वैश्विक स्तर पर यूरिया की सप्लाई में सुधार और आयात के लिए अलग-अलग स्रोतों के इस्तेमाल से भारत के लिए राहत की खबर सामने आई है। देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले प्रमुख नाइट्रोजन उर्वरक यूरिया की लैंडेड कॉस्ट अप्रैल 2026 के करीब 1,000 डॉलर प्रति टन के उच्च स्तर से घटकर अब लगभग 390 डॉलर प्रति टन रह गई है। यानी कुछ महीनों के भीतर यूरिया की आयात लागत में करीब 60 फीसदी की बड़ी गिरावट आई है। कीमतों में यह कमी ऐसे समय हुई है, जब देश में आगामी रबी सीजन के लिए उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की तैयारी चल रही है।
यूरिया की कीमतों में गिरावट का सबसे बड़ा फायदा सरकार के उर्वरक आयात बिल और सब्सिडी पर पड़ सकता है। इसके अलावा, रबी सीजन में किसानों को यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है। सरकार पहले ही वैश्विक बाजार में कीमतों में तेजी और सप्लाई बाधित होने की स्थिति को देखते हुए बड़े पैमाने पर आयात कर रही है।
RCF ने 1.7 मिलियन टन यूरिया का सौदा किया
राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (RCF) ने इस महीने करीब 1.7 मिलियन टन यूरिया के आयात के लिए बोली को अंतिम रूप दिया है। यह खरीद करीब 390 से 393 डॉलर प्रति टन की कीमत पर हुई है। इसके मुकाबले अप्रैल 2026 में RCF के यूरिया आयात टेंडर में कीमत करीब 935 से 959 डॉलर प्रति टन थी।
इस तुलना से साफ है कि कुछ ही महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में भारी नरमी आई है। जून 2026 में नेशनल फर्टिलाइजर्स (NF) के टेंडर में भी यूरिया के लिए करीब 449 डॉलर प्रति टन की बोली मिली थी। यानी जून के मुकाबले भी मौजूदा कीमत कम है।
भारत में यूरिया आयात का काम मुख्य रूप से नेशनल फर्टिलाइजर्स, राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स और इंडियन पोटाश लिमिटेड जैसी एजेंसियां करती हैं। इन एजेंसियों ने अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच अब तक करीब 4.2 मिलियन टन यूरिया के आयात ऑर्डर जारी किए हैं। इनमें से लगभग 3.5 मिलियन टन यूरिया की डिलीवरी भी हो चुकी है।
रबी सीजन से पहले सप्लाई को मिलेगा सहारा
भारत में रबी फसलों की बुवाई के दौरान यूरिया की मांग में आम तौर पर बढ़ोतरी होती है। गेहूं, सरसों, चना और दूसरी फसलों में नाइट्रोजन की जरूरत को पूरा करने के लिए किसान यूरिया का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में रबी सीजन से पहले आयात में तेजी और वैश्विक कीमतों में गिरावट सरकार के लिए महत्वपूर्ण राहत है।
वित्त वर्ष 2025-26 में देश में कुल करीब 40 मिलियन टन यूरिया की खपत हुई थी। इसमें लगभग 10 मिलियन टन यूरिया तैयार उत्पाद के रूप में आयात किया गया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर काफी हद तक निर्भर है।
सब्सिडी बिल पर भी पड़ेगा असर
यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई गिरावट से सरकार को उर्वरक सब्सिडी के मोर्चे पर भी राहत मिलने की उम्मीद है। अधिकारियों के अनुसार, पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण वैश्विक उर्वरक कीमतों में अचानक बढ़ोतरी के बाद वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत में सरकार को सब्सिडी खर्च काफी ज्यादा रहने का अनुमान था।
सरकार ने चालू वित्त वर्ष में अब तक उर्वरक सब्सिडी के तहत 70,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं। यह 2026-27 के लिए 1.77 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान का लगभग 40 फीसदी है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होने के बाद अब सरकार अपने शुरुआती सब्सिडी अनुमान का दोबारा आकलन कर सकती है। उद्योग और सरकारी अधिकारियों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में वास्तविक उर्वरक सब्सिडी बिल वित्त वर्ष 2025-26 के 2.17 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले करीब 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये अधिक रह सकता है।
यह अनुमान उस आशंका से काफी कम है, जिसमें अप्रैल और मई के दौरान सप्लाई में गंभीर व्यवधान के बीच उर्वरक विभाग के अंदरूनी आकलन में सब्सिडी बिल के करीब 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना जताई गई थी।
FY26 में सब्सिडी पर 2.17 लाख करोड़ रुपये खर्च
वित्त वर्ष 2025-26 में उर्वरक सब्सिडी पर कुल 2.17 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इसमें करीब 1.42 लाख करोड़ रुपये यूरिया सब्सिडी और 74,999 करोड़ रुपये न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी के तहत खर्च हुए।
यह खर्च 1.86 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान से करीब 17 फीसदी अधिक था। अधिकारियों के मुताबिक, मार्च 2026 से उर्वरक कीमतों में हुई वृद्धि इसका एक प्रमुख कारण रही। वैश्विक बाजार में कीमतों के बढ़ने से सरकार पर किसानों के लिए उर्वरकों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने का वित्तीय दबाव बढ़ा।
