भारत में फर्टिलाइजर सब्सिडी पर सरकार का खर्च चालू वित्त वर्ष में तेजी से बढ़ा है। तैयार फर्टिलाइजर और घरेलू यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख फीडस्टॉक LNG की वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी के कारण अब तक करीब 1 लाख करोड़ रुपये सब्सिडी पर खर्च किए जा चुके हैं। यह 1.76 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान का लगभग 56 प्रतिशत है। बढ़ते खर्च ने सरकार के सामने फर्टिलाइजर सब्सिडी को नियंत्रित रखने की चुनौती बढ़ा दी है।
यूरिया पर सबसे ज्यादा सब्सिडी खर्च
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, करीब 77,871 करोड़ रुपये की सब्सिडी यूरिया के आयात और घरेलू उत्पादन पर खर्च की गई है। यूरिया भारत में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला नाइट्रोजन फर्टिलाइजर है और इसकी कीमत किसानों के लिए लंबे समय से नियंत्रित रखी गई है।
इसके अलावा DAP, MOP और NPK जैसे फर्टिलाइजर के आयात तथा घरेलू उत्पादन को समर्थन देने के लिए अब तक लगभग 21,255 करोड़ रुपये की सब्सिडी जारी की गई है। इस तरह इन दोनों प्रमुख श्रेणियों पर हुआ खर्च कुल फर्टिलाइजर सब्सिडी बोझ का बड़ा हिस्सा बन गया है।
अधिकारियों के अनुसार, यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतें अप्रैल के ऊंचे स्तर से काफी नीचे आ चुकी हैं। इसके बावजूद वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अधिक सब्सिडी खर्च के कारण पूरे साल का सब्सिडी बिल अनुमान से ऊपर जा सकता है।
15,000 से 20,000 करोड़ रुपये और बढ़ सकता है खर्च
अधिकारियों का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में फर्टिलाइजर सब्सिडी पर होने वाला कुल खर्च बजट अनुमान से करीब 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये अधिक हो सकता है। वित्त वर्ष 2025-26 में फर्टिलाइजर सब्सिडी का कुल खर्च लगभग 2.17 लाख करोड़ रुपये रहा था।
अगर वैश्विक बाजार में फर्टिलाइजर और कच्चे माल की कीमतों में दोबारा तेजी आती है, तो सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ सकता है। खासकर यूरिया के मामले में भारत आयात और घरेलू उत्पादन दोनों पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों और ऊर्जा लागत में बदलाव का सीधा असर सब्सिडी बिल पर पड़ता है।
यूरिया की कीमत में आई बड़ी गिरावट
वैश्विक आपूर्ति में सुधार और अलग-अलग देशों से आयात बढ़ने के कारण यूरिया की कीमत में बड़ी गिरावट आई है। भारत में आयातित यूरिया की लैंडेड कॉस्ट अप्रैल में करीब 1,000 डॉलर प्रति टन के शिखर से लगभग 60 प्रतिशत घटकर करीब 390 डॉलर प्रति टन रह गई है।
यह गिरावट सरकार के लिए राहत की खबर है। हालांकि, यूरिया की वैश्विक कीमत कम होने के बावजूद घरेलू बाजार में किसानों को इसका लाभ सीधे बाजार कीमत के रूप में नहीं मिलता, क्योंकि यूरिया की खुदरा कीमत सरकार द्वारा नियंत्रित है और किसानों को कम कीमत पर यूरिया उपलब्ध कराने के लिए सरकार सब्सिडी देती है।
DAP और MOP की कीमतें बढ़ीं
जहां यूरिया की वैश्विक कीमत में गिरावट आई है, वहीं अन्य प्रमुख फर्टिलाइजर के मामले में स्थिति अलग है। जुलाई में DAP की वैश्विक कीमत एक साल पहले की तुलना में करीब 15 प्रतिशत बढ़कर 931 डॉलर प्रति टन हो गई। इसी अवधि में MOP की कीमत लगभग 10 प्रतिशत बढ़कर 383 डॉलर प्रति टन रही।
इसका मतलब है कि सरकार के सामने केवल यूरिया की कीमत ही चुनौती नहीं है। DAP, MOP और NPK जैसे फर्टिलाइजर की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव भी भारत के सब्सिडी बिल को प्रभावित करता है।
भारत इन फर्टिलाइजर और उनके कच्चे माल की बड़ी मात्रा आयात करता है। इसलिए वैश्विक कीमत, समुद्री परिवहन लागत, ऊर्जा कीमत और रुपये की विनिमय दर में बदलाव का असर घरेलू फर्टिलाइजर व्यवस्था पर पड़ता है।
40 MT यूरिया खपत, 10 MT आयात
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में यूरिया की कुल अनुमानित खपत करीब 40 मिलियन टन रही। इसमें लगभग 10 मिलियन टन यूरिया का आयात किया गया, जबकि बाकी जरूरत घरेलू उत्पादन से पूरी की गई।
घरेलू यूरिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस, विशेष रूप से LNG, महत्वपूर्ण फीडस्टॉक है। इसलिए LNG की कीमत में बढ़ोतरी से घरेलू यूरिया उत्पादन की लागत भी प्रभावित होती है। सरकार को किसानों के लिए यूरिया की कीमत नियंत्रित रखने के साथ-साथ उत्पादन और आयात की लागत के बीच अंतर को सब्सिडी के माध्यम से पूरा करना पड़ता है।
होर्मुज संकट से सप्लाई पर असर
