भारत के किसानों के लिए यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट राहत की खबर है, लेकिन खाद के पूरे बाजार की तस्वीर अभी इतनी आसान नहीं है। यूरिया सस्ता होने के बावजूद DAP, MOP और फॉस्फेटिक खादों की आयात कीमतों में बढ़ोतरी ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। इससे चालू वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी का खर्च बजट अनुमान से ऊपर जाने की आशंका बनी हुई है। 31 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक, आयातित यूरिया की कीमत में करीब 5.89 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि DAP की कीमत 15.37 प्रतिशत और MOP की कीमत 9.74 प्रतिशत बढ़ी है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक आयातकों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में होने वाला बदलाव सीधे सरकार के खाद सब्सिडी खर्च और घरेलू उर्वरक बाजार पर असर डालता है।
यूरिया की कीमत में आई गिरावट
भारत में यूरिया किसानों को सरकार द्वारा तय कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत कम होने पर सरकार और उर्वरक कंपनियों को आयात के मोर्चे पर राहत मिल सकती है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, आयातित यूरिया की कीमत पिछले साल जुलाई के करीब 475 डॉलर प्रति टन से घटकर लगभग 447 डॉलर प्रति टन रह गई है। यानी इसमें करीब 5.89 प्रतिशत की गिरावट आई है।
यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब कुछ महीने पहले पश्चिम एशिया में तनाव और सप्लाई बाधित होने के कारण उर्वरक बाजार में कीमतों को लेकर काफी अनिश्चितता थी।
यूरिया की कीमत में नरमी से भारत के लिए आयात लागत कम हो सकती है। इससे सरकार को यूरिया सब्सिडी के मोर्चे पर कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।
लेकिन समस्या यह है कि खाद के कुल बाजार में केवल यूरिया ही महत्वपूर्ण नहीं है।
DAP और MOP ने बढ़ाई चिंता
भारत में किसान यूरिया के साथ DAP, NPK और MOP जैसे उर्वरकों का भी इस्तेमाल करते हैं। इन उर्वरकों में नाइट्रोजन के अलावा फास्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व होते हैं, जो फसल की वृद्धि के लिए जरूरी हैं।
ताजा अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुसार, DAP की कीमत करीब 15.37 प्रतिशत बढ़कर लगभग 931 डॉलर प्रति टन हो गई है। वहीं MOP यानी म्यूरेट ऑफ पोटाश की कीमत करीब 9.74 प्रतिशत बढ़कर लगभग 383 डॉलर प्रति टन बताई गई है। फॉस्फोरिक एसिड की कीमत में भी करीब 17.95 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और यह लगभग 1,360 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है।
यही वजह है कि यूरिया के सस्ता होने का फायदा पूरी तरह सरकार के उर्वरक सब्सिडी बिल में दिखाई नहीं दे रहा है।
सरकार किसानों को महंगी खाद से बचाने की कोशिश में
भारत में उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार की ऊंची कीमतों से बचाना है। सरकार कई प्रमुख उर्वरकों को किसानों के लिए नियंत्रित या सब्सिडी वाली कीमतों पर उपलब्ध कराने के लिए बड़ी राशि खर्च करती है।
खरीफ 2026 के लिए सरकार ने फॉस्फेटिक और पोटाशिक यानी P&K उर्वरकों के लिए करीब 41,534 करोड़ रुपये की न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी को मंजूरी दी थी। इसके अलावा DAP को 50 किलो की बोरी पर 1,350 रुपये के आसपास किफायती रखने के लिए अतिरिक्त सहायता भी दी गई है।
इसका सीधा फायदा किसानों को मिलता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने के बावजूद घरेलू स्तर पर खाद की कीमतों में अचानक बड़ा उछाल नहीं आता।
लेकिन सरकार के लिए इसका दूसरा पहलू खर्च बढ़ना है।
सब्सिडी का बिल बजट से काफी ऊपर जाने की आशंका
उर्वरक कीमतों में वैश्विक उतार-चढ़ाव के कारण 2026-27 में भारत का खाद सब्सिडी बिल बजट अनुमान से काफी ऊपर जाने की आशंका पहले भी जताई गई थी।
केंद्र सरकार के बजट में 2026-27 के लिए उर्वरक सब्सिडी का अनुमान करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये रखा गया था। बाद में पश्चिम एशिया संकट और अंतरराष्ट्रीय खाद कीमतों में तेजी के कारण कई आकलनों में यह खर्च 3 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर जाने की संभावना जताई गई।
कुछ आकलनों में सब्सिडी बोझ करीब 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना भी बताई गई है।
अब यूरिया की कीमतों में गिरावट से सरकार को कुछ राहत जरूर मिल सकती है, लेकिन DAP, MOP और फॉस्फोरिक एसिड की महंगी कीमतें इस राहत को सीमित कर रही हैं।
किसानों पर क्या होगा असर?
