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Home कृषि समाचार

Kanda Express Onion Price: प्याज की महंगाई पर सरकार का बड़ा दांव, जानें क्यों दौड़ानी पड़ी स्पेशल ट्रेन, किन राज्यों में बढ़ा संकट?

Kanda Express Onion Price: Government's major move to tackle soaring onion prices—find out why a special train had to be run and which states are facing an escalating crisis.

Fiza by Fiza
August 27, 2026
in कृषि समाचार
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Kanda Express Onion Price

Kanda Express Onion Price

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Kanda Express Onion Price:  देश में प्याज की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर सरकार की चिंता बढ़ा दी है। अगस्त 2026 में कई बड़े शहरों में प्याज के खुदरा भाव तेजी से ऊपर गए हैं। हालात को संभालने के लिए केंद्र सरकार ने अपने बफर स्टॉक से प्याज निकालना शुरू किया है और महाराष्ट्र के नासिक से बड़े उपभोक्ता केंद्रों तक प्याज पहुंचाने के लिए ‘कांदा एक्सप्रेस’ का सहारा लिया है। सरकार का मकसद साफ है, जिन बाजारों में कीमतों पर दबाव है वहां जल्द से जल्द अतिरिक्त सप्लाई पहुंचाई जाए और आम उपभोक्ताओं को राहत दी जाए।  लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार देश में प्याज की कुल उपलब्धता को पर्याप्त बता रही है, तब कांदा एक्सप्रेस चलाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या वास्तव में देश में प्याज की कमी है या मामला उत्पादन के बजाय स्टोरेज, परिवहन और बाजार तक सही समय पर प्याज पहुंचने का है?

देश में प्याज का औसत भाव 43 रुपये के पार

24 अगस्त को देश में प्याज का औसत खुदरा मूल्य करीब 43.53 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया, जबकि एक साल पहले यह करीब 27.37 रुपये प्रति किलो था। यानी सालाना आधार पर औसत खुदरा कीमत लगभग 59 प्रतिशत बढ़ गई। बड़े शहरों में स्थिति और ज्यादा दबाव वाली दिखाई दी। 24 अगस्त को चेन्नई में खुदरा प्याज करीब 60 रुपये किलो, दिल्ली में 55 रुपये और कोलकाता में करीब 53 रुपये किलो था।

मदुरै में स्थिति और गंभीर दिखाई दी, हालांकि वहां छोटे प्याज यानी शैलट्स और सामान्य बड़े प्याज के भाव में बड़ा अंतर है। रिपोर्ट के मुताबिक छोटे प्याज का खुदरा भाव 100 रुपये प्रति किलो से ऊपर पहुंच गया, जबकि बड़े प्याज का भाव करीब 60 रुपये किलो था। खास बात यह है कि कांदा एक्सप्रेस से आने वाली खेप बड़े प्याज की है, छोटे प्याज की नहीं।

आखिर क्यों महंगा हो रहा है प्याज?

भारत में प्याज की कीमतों में अगस्त-सितंबर के दौरान मौसमी तेजी कोई नई बात नहीं है। सरकार के मुताबिक त्योहारों की मांग, मौसम से जुड़ी बाधाएं, सप्लाई चेन में बदलाव और मांग के पैटर्न जैसे कारण इस अवधि में कीमतों पर दबाव डाल सकते हैं।

इस बार समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू भंडारण भी बताया जा रहा है। प्याज ऐसी फसल है जिसे उत्पादन के बाद लंबे समय तक संभालकर रखने में नुकसान हो सकता है। असामान्य बारिश और स्टोरेज के दौरान खराब होने वाले प्याज के कारण बाजार तक पहुंचने वाली अच्छी गुणवत्ता की मात्रा प्रभावित हो सकती है। किसान संगठनों की ओर से भी स्टोरेज लॉस और लागत बढ़ने की बात कही गई है।

इसलिए मौजूदा परिस्थिति को केवल “देश में प्याज खत्म हो गया” जैसी स्थिति के रूप में देखना सही नहीं होगा। सरकार स्वयं कह रही है कि आने वाले महीनों की घरेलू मांग पूरी करने के लिए देश में प्याज की उपलब्धता पर्याप्त है। असली चुनौती अलग-अलग क्षेत्रों में सही समय पर पर्याप्त मात्रा पहुंचाने और कीमतों में असामान्य उछाल को रोकने की है।

उत्पादन पर्याप्त, फिर बाजार में दबाव क्यों?

