रूस ने भारत को इस साल फर्टिलाइजर की सप्लाई बढ़ाने और कृषि क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने का भरोसा दिया है। यह आश्वासन ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव, समुद्री मार्गों में व्यवधान और वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण भारत के लिए फर्टिलाइजर की सप्लाई और आयात लागत दोनों चुनौती बने हुए हैं। 24 अगस्त को मॉस्को में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि रूस भारत की कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए फर्टिलाइजर की आपूर्ति बढ़ा रहा है और आगे भी ऐसा करने के लिए तैयार है। (Business Standard)
फर्टिलाइजर सप्लाई बढ़ाने का रूस का भरोसा
पुतिन और जयशंकर की मुलाकात भारत-रूस आर्थिक संबंधों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बैठक में ऊर्जा, फर्टिलाइजर, परमाणु ऊर्जा, हाईटेक और व्यापार समेत कई क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा हुई। पुतिन ने विशेष रूप से फर्टिलाइजर को भारत के किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बताते हुए कहा कि रूस इनकी सप्लाई बढ़ा रहा है और आगे भी जारी रखने के लिए तैयार है। (India Today)
भारत के लिए रूस का यह भरोसा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कुल फर्टिलाइजर जरूरत और कच्चे माल का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में किसी प्रमुख सप्लायर से नियमित और पर्याप्त आपूर्ति मिलने से घरेलू बाजार में फर्टिलाइजर की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
रूस पहले ही भारत के प्रमुख फर्टिलाइजर सप्लायर के रूप में उभर चुका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2025 में भारत का रूस से फर्टिलाइजर आयात करीब 41 प्रतिशत बढ़कर 6.5 मिलियन टन हो गया था। इसी अवधि में भारत का कुल फर्टिलाइजर आयात करीब 27.4 मिलियन टन रहा। (Interfax)
सब्सिडी खर्च पर सरकार की बढ़ी चिंता
रूस से अधिक फर्टिलाइजर मिलने का आश्वासन ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार के फर्टिलाइजर सब्सिडी खर्च पर दबाव बढ़ रहा है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए फर्टिलाइजर सब्सिडी का बजट आवंटन करीब 1.77 लाख करोड़ रुपये है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार इस आवंटन का 55 प्रतिशत से अधिक पहले ही खर्च कर चुकी है। (Business Today)
सब्सिडी खर्च बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में फर्टिलाइजर और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव है। भारत में किसानों को यूरिया और अन्य प्रमुख फर्टिलाइजर नियंत्रित या समर्थित कीमतों पर उपलब्ध कराने के लिए सरकार को आयात और उत्पादन लागत का बड़ा हिस्सा सब्सिडी के रूप में वहन करना पड़ता है।
यदि वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार पर सब्सिडी का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसके अलावा समुद्री परिवहन लागत, ऊर्जा कीमत और रुपये की विनिमय दर भी आयात बिल को प्रभावित करती हैं।
यूरिया की कीमत में बड़ी गिरावट, लेकिन DAP और MOP महंगे
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में अप्रैल 2026 के उच्च स्तर से काफी गिरावट आई है। भारत की लैंडेड यूरिया लागत लगभग 1,000 डॉलर प्रति टन के स्तर से घटकर करीब 390 डॉलर प्रति टन बताई गई है। यानी इसमें लगभग 60 प्रतिशत की कमी आई है।
हालांकि, फर्टिलाइजर बाजार की पूरी तस्वीर इतनी राहत वाली नहीं है। DAP और MOP की कीमतें अभी भी ऊंची बनी हुई हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में DAP की वैश्विक कीमत एक साल पहले की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक और MOP की कीमत करीब 10 प्रतिशत अधिक थी।
इसका सीधा असर भारत के फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल पर पड़ सकता है। यूरिया की कीमत में कमी सरकार को राहत दे सकती है, लेकिन DAP, MOP और अन्य फर्टिलाइजर की ऊंची कीमतें कुल सब्सिडी खर्च को दबाव में बनाए रख सकती हैं।
