भारत में बढ़ता फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल अब सरकार को दशकों पुरानी उस व्यवस्था में बदलाव पर विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है, जिसने देश को खाद्यान्न आयात पर निर्भर राष्ट्र से दुनिया की प्रमुख कृषि अर्थव्यवस्थाओं में बदलने में बड़ी भूमिका निभाई थी। यूरिया की कीमत लंबे समय से सरकार द्वारा नियंत्रित रखी गई है, जिससे किसानों को यह फर्टिलाइजर बाजार कीमत से काफी कम दर पर मिलता है। लेकिन वैश्विक संकट, ऊर्जा कीमतों और आयात लागत में बढ़ोतरी ने इस व्यवस्था का वित्तीय बोझ काफी बढ़ा दिया है।
भारत में किसान अमेरिका और ब्राजील को मिलाकर जितनी यूरिया का इस्तेमाल करते हैं, उससे भी अधिक यूरिया का उपयोग करते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह सरकारी सब्सिडी है। सरकार यूरिया की वास्तविक लागत और किसानों से ली जाने वाली खुदरा कीमत के बीच के बड़े अंतर को सब्सिडी के जरिए पूरा करती है।
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में युद्ध और तनाव के कारण फर्टिलाइजर तथा ऊर्जा की वैश्विक सप्लाई प्रभावित हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य से आने-जाने वाले जहाजों पर संकट का असर पड़ा, जिससे यूरिया और LNG की उपलब्धता तथा कीमत दोनों प्रभावित हुईं। भारत के घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस एक महत्वपूर्ण फीडस्टॉक है। ऐसे में LNG की महंगी और सीमित आपूर्ति ने घरेलू उत्पादन की लागत पर भी दबाव बढ़ाया।
3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल
सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता फर्टिलाइजर सब्सिडी का बढ़ता खर्च है। मौजूदा वित्त वर्ष में फर्टिलाइजर सब्सिडी का बिल 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। यह बजट में निर्धारित राशि से काफी ज्यादा है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, सब्सिडी बिल बढ़ने की वजह सिर्फ यूरिया की कीमत नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में फर्टिलाइजर की कीमत, LNG की लागत, समुद्री परिवहन, आयात पर निर्भरता और भू-राजनीतिक संकट सभी मिलकर सरकार के खर्च को बढ़ा रहे हैं।
भारत में किसानों को 45 किलोग्राम यूरिया का बैग केवल 266.50 रुपये में मिलता है। यह कीमत लंबे समय से नियंत्रित है और वास्तविक अंतरराष्ट्रीय खरीद लागत की तुलना में बेहद कम है। अप्रैल में एक आयात टेंडर के दौरान भारत को यूरिया के लिए लगभग इसके कई गुना अधिक भुगतान करना पड़ा था।
यूरिया के अलावा DAP, MOP और अन्य फर्टिलाइजर पर भी सरकार सब्सिडी देती है। हालांकि इनकी सब्सिडी व्यवस्था यूरिया की तुलना में अलग है, फिर भी वैश्विक कीमत बढ़ने पर सरकारी खर्च बढ़ता है।
हरित क्रांति से शुरू हुई थी सस्ती यूरिया की नीति
भारत की मौजूदा यूरिया सब्सिडी व्यवस्था की जड़ें 1960 के दशक के खाद्य संकट में हैं। उस समय भारत को बड़ी मात्रा में अनाज आयात करना पड़ता था और देश में खाद्यान्न सुरक्षा एक बड़ी चुनौती थी।
इसी दौर में सरकार ने हरित क्रांति को बढ़ावा दिया। गेहूं और धान की उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत बीज, सिंचाई और रासायनिक फर्टिलाइजर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू हुआ। नाइट्रोजन आधारित यूरिया ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
किसानों को यूरिया सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने इसकी खुदरा कीमत नियंत्रित की और बाजार कीमत तथा किसान द्वारा भुगतान की गई कीमत के बीच का अंतर सरकारी सहायता से पूरा किया।
इस नीति ने देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है और खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर देश बन चुका है।
लेकिन दशकों तक चली सस्ती यूरिया नीति का दूसरा पहलू भी सामने आया है। सस्ती यूरिया ने किसानों के बीच इसके अधिक इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। कई क्षेत्रों में किसान अपनी फसल की जरूरत से अधिक यूरिया का प्रयोग करते हैं।