सरकारी अनुमान के मुताबिक 2025-26 में देश में प्याज का उत्पादन करीब 307.37 लाख टन रहने का अनुमान है। पिछले वर्ष यह करीब 307.67 लाख टन था। यानी राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादन में कोई ऐसी भारी गिरावट नहीं दिखाई देती जिससे देशव्यापी गंभीर कमी का निष्कर्ष निकाला जाए। यहीं प्याज की कहानी थोड़ी जटिल हो जाती है।

खेती में उत्पादन होना पहला चरण है। इसके बाद प्याज को मंडियों और स्टोरेज तक पहुंचाना, सुरक्षित रखना और फिर मांग वाले शहरों में सही समय पर भेजना जरूरी है। यदि भंडारण में नुकसान ज्यादा हो जाए या किसी क्षेत्र तक आपूर्ति धीमी पड़े तो पर्याप्त राष्ट्रीय उत्पादन के बावजूद स्थानीय बाजार में उपलब्धता घट सकती है। इसका सीधा असर खुदरा कीमतों पर दिखाई देता है।

क्या है ‘कांदा एक्सप्रेस’?

‘कांदा’ मराठी भाषा में प्याज को कहा जाता है। इसी वजह से प्याज की बड़े पैमाने पर रेलवे के जरिए ढुलाई की इस व्यवस्था को कांदा एक्सप्रेस कहा जा रहा है। हालांकि यह योजना अचानक 2026 में शुरू नहीं हुई। सरकार के मुताबिक 2024-25 में कांदा एक्सप्रेस के जरिए 14 रेलवे रेक से करीब 12,000 मीट्रिक टन बफर प्याज पांच शहरों तक पहुंचाया गया था। 2025-26 में इसका दायरा कई गुना बढ़ गया। उस दौरान 86 रेलवे रेक के जरिए करीब 88,000 मीट्रिक टन प्याज 16 शहरों तक पहुंचाया गया।

अब चालू वित्त वर्ष में नासिक से नई दिल्ली के लिए कांदा एक्सप्रेस के जरिए बफर प्याज भेजने की शुरुआत की गई है। इसका उद्देश्य उत्पादक क्षेत्र से बड़ी मात्रा में प्याज को तेजी से उन उपभोक्ता केंद्रों तक पहुंचाना है जहां बाजार को अतिरिक्त सप्लाई की जरूरत है।

सड़क और रेल दोनों से प्याज भेज रही सरकार

सरकार केवल ट्रेन पर निर्भर नहीं है। इस बार हाइब्रिड ट्रांसपोर्ट मॉडल अपनाया गया है। यानी बड़ी खेपों को रेलवे रेक से भेजने के साथ सड़क मार्ग से भी अलग-अलग शहरों में प्याज पहुंचाया जा रहा है।26 अगस्त की केंद्र सरकार की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक कांदा एक्सप्रेस से नासिक से दिल्ली-एनसीआर के लिए प्याज भेजा गया, जबकि सड़क मार्ग से चेन्नई, कोलकाता, एर्नाकुलम, गुवाहाटी, वाराणसी, लखनऊ, पटना, चंडीगढ़, जम्मू और अमृतसर जैसे बड़े उपभोक्ता केंद्रों की ओर भी सप्लाई भेजी जा रही है। इस सूची से यह भी पता चलता है कि सरकारी हस्तक्षेप केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है।

किन राज्यों और क्षेत्रों में प्याज की कीमतों पर दबाव?

यहां “किल्लत” शब्द को सावधानी से समझना जरूरी है। केंद्र ने राष्ट्रीय स्तर पर प्याज की पर्याप्त उपलब्धता का दावा किया है। इसलिए सभी संबंधित राज्यों को गंभीर भौतिक कमी वाला राज्य कहना सही नहीं होगा। बेहतर शब्द होगा कि इन क्षेत्रों में कीमतों या स्थानीय सप्लाई पर दबाव दिखाई दे रहा है अथवा सरकार अतिरिक्त सप्लाई भेज रही है।

दिल्ली-NCR: राजधानी में खुदरा कीमतों में तेजी के बाद नासिक से कांदा एक्सप्रेस के जरिए प्याज भेजा गया है। दिल्ली सरकार भी दैनिक जरूरत और आपूर्ति की निगरानी कर रही है। 27 अगस्त की रिपोर्ट में दिल्ली सरकार ने कहा कि शहर में उस समय वास्तविक प्याज की कमी नहीं थी, लेकिन कीमतें और बढ़ने की आशंका को देखते हुए तैयारी की जा रही थी।