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी सप्लाई की चिंता
रूस का आश्वासन ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बना हुआ है। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की स्थिति ने ऊर्जा और फर्टिलाइजर की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ाई है।
LNG और अन्य ऊर्जा संसाधनों की कीमत और उपलब्धता का असर घरेलू फर्टिलाइजर उत्पादन पर भी पड़ता है। वहीं, आयातित फर्टिलाइजर के लिए समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की बाधा से डिलीवरी में देरी और परिवहन लागत बढ़ सकती है।
भारत के लिए इसलिए केवल फर्टिलाइजर खरीदना ही पर्याप्त नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान सप्लाई लगातार बनी रहे और किसानों के लिए फर्टिलाइजर की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी न हो।
भारत ने आयात स्रोतों में किया विविधीकरण
वैश्विक सप्लाई जोखिम को देखते हुए भारत लगातार अपने फर्टिलाइजर आयात स्रोतों में विविधता ला रहा है। रूस के अलावा ओमान, मलेशिया, वियतनाम, नाइजीरिया और मिस्र जैसे देशों से भी फर्टिलाइजर की खरीद की जा रही है।
इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक देश या एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। यदि किसी देश से सप्लाई बाधित होती है तो दूसरे स्रोतों से जरूरत पूरी की जा सके।
रूस से अधिक सप्लाई का आश्वासन इस रणनीति में एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त विकल्प देता है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि रूस से भारत को कितनी मात्रा में फर्टिलाइजर मिलता है, कीमत क्या रहती है और परिवहन व भुगतान व्यवस्था कितनी सुचारू रहती है।
रूस-भारत व्यापार में बढ़ा असंतुलन
फर्टिलाइजर के साथ-साथ भारत और रूस के बीच व्यापक व्यापार संबंध भी बातचीत का प्रमुख मुद्दा रहे। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वस्तु व्यापार वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वित्त वर्ष 2021-22 के लगभग 13 अरब डॉलर से चार गुना से अधिक है। लेकिन व्यापार बढ़ने के साथ भारत का रूस के साथ व्यापार घाटा भी तेजी से बढ़ा है। (The Economic Times)
रिपोर्टों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में रूस से भारत का आयात करीब 55.3 अरब डॉलर रहा, जबकि भारत का रूस को निर्यात केवल करीब 4.5 अरब डॉलर रहा। इसके चलते व्यापार घाटा 50 अरब डॉलर से अधिक हो गया।
जयशंकर ने इस असंतुलन को दूर करना भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं में बताया। उन्होंने बाजार पहुंच बढ़ाने, टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने, भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने और दोनों देशों के कारोबारियों के बीच संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया। (The Economic Times)
2030 तक 100 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य
भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल रूस से भारत के आयात को बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत चाहता है कि रूस में भारतीय उत्पादों के लिए बाजार पहुंच बढ़े और भारतीय निर्यात में भी तेजी आए।
जयशंकर ने कहा कि बाजार पहुंच में प्रगति, टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना, भुगतान तंत्र को मजबूत करना और बिजनेस-टू-बिजनेस संपर्क बढ़ाना व्यापार असंतुलन को कम करने के लिए जरूरी होगा। (The Economic Times)
फर्टिलाइजर क्षेत्र इस बड़े आर्थिक रिश्ते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। भारत को अपनी कृषि जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में फर्टिलाइजर चाहिए, जबकि रूस वैश्विक स्तर पर एक बड़ा फर्टिलाइजर उत्पादक और निर्यातक है। इसलिए दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक फर्टिलाइजर आपूर्ति समझौते दोनों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
फर्टिलाइजर क्षेत्र में लंबी अवधि का सहयोग
