्वेस्ट इंटरवल यानी PHI कहा जाता है।
इसके अलावा जहां संभव हो, Integrated Pest Management यानी IPM को अपनाना बेहतर विकल्प है। इसमें केवल रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर रहने के बजाय जैविक नियंत्रण, फेरोमोन ट्रैप, प्रकाश प्रपंच, रोगग्रस्त हिस्सों को हटाने और खेत की निगरानी जैसे उपाय शामिल किए जा सकते हैं।
हर कीड़ा देखकर दवा छिड़कना जरूरी नहीं
कीटनाशक के अनावश्यक इस्तेमाल को कम करने का सबसे आसान तरीका है कि किसान पहले खेत की नियमित निगरानी करे।
किसी खेत में कुछ कीट दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि तुरंत रासायनिक कीटनाशक का छिड़काव कर दिया जाए। कई बार खेत में मौजूद कीटों को प्राकृतिक शत्रु नियंत्रित कर रहे होते हैं। कुछ कीटों की संख्या आर्थिक नुकसान की सीमा से नीचे होती है और उस स्थिति में छिड़काव की जरूरत नहीं पड़ती।
इसलिए Economic Threshold Level यानी ETL की अवधारणा महत्वपूर्ण है। किसान को विशेषज्ञ सलाह के आधार पर यह तय करना चाहिए कि कब कीटों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि नियंत्रण उपाय करना आर्थिक रूप से जरूरी हो गया है।
उपभोक्ताओं के लिए क्या संदेश है?
जांच में कुछ नमूनों में निर्धारित सीमा से अधिक अवशेष मिलने की खबर के बाद उपभोक्ताओं के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठ सकता है कि फल और सब्जियां खाना सुरक्षित है या नहीं।
फल-सब्जियां स्वस्थ आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और केवल कीटनाशक अवशेष की आशंका के कारण इन्हें खाना बंद करना उचित नहीं है। उपभोक्ता खरीदारी के बाद फल और सब्जियों को बहते साफ पानी में अच्छी तरह धो सकते हैं।
धोने से सतह पर मौजूद मिट्टी, धूल और कुछ सतही अवशेष कम करने में मदद मिल सकती है। जिन सब्जियों या फलों को छीलकर खाया जा सकता है, उन्हें छीलना भी सतह पर मौजूद कुछ अवशेषों को कम कर सकता है। हालांकि, धोना या छीलना हर प्रकार के कीटनाशक अवशेष को पूरी तरह समाप्त करने की गारंटी नहीं देता।
जांच का उद्देश्य किसानों को परेशान करना नहीं
कीटनाशक अवशेष की निगरानी का उद्देश्य किसानों पर अनावश्यक दबाव बनाना नहीं बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ कृषि व्यवस्था तैयार करना है।
भारत में किसानों को फसल बचाने के लिए कीटनाशकों की जरूरत पड़ती है। यदि कीटों और रोगों को नियंत्रित नहीं किया जाए तो उत्पादन और किसान की आय दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए लक्ष्य कीटनाशकों को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उनका सही, सुरक्षित और वैज्ञानिक इस्तेमाल सुनिश्चित करना है।
इसके लिए कृषि विभाग, कृषि विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक संस्थान, इनपुट कंपनियां और किसान संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। किसानों तक स्थानीय भाषा में सही जानकारी पहुंचाना जरूरी है।
निर्यात के लिए भी महत्वपूर्ण है अवशेष नियंत्रण
कीटनाशक अवशेष का मुद्दा केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है। भारत से बड़ी मात्रा में फल, सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद दूसरे देशों को निर्यात किए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन बेहद महत्वपूर्ण होता है।
यदि किसी निर्यात खेप में निर्धारित सीमा से अधिक अवशेष मिलते हैं, तो उस खेप को अस्वीकार किया जा सकता है। इससे किसान, निर्यातक और पूरी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
इसलिए अवशेष नियंत्रण से भारत की कृषि उपज की गुणवत्ता, बाजार पहुंच और निर्यात प्रतिस्पर्धा मजबूत हो सकती है।
आगे निगरानी और जागरूकता दोनों जरूरी
2023 से 2026 के बीच 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 70 हजार से अधिक फल-सब्जी नमूनों की जांच यह दिखाती है कि खाद्य सुरक्षा और कीटनाशक अवशेष की निगरानी को गंभीरता से लिया जा रहा है।
लेकिन केवल नमूने लेना और जांच करना पर्याप्त नहीं है। जिन क्षेत्रों में निर्धारित सीमा से अधिक अवशेष पाए जाते हैं, वहां इसके कारणों की पहचान करना और किसानों को समाधान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
किसानों को अनुशंसित मात्रा, सही कीटनाशक, सही समय और प्री-हार्वेस्ट इंटरवल की जानकारी दी जाए तो अवशेष की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
फल और सब्जियों में कीटनाशक अवशेष की जांच किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। 70,000 से अधिक नमूनों की जांच से निगरानी का व्यापक स्तर सामने आता है, जबकि कुछ नमूनों में निर्धारित सीमा से अधिक अवशेष मिलना यह संकेत देता है कि वैज्ञानिक तरीके से कीटनाशक इस्तेमाल करने की जरूरत अभी भी बनी हुई है।
किसानों के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि ज्यादा दवा का मतलब ज्यादा सुरक्षा नहीं है। सही कीटनाशक, सही मात्रा, सही समय और फसल कटाई से पहले पर्याप्त अंतराल—यही सुरक्षित खेती की कुंजी है। वहीं उपभोक्ताओं को फल-सब्जियों को अच्छी तरह धोकर और सुरक्षित खाद्य आदतों के साथ उनका सेवन जारी रखना चाहिए।
आने वाले समय में बेहतर निगरानी, आधुनिक परीक्षण सुविधाओं और किसानों की जागरूकता के जरिए भारत अपनी कृषि उपज को न केवल सुरक्षित बना सकता है, बल्कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी गुणवत्ता और भरोसा भी बढ़ा सकता है।