सब्सिडी ने यूरिया के अधिक इस्तेमाल को बढ़ावा दिया
अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था सरकारी धन के प्रभावी इस्तेमाल की समस्या पैदा कर रही है। सस्ती यूरिया ने ऐसी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दिया है, जिनमें फसल की अधिकतम उपज के लिए लगातार ज्यादा फर्टिलाइजर डालने पर जोर रहता है।
कई किसान मानते हैं कि यूरिया कम करने से पैदावार घट सकती है। इसलिए वे लंबे समय में मिट्टी की सेहत पर पड़ने वाले असर के बावजूद तत्काल उत्पादन को प्राथमिकता देते हैं।
भारत में औसत जोत का आकार एक हेक्टेयर से भी कम है। छोटे किसान अपनी सीमित जमीन से पूरे साल की आय निकालने की कोशिश करते हैं। ऐसे में वे खेती के स्थापित तरीकों में बदलाव करने से अक्सर बचते हैं, क्योंकि किसी नए तरीके से उत्पादन कम होने का जोखिम उनके लिए बड़ा आर्थिक नुकसान बन सकता है।
गेहूं और धान की सरकारी खरीद तथा गन्ने की सुनिश्चित खरीद व्यवस्था भी किसानों को इन फसलों से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित करती है। ये फसलें अपेक्षाकृत अधिक फर्टिलाइजर, खासकर यूरिया, की मांग करती हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी यूरिया खपत घटाने की अपील की
बढ़ते फर्टिलाइजर खर्च और मिट्टी की खराब होती सेहत को देखते हुए सरकार अब किसानों को यूरिया और अन्य रासायनिक फर्टिलाइजर का संतुलित इस्तेमाल करने के लिए जागरूक कर रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी किसानों से रासायनिक फर्टिलाइजर की खपत कम करने की अपील की है। उन्होंने रासायनिक फर्टिलाइजर पर निर्भरता घटाने और जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करने पर जोर दिया है।
सरकार का तर्क है कि फर्टिलाइजर का कम और संतुलित इस्तेमाल केवल सब्सिडी खर्च कम करने के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि मिट्टी, पानी और पर्यावरण की रक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
मिट्टी की सेहत पर बढ़ता खतरा
दशकों तक जरूरत से ज्यादा फर्टिलाइजर इस्तेमाल करने का असर मिट्टी की गुणवत्ता पर दिखाई देने लगा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक फर्टिलाइजर उपयोग से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या प्रभावित हो सकती है।
फर्टिलाइजर का अतिरिक्त हिस्सा बारिश या सिंचाई के पानी के साथ बहकर भूजल और नदियों तक पहुंच सकता है। इससे जल प्रदूषण का खतरा बढ़ता है।
नाइट्रोजन फर्टिलाइजर के अत्यधिक इस्तेमाल से नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ सकता है। यह जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण से जुड़ी पर्यावरणीय समस्या है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 सीजन में देशभर में जांचे गए 90 लाख से अधिक मिट्टी के नमूनों में आधे से ज्यादा में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर कम पाया गया। ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
किसानों को जागरूक करने के लिए देशव्यापी अभियान
कृषि मंत्रालय ने जून के दौरान देशभर में किसानों को फर्टिलाइजर के संतुलित इस्तेमाल के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चलाया। किसानों को मिट्टी की जांच कराने और फसल की जरूरत के अनुसार ही यूरिया इस्तेमाल करने की सलाह दी गई।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी मिट्टी की जांच पर जोर देते हुए कहा कि जरूरत से ज्यादा फर्टिलाइजर का इस्तेमाल मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीवों को नुकसान पहुंचा सकता है और लंबे समय में उत्पादन तथा किसान की आय पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
हालांकि, किसानों को इस बदलाव के लिए तैयार करना आसान नहीं है। कई किसान मानते हैं कि उन्होंने पहले फर्टिलाइजर की मात्रा कम करने की कोशिश की, लेकिन इससे उनकी फसल की पैदावार प्रभावित हुई।
पंजाब और हरियाणा में चुनौती ज्यादा