फर्टिलाइजर बाजार पर भू-राजनीतिक घटनाओं का भी प्रभाव पड़ा है। फरवरी से होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद रहने के कारण LNG जैसे कच्चे माल और तैयार फर्टिलाइजर की आपूर्ति में बाधा पैदा हुई। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और शिपिंग लागत पर दबाव बढ़ा।
भारत ने इस जोखिम को कम करने के लिए फर्टिलाइजर आयात के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है। सरकार ने अलग-अलग देशों से यूरिया खरीदना शुरू किया, ताकि किसी एक क्षेत्र या सप्लाई रूट पर अत्यधिक निर्भरता न रहे।
भारत ने ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्की और नीदरलैंड सहित कई देशों से यूरिया आयात किया है। इससे सप्लाई को बनाए रखने और वैश्विक बाजार में अचानक आने वाले झटकों का असर कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
DAP और NPK के लिए भी आयात बढ़ाया
भारत ने DAP और NPK जैसे फर्टिलाइजर के लिए भी कई देशों से आयात किया है। रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब जैसे देशों से इन फर्टिलाइजर की खरीद की गई है।
आयात स्रोतों में यह विविधता भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यदि किसी एक देश से सप्लाई बाधित होती है या किसी खास समुद्री मार्ग पर संकट पैदा होता है, तो दूसरे स्रोतों से फर्टिलाइजर की उपलब्धता बनाए रखने की संभावना बढ़ जाती है।
किसानों के लिए यूरिया की कीमत स्थिर
वैश्विक बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद भारतीय किसानों को यूरिया 45 किलोग्राम के बैग के लिए 266.50 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है। यह कीमत मार्च 2018 से लगभग स्थिर है।
वास्तविक अंतरराष्ट्रीय कीमत इससे कई गुना अधिक हो सकती है। ऐसे में बाजार कीमत और किसानों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच का अंतर सरकार को सब्सिडी के रूप में वहन करना पड़ता है। यही कारण है कि वैश्विक यूरिया कीमतों में तेजी आने पर सरकार का सब्सिडी खर्च तेजी से बढ़ सकता है।
DAP के मामले में भी किसानों के लिए खुदरा कीमत को 50 किलोग्राम बैग के लिए करीब 1,350 रुपये पर बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने की स्थिति में सरकार और फर्टिलाइजर कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ता है।
FY23 में भी बढ़ा था सब्सिडी बिल
फर्टिलाइजर सब्सिडी पर वैश्विक संकट का असर पहली बार नहीं देखा जा रहा है। वित्त वर्ष 2022-23 में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक फर्टिलाइजर और ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल हुई थी। उस दौरान भारत का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल रिकॉर्ड करीब 2.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।
मौजूदा स्थिति में भी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किसानों को फर्टिलाइजर उचित कीमत पर उपलब्ध कराया जाए, लेकिन इसके लिए सरकारी खजाने पर अत्यधिक बोझ न पड़े।
70 प्रतिशत जरूरत आयात पर निर्भर
भारत अपनी फर्टिलाइजर और उसके कच्चे माल की जरूरत का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश में विभिन्न प्रकार के फर्टिलाइजर की कुल सालाना खपत 70 मिलियन टन से अधिक रही।
यह निर्भरता बताती है कि भारत के लिए घरेलू फर्टिलाइजर उत्पादन क्षमता बढ़ाना और कच्चे माल के स्रोतों में विविधता लाना क्यों जरूरी है। यूरिया में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ-साथ फॉस्फेट और पोटाश आधारित फर्टिलाइजर के लिए भी दीर्घकालीन रणनीति की जरूरत है।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
फर्टिलाइजर सब्सिडी में बढ़ोतरी सरकार के सामने दोहरी चुनौती पेश कर रही है। एक तरफ किसानों को यूरिया, DAP और अन्य जरूरी फर्टिलाइजर उचित कीमत पर उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक बाजार में कीमतों और ऊर्जा लागत बढ़ने से सरकारी खर्च लगातार बढ़ रहा है।
यूरिया की वैश्विक कीमत में आई हालिया गिरावट से सरकार को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन DAP और MOP की कीमतों में तेजी चिंता का विषय बनी हुई है। इसके अलावा LNG की कीमत, समुद्री परिवहन, भू-राजनीतिक तनाव और रुपये की विनिमय दर आने वाले महीनों में फर्टिलाइजर सब्सिडी की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या वैश्विक कीमतों में आई नरमी लंबे समय तक बनी रहती है। यदि यूरिया और ऊर्जा की कीमतें नियंत्रण में रहती हैं, तो सरकार के लिए सब्सिडी खर्च संभालना आसान हो सकता है। लेकिन किसी नए वैश्विक संकट से सप्लाई प्रभावित होती है तो चालू वित्त वर्ष का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल अनुमान से काफी ऊपर जा सकता है।