भारत और रूस के बीच फर्टिलाइजर क्षेत्र में सहयोग केवल तत्काल आयात तक सीमित नहीं रहना चाहता। दोनों देशों ने पहले भी दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करने और इस क्षेत्र में संभावित संयुक्त उपक्रमों पर चर्चा की है। (The New Indian Express)
ऐसे सहयोग से भारत को लंबे समय में फर्टिलाइजर की आपूर्ति अधिक सुरक्षित बनाने में मदद मिल सकती है। अगर कंपनियों के स्तर पर दीर्घकालिक समझौते होते हैं तो अचानक वैश्विक संकट आने पर बाजार में उपलब्धता बनाए रखने की क्षमता बढ़ सकती है।
इसके अलावा भारत घरेलू फर्टिलाइजर उत्पादन क्षमता बढ़ाने और कच्चे माल की उपलब्धता मजबूत करने पर भी जोर दे रहा है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
सिर्फ सप्लाई नहीं, कीमत भी महत्वपूर्ण
रूस से अधिक फर्टिलाइजर मिलने की खबर किसानों और सरकार के लिए सकारात्मक है, लेकिन इसका पूरा फायदा तभी होगा जब कीमत भी प्रतिस्पर्धी रहे। केवल मात्रा बढ़ने से सब्सिडी का बोझ अपने आप कम नहीं होगा।
अगर वैश्विक बाजार में फर्टिलाइजर की कीमतें ऊंची रहती हैं और भारत को महंगे दाम पर आयात करना पड़ता है, तो किसानों के लिए कीमत नियंत्रित रखने के लिए सरकार को अधिक सब्सिडी देनी पड़ सकती है।
इसके विपरीत, यदि रूस और अन्य सप्लायर प्रतिस्पर्धी कीमत पर पर्याप्त फर्टिलाइजर उपलब्ध कराते हैं, तो भारत के आयात बिल और सब्सिडी खर्च दोनों पर कुछ राहत मिल सकती है।
किसानों के लिए क्या होगा असर?
फिलहाल रूस का आश्वासन किसानों के लिए मुख्य रूप से सप्लाई सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। फर्टिलाइजर की पर्याप्त उपलब्धता रहने से सीजन के दौरान किल्लत और कीमतों में अचानक बढ़ोतरी का जोखिम कम किया जा सकता है।
भारत में खरीफ और रबी दोनों मौसम में यूरिया, DAP, MOP और NPK की मांग काफी अधिक रहती है। ऐसे में वैश्विक सप्लाई में थोड़ी भी बड़ी बाधा घरेलू बाजार में दबाव पैदा कर सकती है।
यदि रूस से अतिरिक्त सप्लाई समय पर आती है और अन्य देशों से भी आयात जारी रहता है, तो सरकार के लिए स्टॉक बनाए रखना आसान होगा। इससे किसानों को जरूरत के समय फर्टिलाइजर उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
आगे की राह क्या होगी?
भारत के लिए मौजूदा परिस्थिति में तीन स्तरों पर रणनीति जरूरी दिखाई देती है। पहला, रूस सहित प्रमुख सप्लायर देशों से दीर्घकालिक फर्टिलाइजर सप्लाई सुनिश्चित करना। दूसरा, आयात स्रोतों और समुद्री मार्गों में विविधता बनाए रखना। तीसरा, घरेलू उत्पादन और कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाकर आयात निर्भरता कम करना।
रूस का ताजा आश्वासन तत्काल सप्लाई संकट के बीच भारत के लिए राहत देने वाला कदम है। लेकिन दीर्घकाल में भारत को वैश्विक बाजार की कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाओं से कम प्रभावित होने वाली फर्टिलाइजर व्यवस्था तैयार करनी होगी।
भारत-रूस संबंधों में फर्टिलाइजर अब केवल कृषि क्षेत्र का मुद्दा नहीं रह गया है। यह ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार संतुलन, विदेशी मुद्रा, रणनीतिक साझेदारी और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ गया है। मॉस्को में जयशंकर और पुतिन की बातचीत ने इस महत्व को और स्पष्ट किया है। रूस ने भारत की फर्टिलाइजर जरूरतों को पूरा करने के लिए सप्लाई बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है, जबकि भारत अपनी तरफ से आयात के स्रोतों को विविध बनाने और घरेलू उत्पादन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। (India Today)
आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि रूस से अतिरिक्त फर्टिलाइजर कितनी मात्रा में और किस कीमत पर भारत पहुंचता है। यदि सप्लाई नियमित रही और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भी स्थिरता आई, तो सरकार के सब्सिडी दबाव और किसानों की फर्टिलाइजर उपलब्धता दोनों को राहत मिल सकती है। लेकिन वैश्विक संकट और कीमतों में फिर तेजी आती है, तो सरकार के लिए 2026-27 का फर्टिलाइजर सब्सिडी बजट एक बार फिर बड़ी चुनौती बन सकता है।