पंजाब और हरियाणा जैसे देश के प्रमुख अनाज उत्पादक राज्यों में यूरिया की खपत काफी अधिक है। इन राज्यों में धान और गेहूं की गहन खेती होती है।
किसानों के बीच सरकारी बैठकों और जागरूकता कार्यक्रमों में फर्टिलाइजर के अधिक इस्तेमाल से होने वाले नुकसान की जानकारी दी गई। लेकिन कई किसान अभी भी उत्पादन और आय को मिट्टी की दीर्घकालीन सेहत से ज्यादा प्राथमिकता देते हैं।
एक किसान के अनुसार, यदि यूरिया कम करने से पैदावार घटती है तो उसका सीधा असर परिवार की आय पर पड़ेगा। यही कारण है कि सरकारी जागरूकता अभियान के बावजूद व्यवहार में बदलाव धीमा है।
कुछ राज्यों में यूरिया की बिक्री पर लगी सीमा
इस साल फर्टिलाइजर की उपलब्धता को लेकर भी कई क्षेत्रों में दबाव देखने को मिला है। सरकार ने सब्सिडी वाले फर्टिलाइजर की खरीद को नियंत्रित करने के लिए कुछ राज्यों में बिक्री सीमा तय की है।
कुछ जगहों पर एक खरीदार को महीने में अधिकतम 50 बोरी तक फर्टिलाइजर खरीदने की सीमा रखी गई है। इसका उद्देश्य फर्टिलाइजर की जमाखोरी, डायवर्जन और असमान वितरण को रोकना है।
पंजाब के एक किसान ने बताया कि उसे अपनी धान की फसल के लिए प्रति एकड़ चार से पांच बोरी यूरिया की जरूरत पड़ती है, लेकिन सहकारी संस्था से उसे प्रति एकड़ केवल तीन बोरी उपलब्ध हुई। बाकी जरूरत पूरी करने के लिए उसे निजी विक्रेताओं से खरीद करनी पड़ी।
कुछ निजी विक्रेता यूरिया के साथ अन्य कृषि उत्पाद खरीदने के लिए भी किसानों पर दबाव डालते हैं, जिससे किसानों की वास्तविक लागत बढ़ सकती है।
40 जिलों में नई वितरण व्यवस्था का परीक्षण
सरकार अब फर्टिलाइजर वितरण की एक नई व्यवस्था का परीक्षण कर रही है। यह प्रणाली फिलहाल 40 जिलों में पायलट आधार पर लागू की जा रही है।
इस मॉडल में किसान अपनी जमीन के आकार और बोई गई फसल के आधार पर पहले से फर्टिलाइजर बुक कर सकेंगे। इसके जरिए यह तय करने का प्रयास होगा कि किसान को उसकी वास्तविक कृषि जरूरत के अनुसार ही फर्टिलाइजर मिले।
सरकार का उद्देश्य है कि जरूरतमंद किसानों को समय पर पर्याप्त फर्टिलाइजर मिले, लेकिन बड़े पैमाने पर अनावश्यक खरीद और भंडारण को रोका जा सके।
यह व्यवस्था अगर सफल रहती है तो भविष्य में फर्टिलाइजर वितरण की पूरी प्रणाली में बड़ा बदलाव हो सकता है।
घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़ाने की तैयारी
सरकार केवल मांग घटाने पर ही निर्भर नहीं रहना चाहती। घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं।
सरकार ने देश की वार्षिक यूरिया उत्पादन क्षमता में लगभग 10 मिलियन टन की बढ़ोतरी के उद्देश्य से निवेश आकर्षित करने वाली नई योजना को मंजूरी दी है। यह मौजूदा उत्पादन क्षमता की तुलना में लगभग एक-तिहाई अतिरिक्त क्षमता के बराबर है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से लंबे समय में आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। लेकिन इसके लिए पर्याप्त प्राकृतिक गैस और LNG की उपलब्धता भी जरूरी होगी।
मानसून और एल नीनो से बढ़ी चिंता
फर्टिलाइजर संकट के साथ मौसम की चुनौती भी भारत के कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ा रही है। एल नीनो जैसी मौसमी स्थिति मानसून को कमजोर कर सकती है। जून में बारिश लंबे समय के औसत से काफी कम रही और सितंबर तक सामान्य से कम बारिश रहने का जोखिम बताया गया है।
अगर फर्टिलाइजर की उपलब्धता में कमी और कमजोर बारिश एक साथ होती है, तो किसानों की फसल उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। इससे भारत में खाद्य कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
खाद्य वस्तुएं भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में एक बड़ा हिस्सा रखती हैं। हाल के महीनों में खाद्य महंगाई में तेजी भी देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर बारिश और वैश्विक फर्टिलाइजर सप्लाई में कमी से खाद्य महंगाई के ऊपर की ओर जाने का जोखिम बढ़ सकता है।
फर्टिलाइजर संकट का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादकों और चावल निर्यातकों में शामिल है। इसलिए देश की फसल उत्पादन क्षमता में किसी भी बड़ी गिरावट का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है।