तमिलनाडु: चेन्नई उन प्रमुख बाजारों में शामिल है जहां कीमतों पर दबाव दिखाई दिया। मदुरै में छोटे प्याज के दाम 100 रुपये किलो के ऊपर और बड़े प्याज के दाम करीब 60 रुपये किलो बताए गए। सरकार तमिलनाडु के प्रमुख उपभोक्ता केंद्रों में अतिरिक्त प्याज पहुंचा रही है।

पश्चिम बंगाल: कोलकाता में भी खुदरा प्याज का भाव 50 रुपये प्रति किलो से ऊपर दर्ज किया गया और शहर सरकारी आपूर्ति के लक्षित केंद्रों में शामिल है।

असम: गुवाहाटी को भी अतिरिक्त प्याज सप्लाई के लिए चुना गया है। पूर्वोत्तर तक उत्पादक क्षेत्रों से लंबी दूरी की ढुलाई होने के कारण कुशल लॉजिस्टिक्स यहां विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।

इसके अलावा केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और जम्मू-कश्मीर/जम्मू क्षेत्र तथा चंडीगढ़ जैसे बाजारों की ओर भी सरकार सड़क मार्ग से प्याज भेज रही है। इसका अर्थ यह नहीं कि इन सभी राज्यों में समान स्तर की “किल्लत” है, बल्कि सरकार कीमत और मांग की स्थिति के हिसाब से प्रमुख उपभोक्ता केंद्रों में अतिरिक्त स्टॉक पहुंचा रही है। सरकार के पास कितना बफर प्याज?

बफर स्टॉक सरकार का वह रणनीतिक भंडार है जिसका इस्तेमाल कीमतों में तेज उछाल या सप्लाई में बाधा आने पर बाजार में अतिरिक्त माल उतारने के लिए किया जाता है। 2026 के लिए करीब 1.21 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक होने की जानकारी सामने आई है। सरकार अब इसी स्टॉक को नियंत्रित तरीके से बाजार में जारी कर रही है। उद्देश्य एक साथ पूरा स्टॉक बाजार में डालना नहीं, बल्कि जरूरत और कीमत के रुझान को देखते हुए अलग-अलग क्षेत्रों में सप्लाई बढ़ाना है।

35 रुपये किलो प्याज बेचकर कीमतों पर दबाव

सरकार ने उपभोक्ताओं को 35 रुपये प्रति किलो की दर से प्याज उपलब्ध कराने की योजना बनाई है। इसके लिए NCCF, NAFED, केंद्रीय भंडार, Safal के आउटलेट और मोबाइल वैन जैसे चैनलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। 26 अगस्त को जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार NCCF के 9 आउटलेट और 40 मोबाइल वैन, NAFED के 13 आउटलेट और 50 मोबाइल वैन तथा केंद्रीय भंडार के करीब 100 आउटलेट इस खुदरा हस्तक्षेप का हिस्सा हैं। सरकार का गणित यह है कि जब बाजार में अतिरिक्त प्याज पहुंचेगा और उपभोक्ताओं को सरकारी चैनलों पर कम कीमत में विकल्प मिलेगा तो खुले बाजार के विक्रेताओं पर भी कीमत कम रखने का दबाव बनेगा।

रेलवे से प्याज भेजना क्यों है अहम?

प्याज जैसी कम मूल्य लेकिन बड़ी मात्रा वाली कृषि उपज को सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर ले जाने में परिवहन लागत महत्वपूर्ण होती है। ट्रकों के मुकाबले रेलवे एक बार में बहुत बड़ी मात्रा ले जा सकता है। नासिक जैसे प्रमुख उत्पादक क्षेत्र से दिल्ली, पूर्वी भारत, दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर जैसे बड़े उपभोक्ता बाजारों तक बड़ी खेप भेजने के लिए रेलवे उपयोगी विकल्प बन जाता है। इसी वजह से सरकार रेलवे और सड़क परिवहन का मिश्रित मॉडल अपना रही है। रेल बड़ी मात्रा को प्रमुख केंद्रों तक पहुंचाती है और वहां से सड़क नेटवर्क के जरिए इसे खुदरा वितरण केंद्रों तक पहुंचाया जा सकता है।

प्याज के मामले में महाराष्ट्र इतना महत्वपूर्ण क्यों?