अब यूरिया की कीमतों में आई गिरावट से सरकार को इसी दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
पश्चिम एशिया संघर्ष से प्रभावित हुई थी सप्लाई
उद्योग सूत्रों के अनुसार, पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद यूरिया की वैश्विक कीमतों में तेजी आई थी। यूरिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस, खासकर LNG, एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। संघर्ष के कारण LNG की सप्लाई और तैयार उर्वरकों के अंतरराष्ट्रीय परिवहन पर असर पड़ा।
सप्लाई में रुकावट के कारण उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतें तेजी से ऊपर चली गईं। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ा जो यूरिया की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं।
भारत भी ऐसे देशों में शामिल है। इसलिए सरकार ने किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय यूरिया की खरीद के लिए अलग-अलग देशों का रुख किया।
कई देशों से यूरिया खरीद रहा भारत
भारत ने अपनी आयात रणनीति में विविधता लाने के लिए कई देशों से यूरिया खरीदना शुरू किया है। इनमें ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्की और नीदरलैंड्स शामिल हैं।
इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक सप्लायर या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी एक क्षेत्र में उत्पादन या परिवहन प्रभावित होने पर दूसरे स्रोतों से आयात किया जा सके, इसके लिए सप्लाई नेटवर्क को व्यापक बनाया जा रहा है।
यूरिया के अलावा भारत ने DAP और NPK जैसे दूसरे उर्वरकों के लिए भी आयात के स्रोतों में विविधता बढ़ाई है। इन उर्वरकों का आयात रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब जैसे देशों से किया गया है।
घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता
उर्वरक विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जुलाई 2026 के दौरान भारत में 11.88 मिलियन टन यूरिया की जरूरत के मुकाबले उपलब्धता करीब 17.3 मिलियन टन रही। इसी अवधि में यूरिया की बिक्री 10.7 मिलियन टन से अधिक रही।
इसका मतलब है कि समीक्षा अवधि के दौरान यूरिया की उपलब्धता मांग की तुलना में काफी अधिक रही। इससे रबी सीजन से पहले देश में स्टॉक की स्थिति को लेकर सकारात्मक संकेत मिलते हैं।
DAP के मामले में भी स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत रही। अप्रैल-जुलाई अवधि में DAP की मांग करीब 3.42 मिलियन टन थी, जबकि उपलब्धता लगभग 4.1 मिलियन टन रही। इस दौरान DAP की बिक्री करीब 2.54 मिलियन टन दर्ज की गई।
भारत की आयात निर्भरता बड़ी चुनौती
यूरिया की कीमतों में गिरावट से तत्काल राहत जरूर मिली है, लेकिन भारत के लिए वैश्विक बाजार पर निर्भरता अभी भी बड़ी चुनौती है। देश अपनी कुल उर्वरक और कच्चे माल की जरूरत का करीब 70 फीसदी हिस्सा आयात से पूरा करता है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में विभिन्न प्रकार के उर्वरकों की कुल वार्षिक खपत 70 मिलियन टन से अधिक रही। इतनी बड़ी मांग को देखते हुए वैश्विक कीमतों, समुद्री परिवहन, प्राकृतिक गैस की कीमत और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियों में होने वाला बदलाव भारत के उर्वरक बाजार पर सीधे असर डाल सकता है।
इससे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी वैश्विक उर्वरक सप्लाई प्रभावित हुई थी। वित्त वर्ष 2022-23 में भारत का उर्वरक सब्सिडी खर्च बढ़कर रिकॉर्ड करीब 2.54 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था। उस समय युद्ध के साथ-साथ समुद्री मार्गों और वैश्विक सप्लाई चेन में आए व्यवधान ने उर्वरकों की कीमतों को प्रभावित किया था।
किसानों के लिए क्या मायने?
यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में करीब 60 फीसदी की गिरावट और भारत में मजबूत उपलब्धता रबी सीजन के लिए सकारात्मक संकेत है। इससे सरकार को महंगे आयात और बढ़ते सब्सिडी खर्च के दबाव से राहत मिल सकती है।
हालांकि, किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमत नहीं, बल्कि घरेलू बाजार में इसकी समय पर उपलब्धता है। सरकार यदि पर्याप्त स्टॉक बनाए रखती है और आयातित खेप समय पर पहुंचती रहती है, तो रबी सीजन में यूरिया की कमी की आशंका कम हो सकती है।
फिलहाल भारत ने आयात के स्रोतों को बढ़ाकर और बड़े पैमाने पर खरीद ऑर्डर देकर सप्लाई को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाया है। वैश्विक कीमतों में नरमी के साथ सरकार को अब सब्सिडी खर्च का पुनर्मूल्यांकन करने का भी मौका मिला है। आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतें और पश्चिम एशिया की स्थिति यह तय करेगी कि यह राहत कितनी स्थायी रहती है।