अगर फर्टिलाइजर की कमी, कमजोर मानसून और बढ़ती उत्पादन लागत के कारण भारत की फसल कम होती है, तो घरेलू खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं। साथ ही जिन देशों को भारत से चावल और अन्य कृषि उत्पादों का निर्यात होता है, वहां भी कीमतों पर असर पड़ सकता है।
इंटरनेशनल फर्टिलाइजर एसोसिएशन से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी रुकावटें लंबे समय तक जारी रहती हैं तो चुनौती केवल फर्टिलाइजर की उपलब्धता की नहीं होगी, बल्कि महत्वपूर्ण फसल चरणों में समय पर फर्टिलाइजर पहुंचने की भी होगी।
सब्सिडी बिल 3.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान
यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा चलता है और वैश्विक फर्टिलाइजर सप्लाई पर दबाव बना रहता है, तो भारत का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल 3.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। एक आर्थिक शोध संस्था ने जुलाई में यह अनुमान लगाया था।
अगर तनाव जल्दी कम भी हो जाता है, तब भी सब्सिडी खर्च 2.42 लाख करोड़ रुपये से कम न रहने की संभावना जताई गई है। यह बजट में निर्धारित राशि से काफी अधिक होगा।
इससे स्पष्ट है कि मौजूदा व्यवस्था में सरकार के सामने केवल तत्काल फर्टिलाइजर उपलब्ध कराने की चुनौती नहीं है, बल्कि सब्सिडी के दीर्घकालीन वित्तीय बोझ को नियंत्रित करना भी जरूरी है।
क्या यूरिया नीति में बड़े सुधार की जरूरत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संकट भारत को यूरिया नीति में सुधार का अवसर दे सकता है। केवल सप्लाई बढ़ाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। अगर किसानों की यूरिया खपत लगातार बढ़ती रहती है तो सरकार का सब्सिडी खर्च भी बढ़ता रहेगा।
यूरिया नीति में सुधार का मतलब यह जरूरी नहीं कि किसानों पर अचानक पूरी कीमत का बोझ डाल दिया जाए। सरकार चरणबद्ध तरीके से संतुलित फर्टिलाइजर उपयोग, मिट्टी जांच, पोषक तत्व आधारित खेती, वैकल्पिक फर्टिलाइजर और बेहतर वितरण व्यवस्था को बढ़ावा दे सकती है।
इसके साथ छोटे किसानों के हितों की रक्षा करना भी जरूरी होगा। किसी भी सुधार का असर सीधे किसान की लागत और आय पर पड़ सकता है।
आगे की राह: सप्लाई के साथ मांग पर भी ध्यान
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक संकटों के बावजूद फर्टिलाइजर की सप्लाई बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए हैं। आयात स्रोतों में विविधता, घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना और रणनीतिक खरीद इसके प्रमुख हिस्से हैं।
लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार अब मांग प्रबंधन पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। दशकों से चली आ रही सस्ती यूरिया व्यवस्था ने भारत की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियों में इसकी लागत तेजी से बढ़ रही है।
आने वाले वर्षों में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसी फर्टिलाइजर नीति तैयार करना होगी, जिसमें किसान को उचित कीमत पर जरूरी पोषक तत्व मिलें, फसल उत्पादन सुरक्षित रहे, मिट्टी की सेहत खराब न हो और सरकार पर सब्सिडी का असहनीय बोझ भी न पड़े।
यूरिया सब्सिडी ने भारत को खाद्यान्न आयातक से खाद्य अधिशेष देश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब समय की मांग है कि उसी व्यवस्था को नई परिस्थितियों के अनुसार बदला जाए। वैश्विक संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल सस्ता फर्टिलाइजर उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। भारत को संतुलित पोषण, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य, कुशल वितरण और मजबूत घरेलू उत्पादन पर आधारित ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जो किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों को लंबे समय तक मजबूत रख सके।