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमत बढ़ने या घटने का उनके ऊपर कितना असर पड़ेगा।
यूरिया की कीमतों में गिरावट का फायदा किसानों को सीधे तौर पर कम दिखाई देगा, क्योंकि यूरिया का खुदरा मूल्य सरकार द्वारा नियंत्रित है। फिलहाल किसान को यूरिया सरकारी व्यवस्था के तहत तय कीमत पर मिलता है।
दूसरी तरफ DAP और दूसरे P&K उर्वरकों के मामले में अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर सरकार की सब्सिडी व्यवस्था पर अधिक पड़ता है। अगर आयात लागत लगातार बढ़ती है तो सरकार को किसानों के लिए खाद की कीमत नियंत्रित रखने के लिए अधिक सब्सिडी देनी पड़ सकती है।
यानी किसान के लिए तत्काल कीमत स्थिर रह सकती है, लेकिन सरकार का खर्च बढ़ सकता है।
भारत की आयात पर निर्भरता बड़ी चुनौती
भारत की खाद जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। खासकर DAP और दूसरे फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए देश को अंतरराष्ट्रीय बाजार पर काफी निर्भर रहना पड़ता है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत अपनी DAP जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है। यूरिया और NPK के मामले में भी आयात की भूमिका महत्वपूर्ण है।
इस वजह से अंतरराष्ट्रीय कीमतों, जहाजों की उपलब्धता, कच्चे माल की कीमत और भू-राजनीतिक घटनाओं का असर भारत के खाद बाजार पर पड़ता है।
पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान गैस, अमोनिया और शिपिंग सप्लाई पर असर पड़ा था। इससे वैश्विक उर्वरक बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ी थीं। अब कुछ क्षेत्रों में सप्लाई बेहतर होने से यूरिया की कीमत नीचे आई है, लेकिन सभी उर्वरकों की स्थिति एक जैसी नहीं हुई है।
DAP और MOP की कीमत क्यों महत्वपूर्ण है?
DAP में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस दोनों होते हैं, जबकि MOP पोटाश का प्रमुख स्रोत है। फसल के संतुलित पोषण के लिए इन पोषक तत्वों की जरूरत होती है।
अगर DAP और MOP महंगे होते हैं तो सरकार के सामने दो विकल्प होते हैं। पहला, किसानों पर कीमत का बोझ बढ़ने दिया जाए। दूसरा, किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी बढ़ाई जाए।
सरकार की मौजूदा नीति किसानों को अचानक बढ़ी अंतरराष्ट्रीय कीमतों से बचाने पर केंद्रित रही है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आने पर सब्सिडी का बोझ बढ़ना स्वाभाविक है।
यूरिया सस्ता होना कितनी बड़ी राहत?
यूरिया की कीमत में गिरावट निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। इससे आयात लागत कम हो सकती है और सरकार को यूरिया सब्सिडी में कुछ राहत मिल सकती है।
लेकिन भारत में खाद की कुल जरूरत को देखते हुए केवल यूरिया की कीमत कम होना पर्याप्त नहीं है। DAP, MOP, NPK और अन्य फॉस्फेटिक उर्वरकों की कीमत भी महत्वपूर्ण है।
यही कारण है कि सरकार को पूरे उर्वरक बाजार पर नजर रखनी पड़ रही है।
आने वाले महीनों में क्या रहेगा फोकस?
आने वाले महीनों में सरकार की नजर तीन प्रमुख चीजों पर रहेगी। पहला, अंतरराष्ट्रीय उर्वरक कीमतों का रुख। दूसरा, खाद की वैश्विक सप्लाई और आयात की स्थिति। तीसरा, किसानों के लिए घरेलू कीमतों को किफायती बनाए रखने की लागत।
रबी सीजन की तैयारी शुरू होने के साथ खाद की मांग में भी बदलाव आएगा। ऐसे में सरकार के लिए समय पर यूरिया, DAP, MOP और NPK की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
निष्कर्ष
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में गिरावट भारत के लिए राहत का संकेत जरूर है, लेकिन DAP, MOP और फॉस्फोरिक एसिड की बढ़ती कीमतों ने इस राहत को सीमित कर दिया है। सरकार किसानों को खाद महंगी होने से बचाने के लिए सब्सिडी का सहारा ले रही है, लेकिन इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ रहा है।
आने वाले महीनों में अगर DAP और MOP की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो उर्वरक सब्सिडी का खर्च बजट अनुमान से काफी ऊपर जा सकता है। दूसरी ओर, अगर वैश्विक सप्लाई सुधरती है और फॉस्फेटिक-पोटाशिक खादों की कीमतें नीचे आती हैं तो सरकार को बड़ी राहत मिल सकती है।
किसानों के लिए फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि सरकार खाद की उपलब्धता और कीमत दोनों पर निगरानी बनाए रखे, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार की उथल-पुथल का असर खेती की लागत और किसानों की आय पर कम से कम पड़े।