महाराष्ट्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्याज उत्पादक क्षेत्रों में है और नासिक तथा लासलगांव का प्याज व्यापार राष्ट्रीय बाजार के लिए बेहद अहम है। यही वजह है कि सरकारी बफर से बड़े पैमाने की खेप नासिक से उपभोक्ता शहरों की ओर भेजी जा रही है।

इस समय नीति की चुनौती केवल उपभोक्ता को सस्ता प्याज उपलब्ध कराना नहीं है। किसानों को भी उचित मूल्य मिलना जरूरी है। किसान संगठनों का तर्क है कि बारिश, खराब होने वाली उपज और बढ़ी लागत को ध्यान में रखे बिना कीमतों को बहुत नीचे लाने की कोशिश उत्पादकों को नुकसान पहुंचा सकती है। यानी सरकार को दो मोर्चों पर संतुलन बनाना पड़ रहा है। शहरों में उपभोक्ता महंगे प्याज से परेशान न हों और दूसरी तरफ उत्पादक किसान को उसकी लागत से कम कीमत न मिले।

क्या कांदा एक्सप्रेस से तुरंत सस्ता हो जाएगा प्याज?

यह जरूरी नहीं कि ट्रेन पहुंचते ही पूरे देश में प्याज के भाव अचानक गिर जाएं।किसी शहर में खुदरा कीमत केवल कुल सप्लाई से तय नहीं होती। थोक मंडी का भाव, परिवहन खर्च, स्थानीय उपलब्धता, गुणवत्ता, स्टोरेज लॉस और खुदरा मार्जिन भी अंतिम कीमत तय करते हैं।

फिर भी सरकारी बफर की बड़ी खेप बाजार में आने से सप्लाई बढ़ती है और कीमतों में असामान्य तेजी को रोकने में मदद मिल सकती है। खासकर सरकारी आउटलेट पर 35 रुपये किलो प्याज मिलने से उपभोक्ताओं को खुले बाजार का विकल्प मिलता है।

असली संकट उत्पादन का नहीं, ‘सप्लाई मैनेजमेंट’ का?

मौजूदा आंकड़ों से सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही निकलता है। देश का अनुमानित उत्पादन करीब 307.37 लाख टन है और केंद्र का कहना है कि आने वाले महीनों के लिए प्याज पर्याप्त है। इसके बावजूद खुदरा कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इसका मतलब मौजूदा समस्या को केवल राष्ट्रीय उत्पादन की कमी से नहीं समझा जा सकता। मौसम, स्टोरेज लॉस, अलग-अलग बाजारों में उपलब्धता, परिवहन और अगस्त-सितंबर की मौसमी मांग ने मिलकर कीमतों पर दबाव बढ़ाया है।  इसी अंतर को भरने के लिए कांदा एक्सप्रेस एक तरह का तेज लॉजिस्टिक हस्तक्षेप है।

आगे क्या होगा?

सरकार ने साफ किया है कि बफर स्टॉक की मात्रा, शहरों की कवरेज और बिक्री के चैनलों को बाजार की परिस्थितियों तथा कीमतों के रुझान के आधार पर आगे बढ़ाया जा सकता है। यानी यदि दूसरे शहरों में भी भाव असामान्य रूप से बढ़ते हैं तो वहां अतिरिक्त प्याज भेजा जा सकता है। अगले कुछ सप्ताह इसलिए महत्वपूर्ण होंगे। यदि नई खरीफ फसल समय पर बाजार में आती है, स्टोरेज से पर्याप्त प्याज निकलता रहता है और कांदा एक्सप्रेस तथा सड़क मार्ग से बफर स्टॉक प्रमुख बाजारों तक पहुंचता है तो कीमतों का दबाव कम हो सकता है।

फिलहाल सरकार की रणनीति स्पष्ट है: बफर खोलो, बड़ी मात्रा को रेल से तेजी से पहुंचाओ, सड़क मार्ग से वितरण बढ़ाओ और सरकारी बिक्री केंद्रों पर 35 रुपये किलो का विकल्प उपलब्ध कराओ।

कांदा एक्सप्रेस इसलिए केवल एक स्पेशल ट्रेन नहीं है। यह प्याज की महंगाई को उत्पादन क्षेत्र से उपभोक्ता बाजार तक सप्लाई बढ़ाकर नियंत्रित करने की सरकारी रणनीति का अहम हिस्सा बन गई है।

 

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